रविवार, 30 मार्च 2014

निरन्तरता

निरन्तरता 

हथोड़े की पहली चोट खाकर बड़ी चट्टान ने भयँकर अटटहास किया और नन्हे से 
हथोड़े से व्यंग से पूछा -तेरे नन्हे से शरीर पर चोट तो नहीं लगी ना ,मुझ पर प्रहार 
करके तेरा अस्तित्व ही मिट जायेगा। 

हथोड़े ने जबाब दिया -मुर्ख चट्टान ,मैं जानता हूँ कि तुम बहुत बड़ी हो और मैं बहुत 
छोटा सा हूँ मगर मेरी छोटी चोटे जब निरंतर तेरेपर पड़ेगी तब तुम चकनाचूर हो 
जाओगी। इतना कहकर हथोड़े ने सतत चोट करना चालु रखा।  कुछ समय बाद 
चोट खा -खा कर चट्टान चटखने लग गयी और अपना अस्तित्व खो बैठी। 




  हर समस्या और मुश्किल आरम्भ में हमें डराने की कोशिश करती है उसकी विकरालता को देख कर हम खुद पर संदेह करने लग जाते हैं हम में से ज्यादातर हार मान कर ध्येय बदलने की क्रिया अपना लेते हैं यानि मुश्किलों को खुद पर हावी होने देते हैं। बहुत कम लोग खुद परविश्वास रखते हैं और समस्या पर निरन्तर चोट करते हैं मगर जो लोग आत्म विश्वास के साथ सतत प्रयास करते हैं उनको हम सफल व्यक्ति कहते हैं। सतत प्रयास करते रहने से मुश्किलें आसान बन जाती 
है और हमें आगे बढ़ने का रास्ता दे जाती है। 

चिंता नहीं ,लगातार प्रयास।     (चित्र :गूगल से साभार)

विस्थापित कश्मीरी और गूँगे नेता

विस्थापित कश्मीरी और गूँगे नेता 

विचित्र नाम है धर्म निरपेक्षता ,हमारे देश के वोट बैंक परस्त नेता इस लिबास से खुद
को ढके रहना पसँद करते हैं ,तुष्टिकरण के रास्ते पर बढ़ती हुयी धर्म निरपेक्षता गन्दा
नाला बन रही है और उसकी इस बदबू से हर कौम बेहाल है। कोई नेता अपनी वोट बैंक
को खुश करने के लिए किसी अन्य नेता को "नपुँसक "कहता है तो कोई जबरदस्ती
"धार्मिक टोपी "पहनाना चाहता है तो कोई नेता वोटबैंक को चरमपन्थ की ओर धकेलता
हुआ "आतँकी सोच" की आग बरसाता है। अपने को धर्म निरपेक्ष कहने वाली पुरानी पार्टी
किस प्रकार की सोच रखती है यह देश देख भी रहा है और भुगत भी रहा है। जब देश का
प्रधान भी वोटबैंक के मोह में राजधर्म भूल कर तुष्टिकरण वाली सोच को सरे आम यह
कह कर प्रगट करता है कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ वोटबैंक वाले समूह का है
तो समानता की आशा खत्म हो जाती है।

 उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय दल,बिहार के क्षेत्रीय दल ,आसाम के क्षेत्रीय दल और बंगाल के
क्षेत्रीय दल सब के सब दोगली वाणी और दोगला आचरण रखते हैं। एक भारतीय से
सौतेला व्यवहार और दूसरे से वोटबैंक के कारण तुष्टिकरण का व्यवहार। इन प्रदेशो
में केवल दंगे ,गरीबी ,धार्मिक और सामाजिक कटुता की फसल पकती है। बहु संख्यक
में जातिगत फूट पैदा करना और वोटबैंक को विकास की मुख्य धारा से अलग -थलग
रख कर शासन चलाना यही इनकी नीति रही है।

