शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

राष्ट्र के लिए परिवार नियोजन जरुरी या संयम

राष्ट्र के लिए परिवार नियोजन जरुरी या संयम 

इस देश की ताकत है या कमजोरी बढ़ती हुई जनसँख्या ? हिन्दुस्थान में घटता हुआ
हिन्दू समाज हिन्दुस्थान के भविष्य को कैसा बनायेगा -रंगहीन या रंगीन ?सवाल
भी हमने बनाया है और उत्तर भी हमें ही खोजना होगा।

   सबसे पहले सरकार के नीति नियन्ता कि बात करते हैं जो बढ़ती हुई जनसँख्या
को समस्या के रूप में देखते हैं जो अपूर्ण नजरिया है हर दृष्टिकोण से। यदि इन
नीति नियंताओं के माँ -बाप ने परिवार नियोजन अपनाया होता तो आज वो किसे
नसीहत देते ?

  यदि कम संतान पैदा करना सही नीति मान ली जाए तो आज के पचास वर्ष बाद
हिन्दुस्थान का क्या हाल होगा -किसका भाई सेना में जायेगा ,कौन पिता के बुढ़ापे
का सहारा बनेगा ,कौन परिवार की व्यवस्था और अर्थ व्यवस्था देखेगा क्योंकि हम
एक या दो संतान के पक्ष में मत दे रहे हैं और इस फिसलन भरे रास्ते पर आगे
बढ़ना चाहते हैं और बढ़ भी रहे है। 

परिवार नियोजन ने कई माँ बाप को जिंदगी भर सिसकने को मजबूर कर दिया है।
वो माँ -बाप जो एक लड़के और एक लड़की के बाद परिवार नियोजन अपना चुके
हैं और उनकी संतान किसी हादसे या बिमारी के कारण जान गवाँ चुकी है या
अपाहिज हो चुकी है उनका भविष्य अँधेरे में आ गया और वर्त्तमान बेजान हो गया,
रसहीन हो गया ,बदरंग हो गया।  

परिवार नियोजन से लिंग अनुपात गड़बड़ा गया,किसी के एक लड़का और एक लड़की
है तो किसी के दो लड़के ,दॊ लड़कियाँ वाले माँ -बाप काफी कम हैँ। अब इन बच्चों में
से कोई अपाहिज ,बीमार या हादसे का शिकार हो गया तो यह अनुपात ज्यादा बिगड़
जाता है।

हम गलत तरीके से सृष्टि को रोकना क्यों चाहते हैं ?क्या हम खुद को सृष्टि का संचालक
मानते हैं ?हर बच्चे में दिमाग होता है ,हम आने वाले बच्चे को रोक कर बड़ी प्रतिभा को
आने से पहले ही रोक देते हैं क्या मालुम आने वाला बच्चा बड़ा वैज्ञानिक बनता या बड़ा
डॉक्टर या समाजसेवक या राजनेता।

परिवार नियोजन ने नागरिकों को ओज और तेजहीन तथा असंयमी बना दिया। परिवार
नियोजन से पहले यदि कोई माँ -बाप बच्चा नहीं चाहते थे तो संयम का पालन करते थे ,
संयम से उनका स्वास्थ्य सुन्दर बना रहता था।

राष्ट्र को सोचना होगा कि परिवार नियोजन या संयम ,कौनसा रास्ता देश के हित में है,
कौनसा रास्ता शास्त्रोक्त है,कौनसा रास्ता सृष्टि संचालन के लिए उपयुक्त है। देश के
नागरिकों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा दो ताकि वो खुद निर्णय ले कि उसे कितनी संतान
चाहिये।   

  

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

अनुभूत चुनावी नुस्खे

अनुभूत चुनावी नुस्खे

नुस्खे हर कोई जनता है ,प्रयोग करता है और जब फलदायी होते हैं तो अनुभूत
नुस्खे का टैग मार दिया जाता है। लोकतंत्र भी अजब होता है क्योंकि हर नेता
हर नुस्खे को आजमा कर बैतरणी पार करना चाहता है।

   दो कौम में विवाद पैदा करवाना अनुभूत नुस्खा है इसलिए हर छोटा बड़ा
नेता छूट से इसे इस्तेमाल करता है क्योंकि विवाद से गुस्से का जन्म होता है
और गुस्सा दंगे के रस्ते से गुजर कर या खामोश रहकर वोट में बदल जाता है
और वोट से लोकतंत्र साँसे गिनता है।

   फिकरे कसना और ताने मारना भी सफल नुस्खा रहा है ,आम प्रजा को इसमें
रस आता है और जनता को कोई ताना रास आ गया तो हो जाए बम बम। आम
उम्मीदवार खास नेता में बदल जाता है। अभी एक भाई ने नया प्रयोग किया था
ढोल बजा कर पोल खोलने का ,किसी भी नुक्कड़ पर खड़े हो जाओ और ढोल
बजाकर पोल खोलने का स्वाँग रचो ,अगर स्वाँग असली जैसा लगा तो लोक
खुश और लोक खुश तो लोकतंत्र खुश।

पलटी मारना भी अनुभूत नुस्खा है बस जबान और दिमाग पलटने में गजब
कि फुर्ती चाहिए ,हवा का रुख पहचानो और दिशा बदल लो जिसने भी फुर्ती
से बदली कुछ ना कुछ पद पर चिपका दिया जाता है।

 गुट्टी पिलाने का नुस्खा भी रामबाण ईलाज है चुनाव में। कैसी भी गुट्टी हो
गरीबी मिटाने की हो या महँगाई हटाने की सब चलती है। नाव पार लगने पर
कोई परिणाम प्रजा को नहीं भी मिले तो भी अगले चुनावों में वही गुट्टी पुन:
पिला दो ,पूरा असर दिखायेगी ,शर्तियाँ ईलाज है यह।

 भगवान् के नाम के पर्याय शब्द का रटा लगा दो जैसे -राम ,ईसा,खुदा आदि
और पाँच लाईन के भाषण में सब पर्याय को पढ़ दो ,इससे आपकी छबी पर एक
सिक्का लगेगा जिसे लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता कहा जाता है। यह सिक्का
जो भी लगाने से चुक गया समझो उसका तो डूबना तय है ,नुस्खा यह बताता
है कि एक कसम या वादा जो भी करो इन सबका नाम ले डालो ,हर कौम अपना
बना लेगी और नैया पार लगा देगी।

