बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

चल,धरने पर बैठ जाते हैं

चल,धरने पर बैठ जाते हैं 

धरना बहुत सी बीमारियों का रामबाण ईलाज तो है ही ,साथ ही साथ अपनी असफलता
को भी छिपाने का सांगोपांग तरीका है।
धरने की खास बात यह है कि इससे लोगों से मेलजोल और पहचान का दायरा बढ़ता है
जिसे हम जानते भी नहीं वो भी एक नजर धरने पर बैठे लोगों पर मार ही लेता है।
धरने से हम अपनी नाजायज बात मनवाने की सफल कोशिश करते हैं क्योंकि जायज
बात तो कानून यूँ ही मनवा देता है या कुछ समय लेकर मनवा देता है।
धरने पर बैठने से हम अपनी मनमानी कर सकते हैं क्योंकि दूसरे मंच बात की तह तक
जाते हैं और बात उपयोगी होने पर ही मानी जाती है।
धरने का एक रूप का वर्णन रामायण काल में भी है इसलिए हम इसे प्राचीन विद्या भी
कह सकते हैं।
धरने के डर से सरकारें सीधे-सीधे चलती है, मालिक व्यवहारिक बने रहते हैं और पति
आज्ञाकारी शिष्य जैसा व्यवहार करते हैं।
धरना किसी भी मौसम में करो अनुकूल ही रहता है। धरने के लिए धुँआ उठना ही काफी
है आग तो बाद में खु ब खुद लग ही जाती है।
धरना यदि दिल को छूने वाली समस्याओं पर हो तो राजा बना सकता है,धरना यदि
आडम्बर फैलाने का हो तो प्रसिद्धि दिला सकता है,धरना यदि नाकामयाबी ढ़कने का हो
तो कामयाबी दिला सकता है।
जब भी काम करने का जी नहीं करें तो धरने पर बैठ जाना उत्तम आसन है ,विरोधी
टाँग खींचे और माकुल जबाब ना हो तो धरना टाँग छुड़ाने का उत्तम उपाय होता है,जब
भी विरोधी गलती करे तब धरने पर बैठना उसको नानी याद करवाने का उत्तम पेच
होता है।
धरना निराशा में आशा की लकीर खींचता है,धरना जबाबदेही से मुक्ति दिलाता है,धरना
अयोग्यता को छिपाता है,धरना मन के द्वेष को अभिव्यक्ति की आजादी में बदल देता
है,धरना हारने के बाद खेला जाने वाला गुरिल्ला दाँव है।
धरना देने के लिए अक्सर खाली रहने वाले स्थान उपयुक्त रहते हैं मगर वह शहर के बीच
में हो ताकि समय व्यतीत करने वालो कि सैरगाह बने रह सकें।
धरना दूसरों पर वजह या बेवजह देख कर नहीं दिया जाता है जब जी करे बैठ जाया करें।
धरना तर्क से नहीं दिया जाता है केवल स्वार्थ साधने के लिए दिया जाता है।
धरने को सफल बनाने के लिए शामयाने,प्रकाश ,पानी ,माईक,दरी,कम्बल,पत्रकार ,पुलिस
चाय,और मुफ्त खाना होना आवश्यक है ताकि जन साधारण कुछ दिन रुक सके।
धरने से हम अपनी जबान को तौल सकते हैं -जैसे चीख कितनी दूर जाती है,चीख मिठ्ठी
है या तेजाबी ,चीखने के बाद दांत सलामत रहते हैं या नहीं।
धरने से अपनी गलती को दूसरे पर थोपना आसान रहता है,धरने से एक साथ लाखों लोगों
को मुर्ख बनाया जा सकता है।
धरना कोई नेता ही दे यह जरुरी नहीं,धरना आम आदमी का शस्त्र है यदि धरने से खास
आदमी बन गये तो क्या कहने और अगर नहीं बन पाए तो आम आदमी पक्का बने
रहोगे उससे नीचे की पायदान पर नहीं गिरोगे।
यह सब पढ़ कर क्या नहीं लगता -चल यार ,धरने पर बैठ जाते हैं                         

कोई टिप्पणी नहीं: