रविवार, 16 फ़रवरी 2014

चिड़ियाँ छोड़ मुर्गी को धाये !!

चिड़ियाँ छोड़ मुर्गी को धाये !!

कामना और लोभ की जब अति होती है तब दानव का जन्म होता है। शास्त्र ने कहा है
अति सर्वत्र वर्जयेत। आचार्य चाणक्य का मानना था कि मनुष्य ना तो ज्यादा सरल
बने और ना अतिशय ईमानदार क्योंकि अति दानी होने के कारण बली को पाताल
लोक में जाना पड़ा , अति ईमानदार होने के कारण राजा हरिशचन्द्र को चाण्डाल
बनना पड़ा और अतिशय रूपवती होने के कारण सीता का अपहरण हुआ।

         देश की सियासत में एक अति महत्वाकांक्षी पार्टी का उदय हुआ जो खुद को
और खुद की पार्टी में शामिल सभी लोगों को ईमानदारी का स्वयं निर्मित ताज पहना
कर उनके ऊपर ईमानदारी का चौबीस केरेट का सिक्का लगा महसूस करती है और बाकी 
सब को चोर समझती है ,इनके मुताबिक़ संविधान में प्रावधान नहीं है तो संविधान
को ठेंगा बताये और संविधान से इनके स्वार्थ की पूर्ति होती है तो उस बेकार संविधान
को पवित्र मान उसकी दुहाई दे दे। राह चलता उदंड किसी सज्जन को गाली बक कर
यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि इस महाशय ने जो भी समाजोपयोगी काम किये
हैं उसमें उनकी मेहनत के अलावा हराम के धन का उपयोग किया है तो हो सकता है लोग
उस सज्जन पर शंका करें मगर उस उदंड के पास पहले से भी खोने के लिए कुछ भी ना था
और अब भी कुछ नहीं है लेकिन समाज को उसकी उदंडता से एक नुकसान जरुर होता है
की सज्जन लोग समाजोपयोगी काम करने से विरक्त हो जाये।

         एक किसान ने खेत पर पाले हुए कुत्ते को एक दिन गाँव में लाने की सोची।किसान
ने सोचा कि गाँव की गलियों के कुत्ते उस पर हमला ना कर दे इसलिए उस कुत्ते के गले
में पट्टा बाँध बैलगाड़ी के निचे बाँध दिया और बैलगाड़ी को गाँव की ओर हाँक दिया। कुत्ता
बैलगाड़ी के निचे सुरक्षित चल रहा था। कुछ देर बाद जब गाँव में बैलगाड़ी ने प्रवेश किया
तो गलियों के कुत्तों ने खेत के कुत्ते से पूछा -भाई ,आप बैलगाड़ी के निचे हम लोगों से डर
कर क्यों चल रहे हो ?तुम और हम तो एक ही जाति से हैं। कुत्ते ने बहाना बनाते हुए कहा -
भाइयों,मैं आपसे डर नहीं रहा हूँ। कुछ देर रुक कर शेखी मारते हुए बोला -आप लोग तो
निकम्मे बन गए हो ,मुफ्त कि रोटियाँ तोड़ रहे हो और मेरे ऊपर अभी बेलों सहित मालिक
को सुरक्षित घर पहुँचाने कि जबाबदेही है ,इन सबका बोझ उठाते हुए मैं महत्वपूर्ण सेवा में
व्यस्त हूँ। सभी कुत्ते उसकी शेखी सुनकर उस पर भौंकने लगे। कहने का आशय यही है कि
मनुष्य कभी ये ना समझे कि उससे ज्यादा बुद्धिमान कोई भी नहीं है और ना भविष्य में
जरुरत पड़ने वाली है।

        आचार्य चाणक्य ने कहा है कि अनिश्चित और निश्चित में से निश्चित का ही महत्व
है चाहे उसका फल छोटा भी क्यों ना हो। कल मिलने वाले मुर्गे की आकांक्षा के चलते आज
जो हाथ में चिड़ियाँ है उसको छोड़ देने वाला मुर्ख होता है। व्यक्ति जब अति लोभी बनता है
तो उसके लोभ के कारण वह अपने कुनबे के सर्वनाश का कारण बनता है  उस कुनबे की
हालत उस मक्खी जैसी होती है जो मीठे के लोभ में शहद पर बैठ जाती है और अपने पँख
शहद से लिपटा कर अपनी मौत का कारण खुद बनती है।               

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