अनशन और धरना फिर से फैशन में आ गए हैं ,बात बात पर प्रदर्शन करो ,
सड़क पर जोर जोर से समस्या पर गला फाड़ो ,लोग सुनेंगे ,उनकी दुखती
रग को पकड़ो और खुद को मसीहा बताकर रग को दबाओ ,दबाने से जनता
का दर्द हरा हो जाएगा और तड़फड़ा कर बूथ पर ठप्पा लगा देगी और प्रजा
के दुःख से नए लोकयुग का प्रसव होगा जिससे जनसेवक का जन्म होगा ही।

गोल -मोल बातें करो ,बिना परिणाम की कथा सुनाते जाओ,जो कुछ अच्छा
हुआ उसे खुद के खाते में कैसे भी फिट करो और जो भी ख़राब हुआ उसे सामने
वाले के गले में लटका दो।

ये सब करने से भी 272 ना आये तो भी घबराओ मत ,अन्तिम अचूक नुस्खा
अपना लो ,कुछ हरे हरे लक्ष्मीजी के पत्ते हाथ में लो और शम्भुमेले की भीड़
पर उछाल दो ,शर्तियाँ सरकार बना लोगे ,आजमाया हुआ वशीकरण नुस्खा
है सांप नेवले को भी गले मिला देता है।   
        

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

बहुत टर्र टर्र करते हो ना !!

बहुत टर्र टर्र करते हो ना !!

दिल करता है पाँच -सात लाफे चटका दूँ  या फिर पोने दस कोड़े मारु बद जबान को !
जितनी साल जितनी खुराफातें करी थी साले ने पूरी की पूरी गिन गिन कर लिख
डाली दिवार पर ! और तो और उसकी बात को हवा देने के लिए एक गुनाह की
तस्वीर को लाख जगह चिपका डाला और वह भी फोकट में !किस घडी का पाप था
जो खुल कर सामने आ गया !!

क्या हुआ ताऊ,क्यों गर्म भजिये की तरह उफन रहे हो? हमने जानबूझ कर पूछ
लिया।

 अरे! कुछ साल हेराफेरी कर ली तो कौनसा गुनाह कर दिया,आज तक सबने
मिलकर कब पुण्य का काम किया था,65 बरस से यही सब तो हो रहा था ;मेने
थोडा संगठित तरीके से किया ,पूरा गिरोह बनाया ,बड़ी सफाई से चाटा था तिजोरी
को !पूरा का पूरा नहीं डकारा था ,इतना नुगरा नहीं था ,जहाँ -जहाँ नजर गई वहाँ
तक सबको चाटने का मौका दिया,कोई चाटते देख ना ले इसलिए सब पर नजर
भी रखी और तो और इन भिनभिनाती मक्खियों को भी चीनी के दाने वक्त बेवक्त
डालता रहा ,मगर आज ये मक्खियाँ सबके कानों में जा जाकर पोल खोल रही है
और वह भी ऐसे वक्त में जब खाली हो रही जगह को फिर से भरना था !!!

अरे ताऊ ,इनका क्या बुरा मान बैठे ,ये तो भुलक्कड़ हैं ,सब किया धरा माफ कर
फिर से विजयी भव: कह दिया करते हैं। मेने सांत्वना देते हुए कहा

अरे !तुम समय को समझ नहीं पा रहे हो बच्चू ,वक्त बड़ा ख़राब आ रहा है,मेने
पहले ही कहा था मत लाओ सोशल मीडिया को ,इन सबको जाहिल ,अनपढ़ ही
रहने दो पर वो बाप खुद तो चला गया और अब हम छाती कूट कूट कर रो रहे हैं !
ये अखबार वाले कोई कम तंग करते हैं हमको,थोडा सा हाथ सफाई में चुक गये
तो गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाने लगते हैं ,ऐसा रिप्ले दिखाते हैं दिन भर कि
लोग उसे बार बार असली मान लेते हैं और ये जब थकते हैं तो सोशल मिडिया
के करोड़ों मेढ़क टर्र -टर्र करने लग जाते हैं। बोलते हैं पगार लेते हैं तो काम करो,
हम इनके चाकर हैं क्या !जब से ककहरा सीखा है इन लोगों ने तब से उपदेश देने
लगे हैं। ये तो हमारे ही हिये फूटे थे बच्चू ,फिरंगी साहबों के किस्मत ठीक थे ,मजे
से लूट लिया करते थे।

मगर अब तो ताऊ तेरे बचने के रास्ते नहीं दिख रहे हैं मन्ने तो।  मेने ताऊ को छेड़ा

मेरी बात सुन ताऊ गुर्राया और बोला -कम ना समझ हमको बच्चू !हमने दुनियाँ
देखी है, दौ चार टर्राते मेढ़को को पकड़ कर टेंटुआ दबा दूँगा ना सब कुएँ में छलाँग
मारते नजर आयेंगे !!

फिर शुभ काम में देरी क्यों ताऊ ,अभी तो लकड़ी भी तूने ही पकड़ रखी है ,घुमा दे
ताऊ, मेने पुन: उकसाते हुए कहा

ताऊ बोला -छोरे,बात तो तेरी नेक लागे और तेरा नँबर भी पहले आवै मगर सामने
जो समय है ना वो मेढ़कों का ही है। इबकै बार ये मेढ़कों ने मेरे पर ठप्पा मार दिया
और मैं फिर जीत के आ गया तो ये पक्का जाण ले कि सोशल मीडिया कोई कहानी
बन जावेगा!!

मेने जाते जाते कहा -ताऊ फिर तो पक्का जाण कि तेरे करम फुट ही गए।  सोशल
मीडिया तो रहेगा पर तूं कहीं नजर ना आवेगा।              

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

स्थायी सरकार देना जनता की जबाबदारी

स्थायी सरकार देना जनता की जबाबदारी

विभिन्न पार्टियों का मेला ,अपने अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए बनने वाला
विचित्र गठजोड़ क्या यही लोकतंत्र चाहते हैं भारतीय। स्थायी और एक पार्टी की
सरकार ना देकर हमने क्या पाया ?