नयी नयी राजनीति में आयी पलटू की सोच भी इन पार्टियों जैसी ही है ,वोटबैंक को
बनाने के चक्कर ये तो राष्ट्र विरोधी विचार भी खुल कर बकते हैं इनके पास कश्मीरी
विस्थापितों के दर्द के लिए शब्दों की सहानुभूति भी नहीं है मगर कश्मीर पर जनमत
संग्रह कराने की वकालात जरुर करते हैं।

बहुसंख्यक हित की रक्षा की बात करना आज कितनी पार्टियों को सुहाता है ?वोट बैंक
का अनुचित हित साधने के लिए ये सब तत्पर रहते हैं ?क्या विस्थापित हुए कश्मीरी
लोगों के लिए इन पार्टियों ने कभी कोई वादा भी किया है,कभी संवेदना भी जतायी है ?
क्या गुनाह था इनका जो आज भी अपने देश में विस्थापित की तरह जीना पड़ता है ?
देश के आतंकियों के जनाजे पर आँसू बहाने वाले तथाकथित निरपेक्ष नेताओं की
आँखे उस समय क्यों सूख जाती है जब विस्थापित कश्मीरियों के हक़ की बात आती है ?
ये मानवाधिकार की बातें करने वाले भद्र कहलाने का शौक रखने वाले लोग तुष्टिकरण
के पक्ष में घंटो बहस करते हैं मगर कश्मीरी विस्थापितों के हक़ की बात नहीं करते हैं।
प्रशांत भूषण जैसे लोग इन पण्डितों के दर्द को भूल कर कश्मीर पर क्या बयान देते हैं
यह हर राष्ट्रवादी को याद है।

इस चुनाव में हम राष्ट्र के लिए वोट करें ,विस्थापित भाइयों के दर्द को दूर करने के लिए
वोट करे,देश से घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए वोट करे,आतँकवादी सोच से लड़ने के
लिए वोट करे,हर भारतीय को मुख्यधारा में लाने का मार्ग प्रशस्त करने के लिए वोट
करे ,शांति और सुरक्षा के लिए वोट करे,जिन लोगो ने देश को सिर्फ वादे दिए हैं हम
भी उन्हें सपना ही दिखाए और वोट विकास के लिए करे।             

गुरुवार, 27 मार्च 2014

छद्म निरपेक्षता के अलावा सब सलामत

छद्म निरपेक्षता के अलावा सब सलामत 

जब भी हिन्दुस्थान में चुनाव आते हैं देश के अकर्मण्य नेताओं को धर्मनिरपेक्षता की
याद सताती है। सबको साम्प्रदायिकता से भय लगता है ,परन्तु कोई राजनेता स्पष्ट
नहीं करता है कि उसको किस साम्प्रदायिकता से खतरा है।

विश्व का हर धर्म दया ,करुणा और मैत्री का सन्देश देता है और मानवीय सहयोग की
भावना से ओतप्रोत है। इस देश में हर धर्म सलामत है ,हर आस्था सलामत है सिवाय
छद्म निरपेक्षता के।

मानव -मानव में भेद का पाठ इस देश को किस राजनीति ने सिखाया ?क्या पक्षपात
करके राजनीतिज्ञों ने हिन्दू प्रजा का दिल नहीं दुखाया ,आज कितने राजनीतिज्ञ ऐसे
बचे हैं जो खुले मंच से इस देश को हिन्दुस्थान कहते हैं या हिन्दुस्थान जिंदाबाद का
नारा देते हैं ,हमारे बौने राजनीतिज्ञों से तो अच्छे वो पडोसी देश हैं जो हमारे देश की
पहचान "हिन्दुस्तानी सल्तनत "से करते रहे हैं। जब इस देश का प्रधान सरे आम
मानव -मानव में भेद धर्म देख कर करता है तो हिन्दुस्तानियों का माथा शर्म से झुक
जाता है। हिन्दू अपने धर्म पर गर्व करे ,अपनी हिंदुत्व की संस्कृति पर गर्व करे तो
इसमें अँधे राजनेताओं के पेट में दर्द क्यों होता है ,हिन्दुस्थान पर राज करने की इच्छा
भी है और हिंदुत्व से परहेज भी।

