शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

संख्या का खेल बन गया लोकतंत्र

संख्या का खेल बन गया लोकतंत्र 

क्या +1 ही लोकतंत्र का मतलब रह गया है ,यदि संख्या या आँकड़ा का ज्यादा होना
लोकतंत्र कहा जायेगा तो यह अधूरी परिभाषा ही रहेगी क्योंकि कम हँस अधिक
बगुलों से हमेशा ही हारते रहेंगे।

संविधान की सपथ लेने वाले प्रधानमंत्री ,मुख्यमंत्री ,मंत्री और सभी जनसेवक
केवल सपथ की रस्म अदायगी करते हैं मगर उनका ह्रदय संविधान के प्रति
कभी संवेदनशील नहीं रहा (कुछ अपवाद को छोड़कर )फिर इस रस्म अदायगी
का दिखावा और आडम्बर क्यों ?

तेलंगाना और सीमांध्र के लोगों की संवेदना कोई भी राष्ट्रिय दल अभी तक
समझने की कोशिश नहीं कर पाया ,सभी दल अपनी -अपनी रोटी सेकने में
व्यस्त हैं ,क्या राष्ट्र से बड़ा दल इसे ही लोकतंत्र कहा जायेगा ?

तीन भाइयों में से दौ यदि हमेशा गलत बात पर एक मत हो जायेंगे तो वह
गलत मत ही कानून बन जाएगा और इस परिभाषा को हम लोकतंत्र के नाम
से स्वर्ण अक्षरों में लिखेंगे ?

शास्त्र कहते हैं हजार असत्य के सामने एक सत्य भी भारी पड़ता है लेकिन लोकतंत्र
कहता है 51 झूठ बड़े हैं 49 सच के समक्ष। इसमें झूठ कौन कह रहा है ,सोचो जरा।

क्या संवेदना,भावना ,प्रेम सब मिलकर भी निष्ठुर आँकड़े के सामने बौने नहीं हो
जाते हैं लोकतंत्र में। /पाँच मत ने कहा -बलात्कार में कुछ गलत नहीं होता है और
चार मत ने कहा -बलात्कार जघन्य अपराध है ऐसी परिस्थिति में लोकतंत्र किसकी
दुहाई देगा ?

क्या जनभावना के मुद्दे पर या विवादस्पद मुद्दे पर सारे देश के लोगों का मत लेकर
निर्णय हो या कुछ चुने हुए व्हिप वाले नुमायंदों का मत परीक्षण से सही गलत का
निर्णय योग्य मान लिया जाये ?

लोकतंत्र तो निष्ठुर भी हो सकता है जब जन भावना के विरुद्ध आंकड़े की ताकत
पर खड़ा हो जाता है।

चुने हुए नुमायंदे जब कानून को शर्मसार करते हैं तब उन्हें सजा कौन देगा और
कितनी देगा ,यह कौन तय करें -जनता या अँधा कानून।

आज जो संसद में हुआ या कई बार विधानसभाओं में होता है उस मारा मारी को
प्रोत्साहन और पोषण किसने दिया ?ऐसे कुकृत्य आतंकवाद की परिभाषा से
बाहर क्यों रखे जाते हैं क्यों नहीं उसे पद से निरस्त मान कर दण्डित किया जाये
या आजीवन कैद की सश्रम सजा दी जाये।       

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