  यदि कोई राष्ट्रिय दल बहुमत नहीं बना पाता है तो चुनाव के बाद अनुचित शर्तों
पर ,विपरीत विचारधारा की पार्टियों से संख्या बल का जुगाड़ बनाकर पाँच साल
तक देश को बैसाखियों के हवाले कर देने का पाप करने का अधिकार क्यों पा 
जाता है और देश इस पाप को स्वीकार क्यों कर लेता है ?

  जिन राजनैतिक दलों के विचार चुनाव से पहले मिलते नहीं है,जो लोग चुनाव
से पहले एक दूसरे को भरपेट गालियाँ देते हैं ये लोग चुनाव के बाद अपने-अपने
स्वार्थों को पूरा करने के लिए एक दूसरे के गले मिल जाते हैं। यह विचित्र मिलन
देश की जरूरत मान ली जाती है और फिर शुरू हो जाती है लूट ,देश लूटा जा रहा
है उन जनसेवकों के हाथों जो सपथ तो संविधान की रक्षा की लेते हैं मगर रक्षा के
नाम पर लोकतंत्र की लाज को तार-तार करते हैं पाँच साल तक।

    कमी कहाँ है ?जनता के फैसले लेने की क्षमता में या फिर दल गत चली आ रही
राजनैतिक पद्धति में। संविधान कहता है कि देश का प्रधानमंत्री का चुनाव चुने
हुए साँसद करेंगे और चुनाव जीतकर आये हुए साँसद अलग-अलग दुकानों के
प्रतिनिधि जैसे होते हैं उनके लिए चुनाव जीतते ही खुद की दुकान का महत्व बढ़
जाता है और राष्ट्र का हित हासिये पर धकेल दिया जाता है। सांसदों की तोड़जोड़,
खरीद फरोख्त का तमाशा पूरा देश मूक और बधिर बन कर देखता है और फिर
जन्म लेती है वर्ण संकर व्यवस्था ?क्या ऐसी व्यवस्था देश का भला कर पायेगी ?

     यदि कोई दल या चुनाव पूर्व बना गठबंधन बहुमत नही रखता है तो केवल
बड़ा दल होने के नाते उसे सरकार बनाने का न्योता क्यों भेज दिया जाता है जबकि
न्योता भेजने वाला जानता है कि वह अल्पमत वाले को न्योता दे रहा है। यह
अल्पमत वाला न्योता पाकर बहुमत बनाने के लिए क्या करेगा ?खरीदफरोख्त ही
कर सकता है और करता है ?क्या जन्मते ही  काला मुँह करवा लेने वाली व्यवस्था
उजाला करने में सक्षम है ?अगर नहीं, तो फिर न्योता भेजने की रस्म बंद करके
राष्ट्रिय सरकार का विकल्प क्यों नहीं दिया जाता है। जो साँसद चुनाव जीते हैं वो
राष्ट्रिय पक्ष और दूसरे स्थान पर जनमत पाने वाला राष्ट्रिय विपक्ष। केवल कुछ
वोटों से जीतने वाला ही जनमत नहीं रखता है दूसरे स्थान पर रहने वाला भी
जनमत तो रखता ही है और वह दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर पाँच साल
तक राष्ट्रिय विपक्षी दल कि भूमिका अदा कर सकता है।              

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

वक्त का तकाजा है, जाग जाओ।

वक्त का तकाजा है, जाग जाओ।

आज हर ओर देश में राजनैतिक दल हिन्दु समाज को तोड़कर और अल्पसंख्यक को
मुख्य धारा से दूर रखकर सियासत कर रही है इस कुटनीति का परिणाम देश के लिए
घातक सिद्ध हुआ है और होता जा रहा है।

        आज झूठी निरपेक्षता के ठेकेदार दल दो कौमों के बीच झूठे द्वेष के बीज रोपकर
काल्पनिक भय का निर्माण कर रहे हैं ,क्यों? सत्ता भोगने के लिए ही  ना ! तुष्टीकरण
का विनाशक बीज राष्ट्रवाद को निगल रहा है ,यह सब जानते समझते हुए भी शातिर
लोग तुच्छ स्वार्थों को पूरा करने के लिए सूखे चारे में चिंगारी डाल रहे हैं ,क्यों ?ताकि
अवाम उलझा और बँटा रहे और कलंकित झूठी निरपेक्षता सत्ता भोगती रहे।

      हिन्दू समाज को छुआछूत के नाम पर तोड़ने का पाप करने वाले लोग आज
खुद को धर्म निरपेक्ष बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे,हिन्दू समाज में छुआछूत
की बीमारी पहले नहीं थी। रामायण के साक्ष्य हिंदुत्व का चित्र विश्व के सामने रख
चुके हैं।  निषाद, भील, सबरी, जटायु,वानर,काक भुसुंडी आदि से श्री राम के आत्मिक
स्नेहिल सम्बन्ध थे। शुद्र को जाति से जोड़ने का काम इस देश के नेताओं ने किया।
मानव से मानव को लड़ाने का काम करने वाले नेताओं की जमात हिन्दू धर्म के
सिद्धान्तों से शुद्र है।

     हिंदुओं को सांप्रदायिक ठहराने वाले नेताओं को,तुष्टिकरण से अधिकारों का अवैध
हस्तांतरण अन्य लोगों को करने वाले नेताओं को लोकतान्त्रिक तरीके से परास्त
करने का समय आ गया है,इनका बहिष्कार करने का मौका अब हाथ में है।

     इस देश के 70 %से ज्यादा लोग यदि साम्प्रदायिक कहे जायेंगे तो वक्त की माँग
है कि उन अधम नेताओ को चुन -चुन कर चुनाव में परास्त करो ताकि उनके पैर
जमीन पर टिक जाएँ और आगे से कोई भी नाग तुष्टिकरण का जहर उगलने का
दुःसाहस ना करे।

  हिन्दुस्थान में पोषित हो रही विविधता का सरंक्षण ऐरे गैरे नत्थू खैरे नेताओं के
कारण नहीं हुआ है इस विविधता को सींचने का काम हिंदुत्व के विशाल ह्रदय घट
से बहने वाली "जीओ और जीने दो" की पवित्र धारा से, हर प्राणी में परमात्मा को
निहारने वाली निर्मल संवेदना से सम्भव हुआ है।

   हिंदुत्व प्रेम का पर्याय है ,हिंदुत्व बंधुत्व का स्त्रोत है ,हिंदुत्व प्रकाश की लौ है,
हिंदुत्व नर में नारायण की दृष्टि है यदि इस हिन्दुत्व को सांप्रदायिक  कहा जायेगा
तो हमें यह साम्प्रदायिकता हजार बार स्वीकार्य है।  
          
   

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

चिड़ियाँ छोड़ मुर्गी को धाये !!