यह देश तभी सलामत रहेगा जब हम अपने -अपने धर्म पर गहरी निष्ठा और गर्व रखेँगे।
हिन्दू  अपने धर्म के प्रति निष्ठावान बने ,मुस्लिम अपने धर्म के प्रति निष्ठावान बने ,ईसाई
अपने धर्म के प्रति आस्थावान बने क्योंकि सब धर्म मानवता की भलाई के लिए बने हैं ,
हम सबको धर्म के मूल सिद्धान्त को कस कर पकड़ लेना है जो परोपकार से जुड़ा है। इस
देश में धर्म कभी विवाद उत्पन नहीं करते हैं ,विवाद उत्पन करते हैं सत्ता के भूखे
राजनीतिज्ञ,इन लोगों को सत्ता चाहिए और सत्ता के लिए अच्छे हथियार की जगह ओछे
हथियार के रूप में एक धर्मावलम्बी को दूसरे धर्मावलम्बी से लड़ाते हैं और ये निकृष्ट
खेल आजादी के पहले से अभी तक खेल रहे हैं। आज हर संसदीय क्षेत्र में चुनाव लड़ने
वाला उम्मीदवार जाती और धर्म की अंक गणित देख कर पर्चा भरता है ,क्यों ?हम
भारतीय नागरिक भी इसी निगाह से चुनाव की गणित का अभ्यास करते हैं ?हम
मतदान भी जातिगत और धर्म के आधार पर करते हैं ,क्यों ? जब तक विकास के मुद्दे
को हासिये पर धकेलते रहेंगे तब तक हम अभावग्रस्त जीवन ही जियेंगे।

इस देश में हर धर्म सलामत है इसमें शंका का कोई स्थान नहीं है। विश्व का हर धर्म
सही राह पर आगे बढ़ना सिखाता है इसमें किसी को शँका नहीं है। हम अपने -अपने
धर्म पर गर्व करे इसमें किसी को ऐतराज नहीं है। ऐतराज है तो सिर्फ भ्रष्ट बुद्धि वाले
राजनीतिज्ञों को ,क्योंकि जैसे ही हम मानव धर्म को मुख्य मान लेँगे तो उनकी चूलें
हिल जायेगी। आओ ,इस बार हम विकास के लिए मिलकर मतदान करे,हम गरीबी
को मात देने के लिए मतदान करे,उज्जवल भारत के लिए मतदान करे। निर्भीक बने
और निर्भीक सरकार चुने।   
    

बुधवार, 26 मार्च 2014

धुर्त राजनीतिज्ञों से बच के रहना हिन्दुस्तानियों

धुर्त राजनीतिज्ञों से बच के रहना हिन्दुस्तानियों 

हर पाँच साल बाद भारत में चुनावी महाभारत खेला जाता है और गरीब भारतीय
शास्त्री और वाजपेयी के समय को छोड़ हर बार धुर्त राजनीति में फँस जाता है ।
हिन्दुस्थान अपनी असल पहचान को तरस गया। राजनीतिज्ञों ने बुरी तरह से
भारतीयता को घिस दिया ,मानव -मानव के बीच विद्वेष का जहर घोल दिया।
हिन्दू धर्म के लोगों को आपस में लड़ाया और बाँटा। मुस्लिम समाज को मुख्य
धारा से अलग रखा। भारतीयों को आपस में धर्म ,जाति और संस्कृति के बहाने
लड़ाया ,आपस में भय और शंका के माहौल में रहने को विवश किया। इससे देश
पिछड़ गया मगर धुर्त राजनीतिज्ञ कुबेर बन गये।

अब से आने वाले हर पाँच साल का चुनाव भारी परिवर्तन लाता जायेगा क्योंकि
आने वाला वक्त शिक्षित भारतीयों का आ रहा है जिसके पास ज्ञान है ,श्रम है ,
तथ्य को परखने की ताकत है। लोक लुभावन योजनाओं की घोषणाएँ करने
वाले राजनीतिज्ञ हासिये पर आते जायेंगे मगर शिक्षित भारतीयों को हर पल
जागरूक रहना होगा क्योंकि अभी से कुछ शिक्षित लोग धुर्त राजनीतिज्ञों के
चरण चाटने लग गये है ,समाजसेवियों की छवि का सहारा लेकर उत्पात के
मार्ग पर देश को ले जाना चाहते हैं ।

