बुधवार, 8 जनवरी 2014

बन्दर और उस्तरा

बन्दर और उस्तरा 

यह कहानी काफी पुरानी है मगर हम भारतीय पुनरावर्तन कर समय -समय पर परख
करते रहते हैं कि हमारी लोक कहानियाँ अनुभवों के आधार पर तैयार की जाती है या
नहीं।

  पुरानी कहानी में नकलची बन्दर ने आदमी को हिजामत करते देखा और उसका उस्तरा
उठा कर खुद भी अपने गाल पर घूमाने लगा और उस्तरे कि तेज धार से खुद लहूलुहान हो
गया। नकल नहीं करने का सन्देश देकर यह कहानी खत्म हो जाती थी मगर  …

देश के विशेष स्थान पर इस कहानी को नए सिरे से लोगों ने दोहराया। दक्षिण से एक
बुलंद आवाज आयी -"मत आजमाना",मगर लोग उस वृद्ध सन्त की बात को टाल गये।
लोगों ने पैसे इकट्टे कर के कुछ उस्तरे ख़रीदे और सब मिलकर उसकी धार तेज करने
लगे। लोग उस्तरों कि धार तेज करते जाते और खुश होते रहते कि अब निकम्मी घास
पतवार को कटवा देना है। तेज धार के उस्तरे देख पारखी लोग भी लेने के लिए आये और
बंदर भी आये। लोगों ने पारखी लोगों और बंदरों दोनों में उस्तरे बाँट दिये। पारखी लोग
लोगों के इस अजीब व्यवहार पर हेरान रह गये।

लोगों ने कौतुहल से पारखी लोगों की ओर देखा तो पाया उन्होंने अपने-अपने उस्तरों को
फोल्ड करके रख लिया है। लोगों ने बंदरों की ओर देखा तो पाया उनके हाथों में उस्तरे
चमचमा रहे थे। मगर इस बार के बंदर और पुरानी कथा के बंदरों में फर्क था। पुरानी
कहानी में बंदर ने अपनी अनुभव हिनता के कारण खुद को घायल किया था और इस
समय के बंदरो ने ना खुद कॊ घायल किया और ना निकम्मी घास पतवार को काटा ,
उन्होंने उस्तरों कि धार वाले भाग को लोगों की ओर कर दिया। लोगों ने समय का
इंतजार करना मुनासिब समझ बंदरों से उस्तरे वापिस लेने का निर्णय कर लिया।        

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