चिड़ियाँ छोड़ मुर्गी को धाये !!

कामना और लोभ की जब अति होती है तब दानव का जन्म होता है। शास्त्र ने कहा है
अति सर्वत्र वर्जयेत। आचार्य चाणक्य का मानना था कि मनुष्य ना तो ज्यादा सरल
बने और ना अतिशय ईमानदार क्योंकि अति दानी होने के कारण बली को पाताल
लोक में जाना पड़ा , अति ईमानदार होने के कारण राजा हरिशचन्द्र को चाण्डाल
बनना पड़ा और अतिशय रूपवती होने के कारण सीता का अपहरण हुआ।

         देश की सियासत में एक अति महत्वाकांक्षी पार्टी का उदय हुआ जो खुद को
और खुद की पार्टी में शामिल सभी लोगों को ईमानदारी का स्वयं निर्मित ताज पहना
कर उनके ऊपर ईमानदारी का चौबीस केरेट का सिक्का लगा महसूस करती है और बाकी 
सब को चोर समझती है ,इनके मुताबिक़ संविधान में प्रावधान नहीं है तो संविधान
को ठेंगा बताये और संविधान से इनके स्वार्थ की पूर्ति होती है तो उस बेकार संविधान
को पवित्र मान उसकी दुहाई दे दे। राह चलता उदंड किसी सज्जन को गाली बक कर
यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि इस महाशय ने जो भी समाजोपयोगी काम किये
हैं उसमें उनकी मेहनत के अलावा हराम के धन का उपयोग किया है तो हो सकता है लोग
उस सज्जन पर शंका करें मगर उस उदंड के पास पहले से भी खोने के लिए कुछ भी ना था
और अब भी कुछ नहीं है लेकिन समाज को उसकी उदंडता से एक नुकसान जरुर होता है
की सज्जन लोग समाजोपयोगी काम करने से विरक्त हो जाये।

         एक किसान ने खेत पर पाले हुए कुत्ते को एक दिन गाँव में लाने की सोची।किसान
ने सोचा कि गाँव की गलियों के कुत्ते उस पर हमला ना कर दे इसलिए उस कुत्ते के गले
में पट्टा बाँध बैलगाड़ी के निचे बाँध दिया और बैलगाड़ी को गाँव की ओर हाँक दिया। कुत्ता
बैलगाड़ी के निचे सुरक्षित चल रहा था। कुछ देर बाद जब गाँव में बैलगाड़ी ने प्रवेश किया
तो गलियों के कुत्तों ने खेत के कुत्ते से पूछा -भाई ,आप बैलगाड़ी के निचे हम लोगों से डर
कर क्यों चल रहे हो ?तुम और हम तो एक ही जाति से हैं। कुत्ते ने बहाना बनाते हुए कहा -
भाइयों,मैं आपसे डर नहीं रहा हूँ। कुछ देर रुक कर शेखी मारते हुए बोला -आप लोग तो
निकम्मे बन गए हो ,मुफ्त कि रोटियाँ तोड़ रहे हो और मेरे ऊपर अभी बेलों सहित मालिक
को सुरक्षित घर पहुँचाने कि जबाबदेही है ,इन सबका बोझ उठाते हुए मैं महत्वपूर्ण सेवा में
व्यस्त हूँ। सभी कुत्ते उसकी शेखी सुनकर उस पर भौंकने लगे। कहने का आशय यही है कि
मनुष्य कभी ये ना समझे कि उससे ज्यादा बुद्धिमान कोई भी नहीं है और ना भविष्य में
जरुरत पड़ने वाली है।

        आचार्य चाणक्य ने कहा है कि अनिश्चित और निश्चित में से निश्चित का ही महत्व
है चाहे उसका फल छोटा भी क्यों ना हो। कल मिलने वाले मुर्गे की आकांक्षा के चलते आज
जो हाथ में चिड़ियाँ है उसको छोड़ देने वाला मुर्ख होता है। व्यक्ति जब अति लोभी बनता है
तो उसके लोभ के कारण वह अपने कुनबे के सर्वनाश का कारण बनता है  उस कुनबे की
हालत उस मक्खी जैसी होती है जो मीठे के लोभ में शहद पर बैठ जाती है और अपने पँख
शहद से लिपटा कर अपनी मौत का कारण खुद बनती है।               

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

अजीब आदमी

अजीब आदमी 

एक गाँव में एक विचित्र आदमी ने प्रवेश किया। गाँववालों ने उसके अजीब और
नवीन विचार सुनकर उसे अच्छे निवास में ठहरा दिया। वह आदमी सम्मान
पाकर खुश हुआ और प्रतिदिन विचित्र प्रयोग और विचार रखने लगा। गांववालों
को उसके विचित्र विचार कसौटी पर कसने के योग्य लगे। एक दिन सब
मिलकर उस आदमी के पास गये और बोले -हम आपके विचारों का आदर करते
हैं ,इसलिए आपको अपना आदरणीय मानते हैं। आप उच्च स्थान पर विराज कर
अपने विचारों को सत्य की कसौटी पर कस के दिखाये।

उस आदमी ने ना -नुकर की, जब गाँव वाले नहीं माने तो उच्च आसन की ओर
बढ़ गया और आसन पर बैठ कर विचित्र प्रयोग दिखाने लगा। उसके हर प्रयोग
असफल होने लगे तो वह आसन से उठ कर दौड़ने लगा। उसे दौड़ता देख सब
लोग उसके पीछे हो गये। वह आदमी दौड़ता -दौड़ता गाँव की पानी की टंकी पर
चढ़ गया।

उसने ऊपर से चिल्ला कर गाँव वालों से कहा -मेरे प्रयोग जो मुझे ठीक लग रहे
थे मेने किये ,मगर तुम लोगों का नजरिया सही नहीं था इसलिए मेरे सभी प्रयोग
आप लोगों को असफल लगे। अब मैं आर -पार का प्रयोग करूंगा। मैं अब पानी
की टंकी के ऊपर से सिर के बल गिरूँगा ,यदि जीवित बचा तो आप नेता मान लेना
और मर गया तो शहीद का सम्मान देते रहना।

गाँव वाले निचे खड़े -खड़े ऊपर ताक रहे थे एक बुजुर्ग ने कहा -गाँव वालों, इसकी
आत्म हत्या का पाप हमें भी लगेगा।

एक ने पूछा -हम पाप के भागी कैसे हुए ?