इस बार परिवर्तन हो रहा है ,स्पष्ट दिखता है और उसके पीछे जो ऊर्जा लगी
है वह युवा भारत है जो काम चाहता है ,विकास चाहता है ,रोजगार के अवसर
चाहता है। युवा भारत माला ,टोपी या क्रॉस के नाम पर झगड़ नहीं रहा है और
ना ही इस अंक गणित पर वोट करता है,युवा भारत अब अपने भविष्य को
उज्जवल देखना चाहता है इसलिए वह भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ लड़ भी रहा है और
विकास का साथ दे रहा है। युवा भारत एक बार विश्वास करके धोखा खा सकता
है पर मौका मिलते ही, तुरंत, बिना लाग लपेट के धुर्त नेताओं को मुख्य राजनीति
के पथ से बाहर धकेल देता है ,बराबर झाड़ पोंछ के साफ कर देता है।

बड़े -बड़े महारथी इस बार चुनावी मैदान से भाग कर चोर दरवाजे को खटखटा
रहे हैं ,बड़े -बड़ों की नींद हराम हो रखी है,यह सब मोदी के कारण नहीं हुआ है ,
मोदी ने तो सिर्फ युवाओं को जखजोरा है ,जागृत किया है ,स्वाभिमानी भारत
का सपना मोदी ने दिखाया और युवा उसे साकार करने में जुटा है। अब वादे
नहीं चलने वाले,नारे नहीं चलने वाले ,छद्मवाद या धुर्तता नहीं चलने वाली,यह
चुनाव युवा भारत संचालित कर रहा है जिसे ताकतवर नेता का चयन करना
आता है ,झूठे समाचार ,सडी-गली अफवाहें,भ्रम और मायाजाल का तिस्लिम
ख़त्म हो चूका है। भारत इस बार से ठोस इरादों वाले ऊर्जा सम्पन्न लोगों को
चुनेगा ,इस बार उनकी हार तय है जो केवल नारे देते हैं या कर्त्तव्य छोड़ भाग
खड़े होते हैं। युवा भारत धुर्त नेताओं के जाल से बचा रहे, यही अहम है।            

रविवार, 23 मार्च 2014

चिड़ियाँ से सीख

चिड़ियाँ से सीख 

चिड़ियाँ ने छोटे से रोशन दान पर अपना अड्डा जमा लिया था ,बाहर से घास ,पत्ते,
तिनके लाकर घोंसला बना लिया और कुछ दिन बाद एक अंडा भी दे दिया। कई 
दिनों तक चिड़ियाँ अंडे को सेती रही। कुछ दिनों के अंतराल के बाद अंडे से चूजा
बाहर निकला। चिड़ियाँ और चिड़ा उसकी देखभाल में लगे रहते। ममता और दुलार
पर सिर्फ मनुष्यों का ही अधिकार नहीं होता ,सृष्टि में सभी प्राणी अपने बच्चों को
दुलार देते हैं। चिड़ियाँ और चिड़ा नन्हें से बच्चे के साथ चीं -चीं करते रहते।

एक सुबह चिड़ियाँ ने छोटे से बच्चे को रोशनदान से धक्का दिया ,बच्चा लड़खड़ा
कर फड़ फड़ाता हुआ जमीन पर गिर पड़ा। चिड़ियाँ और चिड़ा उस नन्हें के साथ जोर
-जोर से ची -ची करने लगे। मुझे उस नन्हें से बच्चे पर दया आ गई ,मेने उस बच्चे
को उठाकर वापिस रोशनदान पर बने घोंसले पर रख दिया। दूसरे दिन भी चिड़ियाँ
ने फिर वैसा ही किया बच्चे को घोंसले से निचे धकेल दिया। चिड़ियाँ का बच्चा बड़ी
मुश्किल से फुदकता हुआ एक कोने में बैठ गया। वह भय के मारे बुरी तरह से काँप
रहा था  दूसरे दिन भी मेने फिर से उसे उठाया और रोशनदान पर रख दिया।

