सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

स्थायी सरकार देना जनता की जबाबदारी

स्थायी सरकार देना जनता की जबाबदारी

विभिन्न पार्टियों का मेला ,अपने अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए बनने वाला
विचित्र गठजोड़ क्या यही लोकतंत्र चाहते हैं भारतीय। स्थायी और एक पार्टी की
सरकार ना देकर हमने क्या पाया ?

  यदि कोई राष्ट्रिय दल बहुमत नहीं बना पाता है तो चुनाव के बाद अनुचित शर्तों
पर ,विपरीत विचारधारा की पार्टियों से संख्या बल का जुगाड़ बनाकर पाँच साल
तक देश को बैसाखियों के हवाले कर देने का पाप करने का अधिकार क्यों पा 
जाता है और देश इस पाप को स्वीकार क्यों कर लेता है ?

  जिन राजनैतिक दलों के विचार चुनाव से पहले मिलते नहीं है,जो लोग चुनाव
से पहले एक दूसरे को भरपेट गालियाँ देते हैं ये लोग चुनाव के बाद अपने-अपने
स्वार्थों को पूरा करने के लिए एक दूसरे के गले मिल जाते हैं। यह विचित्र मिलन
देश की जरूरत मान ली जाती है और फिर शुरू हो जाती है लूट ,देश लूटा जा रहा
है उन जनसेवकों के हाथों जो सपथ तो संविधान की रक्षा की लेते हैं मगर रक्षा के
नाम पर लोकतंत्र की लाज को तार-तार करते हैं पाँच साल तक।

    कमी कहाँ है ?जनता के फैसले लेने की क्षमता में या फिर दल गत चली आ रही
राजनैतिक पद्धति में। संविधान कहता है कि देश का प्रधानमंत्री का चुनाव चुने
हुए साँसद करेंगे और चुनाव जीतकर आये हुए साँसद अलग-अलग दुकानों के
प्रतिनिधि जैसे होते हैं उनके लिए चुनाव जीतते ही खुद की दुकान का महत्व बढ़
जाता है और राष्ट्र का हित हासिये पर धकेल दिया जाता है। सांसदों की तोड़जोड़,
खरीद फरोख्त का तमाशा पूरा देश मूक और बधिर बन कर देखता है और फिर
जन्म लेती है वर्ण संकर व्यवस्था ?क्या ऐसी व्यवस्था देश का भला कर पायेगी ?

     यदि कोई दल या चुनाव पूर्व बना गठबंधन बहुमत नही रखता है तो केवल
बड़ा दल होने के नाते उसे सरकार बनाने का न्योता क्यों भेज दिया जाता है जबकि
न्योता भेजने वाला जानता है कि वह अल्पमत वाले को न्योता दे रहा है। यह
अल्पमत वाला न्योता पाकर बहुमत बनाने के लिए क्या करेगा ?खरीदफरोख्त ही
कर सकता है और करता है ?क्या जन्मते ही  काला मुँह करवा लेने वाली व्यवस्था
उजाला करने में सक्षम है ?अगर नहीं, तो फिर न्योता भेजने की रस्म बंद करके
राष्ट्रिय सरकार का विकल्प क्यों नहीं दिया जाता है। जो साँसद चुनाव जीते हैं वो
राष्ट्रिय पक्ष और दूसरे स्थान पर जनमत पाने वाला राष्ट्रिय विपक्ष। केवल कुछ
वोटों से जीतने वाला ही जनमत नहीं रखता है दूसरे स्थान पर रहने वाला भी
जनमत तो रखता ही है और वह दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर पाँच साल
तक राष्ट्रिय विपक्षी दल कि भूमिका अदा कर सकता है।              

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