बुजुर्ग ने जबाब दिया -हमने अपनी अक्ल का उपयोग किये बिना इतने दिन
इसके विचित्र प्रयोग पर तालियाँ बजाते रहे इसलिए। यदि हम उसे पहले ही
दिन मुर्ख मान लेते तो यह अवसर नहीं आता।    

संख्या का खेल बन गया लोकतंत्र

संख्या का खेल बन गया लोकतंत्र 

क्या +1 ही लोकतंत्र का मतलब रह गया है ,यदि संख्या या आँकड़ा का ज्यादा होना
लोकतंत्र कहा जायेगा तो यह अधूरी परिभाषा ही रहेगी क्योंकि कम हँस अधिक
बगुलों से हमेशा ही हारते रहेंगे।

संविधान की सपथ लेने वाले प्रधानमंत्री ,मुख्यमंत्री ,मंत्री और सभी जनसेवक
केवल सपथ की रस्म अदायगी करते हैं मगर उनका ह्रदय संविधान के प्रति
कभी संवेदनशील नहीं रहा (कुछ अपवाद को छोड़कर )फिर इस रस्म अदायगी
का दिखावा और आडम्बर क्यों ?

तेलंगाना और सीमांध्र के लोगों की संवेदना कोई भी राष्ट्रिय दल अभी तक
समझने की कोशिश नहीं कर पाया ,सभी दल अपनी -अपनी रोटी सेकने में
व्यस्त हैं ,क्या राष्ट्र से बड़ा दल इसे ही लोकतंत्र कहा जायेगा ?

तीन भाइयों में से दौ यदि हमेशा गलत बात पर एक मत हो जायेंगे तो वह
गलत मत ही कानून बन जाएगा और इस परिभाषा को हम लोकतंत्र के नाम
से स्वर्ण अक्षरों में लिखेंगे ?

शास्त्र कहते हैं हजार असत्य के सामने एक सत्य भी भारी पड़ता है लेकिन लोकतंत्र
कहता है 51 झूठ बड़े हैं 49 सच के समक्ष। इसमें झूठ कौन कह रहा है ,सोचो जरा।

क्या संवेदना,भावना ,प्रेम सब मिलकर भी निष्ठुर आँकड़े के सामने बौने नहीं हो
जाते हैं लोकतंत्र में। /पाँच मत ने कहा -बलात्कार में कुछ गलत नहीं होता है और
चार मत ने कहा -बलात्कार जघन्य अपराध है ऐसी परिस्थिति में लोकतंत्र किसकी
दुहाई देगा ?

क्या जनभावना के मुद्दे पर या विवादस्पद मुद्दे पर सारे देश के लोगों का मत लेकर
निर्णय हो या कुछ चुने हुए व्हिप वाले नुमायंदों का मत परीक्षण से सही गलत का
निर्णय योग्य मान लिया जाये ?

लोकतंत्र तो निष्ठुर भी हो सकता है जब जन भावना के विरुद्ध आंकड़े की ताकत
पर खड़ा हो जाता है।

चुने हुए नुमायंदे जब कानून को शर्मसार करते हैं तब उन्हें सजा कौन देगा और
कितनी देगा ,यह कौन तय करें -जनता या अँधा कानून।

आज जो संसद में हुआ या कई बार विधानसभाओं में होता है उस मारा मारी को
प्रोत्साहन और पोषण किसने दिया ?ऐसे कुकृत्य आतंकवाद की परिभाषा से
बाहर क्यों रखे जाते हैं क्यों नहीं उसे पद से निरस्त मान कर दण्डित किया जाये
या आजीवन कैद की सश्रम सजा दी जाये।       

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

लोकतंत्र में यह भी चलता है …………

 लोकतंत्र में यह भी चलता है  ………… 

जब -जब चुनाव का बिगुल बजता है तब लोकतंत्र में यह सब भी चलता है,
बिना काम किये कुछ अन्धे नेता सत्ता इन तरीकों को आजमा कर पाना 
चाहते हैं। जैसे - 

गँवार 
लोकतंत्र चुनाव के उत्सव से मजबूत होता है और उसकी तैयारी में टुच्चे नेता 
सुनसान जगह पर जा कर अपने भाषण की तैयारी में लगे हैं। अपनी प्रतिध्वनि 
की परवाह किये बिना नेता जोर से एक बार चीखता है और प्रतिध्वनि अधिक 
बार उसके कानो में गूंजती है -
1. उल्लू ,उल्लू,उल्लू 
2. जहर ,जहर, जहर 
3. कुत्ता ,कुत्ता ,कुत्ता 
4.खुनी,खुनी,खुनी 
5. साँप ,साँप ,साँप 
6. चोर ,चोर चोर 
7. हिटलर ,हिटलर ,हिटलर 
8. मौत का सौदागर,मौत का सौदागर ,मौत का सौदागर 
9. सांप्रदायिक,सांप्रदायिक ,सांप्रदायिक 
10. झूठा ,झूठा,झूठा 
11. बच्चे की कसम,  बच्चे की कसम ,बच्चे की कसम 
12. लुटेरे ,लुटेरे लुटेरे 

बेहरूपिया -
कुछ बगुले नेता ,कुछ आडंबरी नेता ,कुछ स्वार्थी नेता बेहरूपिया बन लोकतंत्र 
को मजबूत करने की फिराक में हैं उनके झोले में पगड़ी है,टोपी है ,माला है ,
रामनामी दुपट्टा है,बाईबिल है ,रामायण है ,कुरान है,ग्रंथ साहिब है ,कभी 
श्लोक पढ़ते हैं ,कभी आयत बुदबुदाते हैं ,कभी यीशुवाणी गाते हैं … ये सब देख 
बेहरूपिये अपना धंधा छोड़ पुरुषार्थ का काम करने लग गए ,मेहनती बन गए हैं  