तीसरे दिन चिड़ियाँ ने फिर धक्का दे दिया ,बच्चा हल्के से फुदकने लगा। चिड़ियाँ
और चिड़ा उसे फुदकते देख चीं -चीं करने लगा। मुझे आज चिड़ियाँ के निर्दयी व्यवहार
पर गुस्सा आ गया। मेने उनको उड़ाकर बच्चे को पकड़ कर घोंसले में बिठाने की कोशिश
की मगर आज बच्चा बार -बार छोटी उड़ानें भरने लगा ,बड़ी मुश्किल से बच्चे पर
काबू पाकर उसे फिर से घोंसले में बिठाया।

अगले दिन चिड़ियाँ बार -बार बच्चे को घोंसले से धक्के देकर निचे धकेलने लगी पर
आज वह बच्चा निचे नहीं गिर कर छोटी उड़ाने भरने लगा। एक  दौ दिन बाद मेने देखा
कि चिड़ियाँ ने छोटे से घोंसले को बिखेर दिया। आज वहाँ सन्नाटा था ,ना तो बच्चा था
और ना ही चिड़ियाँ। वे सब उड़ चुके थे। ये सब देख मुझे लगा कि हम मनुष्य बुद्धिमान
होते हुए भी चिड़ियाँ से कम हौसला रखते हैं ,हम अक्सर बच्चों को जोखिम लेने के लिए
तैयार ही नहीं करते हैं।

हम बच्चों की परवरिस के नाम पर सुरक्षा का घेरा बनाते रहते हैं और उसे हर
साल मजबूत करते रहते हैं। हम खुद बच्चे के सुखद भविष्य के लिए प्रयासरत
रहते हैं मगर बच्चों को जोखिम से खेलने के लिए तैयार नहीं करते ,क्यों ?
क्या हम चिड़ियाँ से भी ज्यादा डरपोक अभिभावक हैं या फिर काल्पनिक भय से
डरते रहते हैं ? कहीं हम मार्ग दर्शन की जगह सुरक्षा घेरा बनाकर बच्चे के भविष्य
को कमजोर तो नहीं कर रहे हैं   ……………      

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

तिजोरी की चाबी

तिजोरी की चाबी

शाम के समय बगीचे में घूमने आये दोस्त ने दूसरे दोस्त को उदास देख कर पूछा -
आज बहुत उदास और खिन्न से हो ,क्या कोई चिंता सता रही है क्या ?

दूसरे ने जबाब दिया -यार ,कमाते -कमाते बुढ़ापा आ गया ,जो कुछ बचाया उसे 
सँजोकर रखा है मगर बेटा बोलता है तिजोरी की चाबी सौंप दो। अब बता यह कैसे 
सम्भव है और इस तिजोरी की चाबी की वजह से हर दिन अशांति है। 

पहले ने पूछा -बच्चा क्या कमाता है ?

दूसरा बोला -अच्छा खासा व्यापार चल रहा है ,सब सुख सुविधा है घर में लेकिन 
ना जाने क्यों उसकी नजर मेरी तिजोरी पर गड़ी है। एक बात बता ,तूने अपनी 
बचत को कैसे सहेज कर रखा है। 

पहला बोला -मेने जो कुछ बचाया ,बच्चे को यह कर थमा दिया कि इस तिजोरी 
की पहरेदारी अब मैं नहीं करूँगा ,अब तुम जबाबदारी सम्भालो और मुझे बुढ़ापे 
को निश्चिंतता के साथ जीने दो बस बच्चे को जबाबदारी समझा मैं मस्ती से 
बुढ़ापा गुजार रहा हूँ। 

अपने मित्र का उत्तर सुन पहले ने तिजोरी की चाबी को कस के पकड़ लिया और 
चिंता में लीन हो गया।  

