रविवार, 9 फ़रवरी 2014

गरीब लोकतन्त्र से दान पाते हैं पूँजीपति

गरीब लोकतन्त्र से दान पाते हैं पूँजीपति 

शास्त्र और विद्धवानों के मत के अनुसार दान करना समाज के प्रति उत्तम कर्तव्य
को निभाना है इसलिए हर धर्म में दान का बहुत महत्व है। शास्त्रों ने दान देने और
लेने दोनों को योग्य पात्र होना जरुरी माना है। अगर दान देने वाला योग्य पात्र नहीं
है तो उसके द्वारा दिया हुआ दान तथा दान लेने वाला योग्य पात्र नहीं है तो भी उसे
दिया गया दान महत्वहीन काम है जिसे नहीं किया जाना चाहिए।

    हमारा देश आर्थिक रूप से गरीब लोकतंत्र है और इसका संचालन गरीब लोगों
पर अप्रत्यक्ष तथा प्रत्यक्ष कर लगाकर किया जा रहा है मगर जब यह गरीब
लोकतंत्र कर के पैसे का दान पूंजीपतियों को दोनों हाथों से करता है तब आम
भारतीयों पर क्या गुजरती होगी इसकी चिंता भी यह गरीब लोकतंत्र आज तक
नहीं कर पाया है।

   इस देश के पूंजीपति एक तरफ लोकतंत्र से दान पाने का खुद को उचित अधिकारी
ठहराते हैं और बड़ी राशि ,भूमि ,कर की छूट और अन्य तरीके से दान डकारते रहते
हैं और गरीब लोकतन्त्र भी इनको दान देकर प्रोत्साहित करता रहता है। तर्क यह
दिया जाता है की धनकुबेरों को दान लुटाने से देश का विकास होता है और फिर विकास
के नाम पर गरीबों पर कर का बोझ बढ़ा दिया जाता है और अमीरों को दान कर दिया
जाता है।

   वो भी एक समय था जब भामाशाह ने अपनी सम्पति राणा प्रताप के पास कुछ
भी धन नहीं बचा था तब राज्य की आन मान और शान बनी रहे इसके लिए दान
कर दी और आज का भामाशाह इस समय के धनहीन राणा से दान माँगता रहता
है और धनहीन आज का राणा उनको जनता के कर के पैसे लूटा कर खुद को
गौरवान्वित भी महसूस करता है। किसी को SEZ ,किसी को टैक्स में छूट,किसी को
उद्योग के नाम पर रोकड़  … सब कुछ बाँटा जा रहा है और ऊपर से ठप्पा विकास का।

    आम आदमी को गैस सिलेंडर के लिए पात्रता दिखानी है ,गरीब किसान के लिए धन
दान देने पर कम पड़ जाता है ,छोटे व्यापारी को हजार सवाल करके लौटा दिया जाता
है ,विधवा बहनों को टुच्ची रकम (चार -पाँच सौ रुपया महीना )दे दी जाती है ,बेरोजगार
युवाओं को,वंचित वर्ग को ,आदिवासी जनजातिओं को,निर्धन भारतीयों को जो वास्तव
में लोकतंत्र से कुछ सहायता पाने की पात्रता रखते हैं उसे आज तक क्या मिला ?एक
भारत में दौ भारत किसने विकसित होने दिए और क्यों ?क्या किसी लोकतंत्र के प्रहरी
के पास इन सवालों का जबाब है। लोकतंत्र का मतलब यह नहीं होता है कि वह मुठ्ठी
भर लोगों के हित की रक्षा करता रहे और बहुत बड़े वर्ग को आश्वासन की घुट्टी पिलाता
रहे। यदि आम आदमी सरकारी अनुदान के बिना अपने पुरुषार्थ के बल पर अपना जीवन
चला सकता है तो पूंजीपतियों को बेवजह गरीब जनता का धन मुफ्त में बाँटने का हक़
लोकतंत्र की सरकारों को क्यों है ?
       
    जनता के कर के पैसे से पूंजीपति अपना घर सब्सिडी के नाम पर भर कर कैसा आदर्श
दिखाना चाहते हैं ?दान वंचित ,निर्धन ,असहाय,पीड़ित और जरुरत मंद के लिए हो तभी
सार्थक है।    

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