भांड -
 चाटुकारिता कभी भांड जाति की बपौती थी ,दादा -परदादा के जमाने से 
बेचारे चाटुकार बन पेट पालते थे ,जब से लोकतंत्र आया है तब से इनका धंधा 
निकम्मे नेताओं ने अपना लिया है अब एक मौहल्ले में नेता हिन्दू के पैर पड़ता 
है ,दूसरे मौहल्ले में मुस्लिम के सिजदा करता है ,तीसरे मौहल्ले में सिक्ख की 
चरण रज माथे पर लगाता है चौथे मौहल्ले में क्रॉस को गले में लटकाता है और 
अलग -अलग गीत गाता है।      

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

गरीब लोकतन्त्र से दान पाते हैं पूँजीपति

गरीब लोकतन्त्र से दान पाते हैं पूँजीपति 

शास्त्र और विद्धवानों के मत के अनुसार दान करना समाज के प्रति उत्तम कर्तव्य
को निभाना है इसलिए हर धर्म में दान का बहुत महत्व है। शास्त्रों ने दान देने और
लेने दोनों को योग्य पात्र होना जरुरी माना है। अगर दान देने वाला योग्य पात्र नहीं
है तो उसके द्वारा दिया हुआ दान तथा दान लेने वाला योग्य पात्र नहीं है तो भी उसे
दिया गया दान महत्वहीन काम है जिसे नहीं किया जाना चाहिए।

    हमारा देश आर्थिक रूप से गरीब लोकतंत्र है और इसका संचालन गरीब लोगों
पर अप्रत्यक्ष तथा प्रत्यक्ष कर लगाकर किया जा रहा है मगर जब यह गरीब
लोकतंत्र कर के पैसे का दान पूंजीपतियों को दोनों हाथों से करता है तब आम
भारतीयों पर क्या गुजरती होगी इसकी चिंता भी यह गरीब लोकतंत्र आज तक
नहीं कर पाया है।

   इस देश के पूंजीपति एक तरफ लोकतंत्र से दान पाने का खुद को उचित अधिकारी
ठहराते हैं और बड़ी राशि ,भूमि ,कर की छूट और अन्य तरीके से दान डकारते रहते
हैं और गरीब लोकतन्त्र भी इनको दान देकर प्रोत्साहित करता रहता है। तर्क यह
दिया जाता है की धनकुबेरों को दान लुटाने से देश का विकास होता है और फिर विकास
के नाम पर गरीबों पर कर का बोझ बढ़ा दिया जाता है और अमीरों को दान कर दिया
जाता है।

   वो भी एक समय था जब भामाशाह ने अपनी सम्पति राणा प्रताप के पास कुछ
भी धन नहीं बचा था तब राज्य की आन मान और शान बनी रहे इसके लिए दान
कर दी और आज का भामाशाह इस समय के धनहीन राणा से दान माँगता रहता
है और धनहीन आज का राणा उनको जनता के कर के पैसे लूटा कर खुद को
गौरवान्वित भी महसूस करता है। किसी को SEZ ,किसी को टैक्स में छूट,किसी को
उद्योग के नाम पर रोकड़  … सब कुछ बाँटा जा रहा है और ऊपर से ठप्पा विकास का।

    आम आदमी को गैस सिलेंडर के लिए पात्रता दिखानी है ,गरीब किसान के लिए धन
दान देने पर कम पड़ जाता है ,छोटे व्यापारी को हजार सवाल करके लौटा दिया जाता
है ,विधवा बहनों को टुच्ची रकम (चार -पाँच सौ रुपया महीना )दे दी जाती है ,बेरोजगार
युवाओं को,वंचित वर्ग को ,आदिवासी जनजातिओं को,निर्धन भारतीयों को जो वास्तव
में लोकतंत्र से कुछ सहायता पाने की पात्रता रखते हैं उसे आज तक क्या मिला ?एक
भारत में दौ भारत किसने विकसित होने दिए और क्यों ?क्या किसी लोकतंत्र के प्रहरी
के पास इन सवालों का जबाब है। लोकतंत्र का मतलब यह नहीं होता है कि वह मुठ्ठी
भर लोगों के हित की रक्षा करता रहे और बहुत बड़े वर्ग को आश्वासन की घुट्टी पिलाता
रहे। यदि आम आदमी सरकारी अनुदान के बिना अपने पुरुषार्थ के बल पर अपना जीवन
चला सकता है तो पूंजीपतियों को बेवजह गरीब जनता का धन मुफ्त में बाँटने का हक़
लोकतंत्र की सरकारों को क्यों है ?
       
    जनता के कर के पैसे से पूंजीपति अपना घर सब्सिडी के नाम पर भर कर कैसा आदर्श
दिखाना चाहते हैं ?दान वंचित ,निर्धन ,असहाय,पीड़ित और जरुरत मंद के लिए हो तभी
सार्थक है।    

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

अच्छा काम

अच्छा काम

कुछ लोग गरीब रहने पर अपराध करते हैं ,चोरी करते हैं या असामाजिक 
गतिविधियों में लिप्त रहते हैं मगर कुछ लोग गरीब जरुर हैं मगर अच्छा 
काम करके परिवार पालते हैं। ये शख्स सड़क किनारे खड़ा रहकर,प्रतिदिन 
6 से 8 घंटे महापुरुषों के विचारों के पोस्टर बेच कर परिवार पालता है। कभी 
गुजारे योग्य पोस्टर बिक जाते हैं और कभी खाली हाथ घर लौटना पड़ता है 
क्या हम इस भारतीय पर गर्व करते हैं    



गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

लक्ष्य ,दिशा और गति

लक्ष्य ,दिशा और गति 

हर व्यक्ति अपने जीवन में सफल होने कि इच्छा रखता है और प्रयत्न भी करता है
फिर क्या कारण है कि अधिकांश अपने जीवन में साधारण ही बने रहते हैं। क्या
इसे विधि का विधान मान लिया जाये ?वेद और शास्त्र इस विचार से सहमत नहीं
हैं। शास्त्र हमे चरैवेति का सिद्धांत सिखाते हैं ,कर्म का ज्ञान देते हैं फिर क्या कारण
है कि लोग पिछड़ जाते हैं।
                   लक्ष्य कैसा हो ?
  सफलता के लिए हर एक के लिए लक्ष्य का होना आवश्यक है ,लक्ष्य स्पष्ट होना
चाहिए और अलग-अलग ध्रुव के विकल्पों को साथ लेकर नहीं बनाना चाहिए। जैसे
यदि मैं डॉक्टर नहीं बन सका तो बड़ा इंजिनियर बन जाऊँगा। लक्ष्य अपनी रूचि के
आधार पर तय किया जाना चाहिए ,किसी का थोपा हुआ नहीं हो। लक्ष्य की प्राप्ति
में समय का सही प्रबंध होना चाहिए ,अगर लक्ष्य बड़ा है तो ज्यादा और छोटा है तो
कम लेकिन समयावधि जरुर होनी चाहिए।
                         हमारी दिशा क्या हो - लक्ष्य तय करने के बाद हमें अपनी
दिशा तय करना चाहिए ,अक्सर लोग अपने लक्ष्य को बना लेते हैं और उसका हर
जगह ढिंढोरा पीटते रहते हैं मगर क्रियान्वित नहीं कर पाते क्योंकि वो अपने लक्ष्य
कि ओर मुँह करके चलना तो शुरू करते हैं लेकिन कुछ समय बाद फिर अपना
मुँह विपरीत दिशा में कर लेते हैं या लक्ष्य को बार-बार बदलते जाते हैं। लक्ष्य
पर चलने के लिए धैर्य की जरूरत होती है मगर लोग जल्द ही ऊबने लगते हैं या
अपने आत्मविश्वास को स्वयं ही कम कर लेते हैं और जिधर से चले थे उधर का
रुख कर लेते हैं

                    गति कैसी हो ?    -जब हम अपना लक्ष्य तय कर लेते हैं और दिशा
सही कर लेते हैं इसका मतलब अब हमें अपने लक्ष्य की ओर चलना है। कुछ लोग
अति उत्साह में आकर लक्ष्य की दिशा में तेज गति से भागने लगते हैं और कुछ
लोग लक्ष्य प्राप्ति में काफी समय हाथ में है यह सोचकर मंद गति से चल पड़ते हैं
मगर अफसोस   … ये दोनों ही लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। जो लोग शुरू में
तेज गति रखते हैं वे जल्दी थक जाते हैं जैसे तेज बारिस से बचने के लिए दौड़
लगाने वाला जल्दी ही पूरा भीग जाता है और मंद गति से चलने वाले का भी यही
हाल होता हैं। हितोपदेश में हँस और कौए की कहानी है जो लम्बे लक्ष्य के लिए
उड़ते हैं ,कौआ शुरू में तेज चाल से उड़ता है और समुद्र के ऊपर से गुजरते समय
थक जाता है और समुद्र में डूब कर मृत्यु को प्राप्त होता है और हँस अपनी मध्यम
चाल से उड़ता हुआ मानसरोवर पहुँच जाता है। हमें अपनी गति मध्यम रखनी
चाहिए ताकि मार्ग की बाधाओं को धीरज से पर करते हुए समय पर लक्ष्य को
प्राप्त कर सके।        

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

चल,धरने पर बैठ जाते हैं

चल,धरने पर बैठ जाते हैं 

धरना बहुत सी बीमारियों का रामबाण ईलाज तो है ही ,साथ ही साथ अपनी असफलता
को भी छिपाने का सांगोपांग तरीका है।
धरने की खास बात यह है कि इससे लोगों से मेलजोल और पहचान का दायरा बढ़ता है
जिसे हम जानते भी नहीं वो भी एक नजर धरने पर बैठे लोगों पर मार ही लेता है।
धरने से हम अपनी नाजायज बात मनवाने की सफल कोशिश करते हैं क्योंकि जायज
बात तो कानून यूँ ही मनवा देता है या कुछ समय लेकर मनवा देता है।
धरने पर बैठने से हम अपनी मनमानी कर सकते हैं क्योंकि दूसरे मंच बात की तह तक
जाते हैं और बात उपयोगी होने पर ही मानी जाती है।
धरने का एक रूप का वर्णन रामायण काल में भी है इसलिए हम इसे प्राचीन विद्या भी
कह सकते हैं।
धरने के डर से सरकारें सीधे-सीधे चलती है, मालिक व्यवहारिक बने रहते हैं और पति
आज्ञाकारी शिष्य जैसा व्यवहार करते हैं।
धरना किसी भी मौसम में करो अनुकूल ही रहता है। धरने के लिए धुँआ उठना ही काफी
है आग तो बाद में खु ब खुद लग ही जाती है।
धरना यदि दिल को छूने वाली समस्याओं पर हो तो राजा बना सकता है,धरना यदि
आडम्बर फैलाने का हो तो प्रसिद्धि दिला सकता है,धरना यदि नाकामयाबी ढ़कने का हो
तो कामयाबी दिला सकता है।
जब भी काम करने का जी नहीं करें तो धरने पर बैठ जाना उत्तम आसन है ,विरोधी
टाँग खींचे और माकुल जबाब ना हो तो धरना टाँग छुड़ाने का उत्तम उपाय होता है,जब
भी विरोधी गलती करे तब धरने पर बैठना उसको नानी याद करवाने का उत्तम पेच
होता है।
धरना निराशा में आशा की लकीर खींचता है,धरना जबाबदेही से मुक्ति दिलाता है,धरना
अयोग्यता को छिपाता है,धरना मन के द्वेष को अभिव्यक्ति की आजादी में बदल देता
है,धरना हारने के बाद खेला जाने वाला गुरिल्ला दाँव है।
धरना देने के लिए अक्सर खाली रहने वाले स्थान उपयुक्त रहते हैं मगर वह शहर के बीच
में हो ताकि समय व्यतीत करने वालो कि सैरगाह बने रह सकें।
धरना दूसरों पर वजह या बेवजह देख कर नहीं दिया जाता है जब जी करे बैठ जाया करें।
धरना तर्क से नहीं दिया जाता है केवल स्वार्थ साधने के लिए दिया जाता है।
धरने को सफल बनाने के लिए शामयाने,प्रकाश ,पानी ,माईक,दरी,कम्बल,पत्रकार ,पुलिस
चाय,और मुफ्त खाना होना आवश्यक है ताकि जन साधारण कुछ दिन रुक सके।
धरने से हम अपनी जबान को तौल सकते हैं -जैसे चीख कितनी दूर जाती है,चीख मिठ्ठी
है या तेजाबी ,चीखने के बाद दांत सलामत रहते हैं या नहीं।
धरने से अपनी गलती को दूसरे पर थोपना आसान रहता है,धरने से एक साथ लाखों लोगों
को मुर्ख बनाया जा सकता है।
धरना कोई नेता ही दे यह जरुरी नहीं,धरना आम आदमी का शस्त्र है यदि धरने से खास
आदमी बन गये तो क्या कहने और अगर नहीं बन पाए तो आम आदमी पक्का बने
रहोगे उससे नीचे की पायदान पर नहीं गिरोगे।
यह सब पढ़ कर क्या नहीं लगता -चल यार ,धरने पर बैठ जाते हैं                         

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

आम आदमी

आम आदमी 

आम आदमी को ठग लेता है आम आदमी
आम आदमी से झूठ बोलता है आम आदमी
आम आदमी को धोखा देता है आम आदमी
आम आदमी को मुर्ख मानता है आम आदमी
आम आदमी को सपने दिखाता है आम आदमी
आम आदमी से कसमें वादे करता है आम आदमी
आम आदमी को ठेंगा दिखाता है आम आदमी
फिर भी -
बहुत भोला है आम आदमी
सहज विश्वास करता है आम आदमी
लोकतंत्र को मानता है आम आदमी
हर बार फँसता है चक्रव्यूह में आम आदमी
कभी महँगाई से बिलबिलाता आम आदमी
कभी भूख से पेट पकड़ता आम आदमी
कभी रोजी को तरसता आम आदमी
कभी बाबुओं के चक्कर में पिसता है आम आदमी
कभी नेताओं के चक्कर में फँसता है आम आदमी
कभी बाबाओं की किरपा झेलता है आम आदमी
कभी निराशा में डूबता है आम आदमी
कभी सपनो में तैरता है आम आदमी
मगर -
सब कुछ सह कर भी जिन्दा है आम आदमी
हर एक गलती से सीखता है आम आदमी
समझते हैं नेता-  सोता हुआ शेर है आम आदमी
आम आदमी जानता है- ताकत आम आदमी
बड़े बड़े नेताओं को झटके में बना देता है आम आदमी      

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

उल्लू और चमगादड़ का शास्त्र

उल्लू और चमगादड़ का शास्त्र

क्या पता था उल्लू महाशय को कि एक समय ऐसा भी आयेगा जब लोकतंत्र में उसकी
विचारधारा पर भी चिंतन ,मनन ,शास्त्रार्थ और अनुकरण होगा। ज्ञानी और विद्धवान
उसकी जय जयकार करेंगे और आम जनता उसे प्रमुख योग्य प्रशासक के रूप में
विराजमान कर देगी।

 उल्लू जाति की खास विशेषता है कि वो अपने अनुभवों को ही सही ठहराते हैं और
उस पर डटे रहते हैं। जिस दिन से उल्लुओं के मुखिया ने अपनी बिरादरी को कहा कि
सूरज रात में उगता है ,दिन में नहीं उगता है इसलिए हमें सबके आदर्शो को छोड़
सनातन सत्य को छोड़ इसी बात पर डटे रहना है और अपनी दिनचर्या रात से ही शुरू
करनी है तब से आज तक उल्लू बिरादरी इसी सत्य पर डटी है।

हमने जब एक उल्लू से पूछा की आप इस ग्लोबल युग में इस परिपाटी को क्यों
पकडे हैं तो उसने बताया -यह विशेषता हमें सबसे अलग चितरती है क्योंकि हम
कोई टोपी,झण्डा या बैनर लेकर प्रचार नहीं कर सकते इसलिए इसी परिपाटी को
चलन में रखे हुए हैं ?

मेने उल्लू से फिर सवाल किया -क्या आपकी इस अनूठी विचारधारा का किसी ने
अनुकरण भी किया है ?

उल्लू बोला -हाँ ,हमारी सोच सबसे अनूठी थी हँस और बाकी पक्षियों ने भले ही उसे
अव्यवहारिक कदम ठहराया हो अगर हमारे प्रिय चमगादड़ समुदाय ने इस सत्य को
पहचाना और हमारा पूर्ण सहयोग किया ,वे भी अब रात्रिकाल को ही दिन मान कर
विचरते हैं।

मेने फिर उल्लू से पूछा - आपके शास्त्र में और भी कोई खास बात लिखी है ?

उल्लू बोला -जिसने भी हमारे शास्त्र का अध्ययन किया है वह बड़ा नेता या राजा ही
बना है,चाहे वह पशु हो या मनुष्य। हमारी बिरादरी की सँख्या हर क्षेत्र में बढ़ती जा रही
है,नेता लोग अपनी जनता को बड़ी खूबी से हमारे शास्त्र की घुटी पिलाते रहे हैं और
अपना-अपना व्यवसाय चलाते रहे हैं।

मेने पूछा - आप अपने प्रिय चमगादड़ शास्त्र पर भी कुछ प्रकाश डालेंगे ?

उल्लू बोला -वैसे तो वे हर बात पर हमारा अनुसरण करते हैं मगर उनकी खास बात ये
है कि वे हम जब बोलते हैं तब अपनी बुद्धि का उपयोग और इस्तेमाल बंद कर देते हैं।

मेने पूछा -उल्लू महाशय,क्या आपने चमगादड़ साथियों से भी कुछ सिखा है ?

उल्लू बोला -हमे चमगादड़ समुदाय का विचार बहुत प्रिय लगता है जिसे हम पुरे
होशो हवास से समर्थन देते हैं   …

मेने पूछा -वो कौनसा विचार है ?

उल्लू बोला -चमगादड़ समुदाय का मानना है की यह आकाश उनकी बदोलत ही पृथ्वी
पर गिरता नहीं है इसलिए वे जब नींद भी लेते हैं तो आकाश को अपने पंजो पर थामे
रहने का काम करते हुए लेते हैं ,बड़े भक्त लोग हैं ये ,हमें भी यही लगता है कि यह
आकाश चमगादड़ की वजह से गिर नहीं रहा है और हम भी एक बैठक बुला कर उल्लू
समाज को पंजों को ऊपर रख सोने का प्रस्ताव पास करवाएंगे।

उल्लू का उत्तर सुन मैं विचारों में खो गया मेरे ख्यालों में मेरा लोकतंत्र था।