गुरुवार, 20 मार्च 2014

इस तरह सफल होगा 272 + का प्लान

इस तरह सफल होगा 272 + का प्लान

भारत के लोकतंत्र में वर्षों बाद किसी नेता ने पूर्ण सपना देखा वरना इससे पहले
तो सभी नेता चाहे किसी भी दल के हो सबने जुगाड़ तंत्र के सपने देखे थे। जुगाड़ी
नेताओं ने मान लिया था कि भारत में आने वाले कई चुनावों में जुगाड़ तंत्र ही
चलने वाला है इसलिए सबकी मानसिकता जुगाड़ वाली हो गई। नरेंद्र मोदी ही
एक ऐसा नेता निकले जिन्होंने फिर पूरा सपना देखा ,उनकी टक्कर के नेता
जोड़ तोड़ की तन्द्रा में अभी भी घसीट रहे हैं। आइये देखते हैं एक तस्वीर जो
272 + की बन चुकी है

1. 272 + की जिद्द -सफल और आत्म विश्वास से भरे नेता की विशेषता होती
है कि वे अपने टारगेट को सफलता के पड़ाव बिंदु से आगे देखना चाहते हैं।
मोदी ने अपनी जीत के सपने को स्पष्ट रखा इससे उनकी पार्टी के कार्यकर्त्ता
जोश से लबालब भर गए ,जोश ही ऊर्जा बनता है और ऊर्जा ही प्रकाश फैलाती
है।
2.विशिष्ट  छवि - मोदी ने अपनी छवि को राष्ट्रवादी हिन्दू के रूप में रखा जो
सबको साथ लेकर चलने को तैयार है। मोदी ने हिंदुत्व को अन्य नेताओं की
तरह जन्म या धर्म से जोड़ कर नहीं देखा उन्होंने भारतीयता से जोड़ कर देखा
कोई भी कोम जो भारत पर गर्व करती है मोदी उनका विकास चाहते हैं।

3. वाक चातुर्य -मोदी उन गिने चुने नेताओं में से है जो वाक पटु हैं। शब्दों का
चयन,विषय पर पकड़ और जनता को बाँधे रखने की गजब की  क्षमता है।
विरोधियों की हलकी सी चूक को पूरी ताकत से पकड़ते हैं और उसकी विशाल
विकरालता को जनता के सामने उछाल देते हैं। बेचारे विपक्षी उसकी काट
ढूँढने में समय बर्बाद कर देते हैं।

4. लक्ष्य को पाने की ललक - मोदी के आर्थिक मॉडल में जटिलता नहीं है
इसलिए हर कोई उससे प्राप्त लाभ को महसूस करता है। मोदी जटिल काम
को निरन्तरता से अंजाम देते हैं जब तक लक्ष्य हासिल नहीं हो जाता तब
तक पसीना बहाते रहते हैं।

5. सरकार की हर भूल को भुनाना - सरकार की हर भूल पर पैनी नजर रखना
और अपने राज्य में उस भूल की जड़ को मिटाना,यह बड़ी मेहनत का काम
है मगर मोदी ने किया ,गुजरात के काम की तुलना में हर सरकार के काम को
देखना और उनकी कमजोर नस को बीच बाजार दबाना।

6. विरोधियों से प्रचार करवाना -मोदी को अपने प्रचार के लिए खुद के साथियों
के अलावा विरोधियों से भी मुफ्त प्रचार मिलता रहता है। हर एक पार्टी का नेता
अपने -अपने भाषण में मोदी का जिक्र करता रहता है जैसे हर एक सीट से मोदी
ही उम्मीदवार हैं। मोदी की आलोचना से उनके चाहने वाले पक्के बनते रहते हैं
और जो उनको नहीं जानते थे उनका ज्ञान हर नेता जनता को हर पल करवाता
रहता है।

7. पैनी व्युह रचना - मोदी की व्युह रचना उत्तम कोटि की होती है। छोटे से छोटे
पाशे पर गम्भीर चिन्तन और छोटे से छोटे विरोधी से सजग। साथीयों की खोज
में रहना और विरोधियों की फूट को अपने पक्ष में भुनाना। समाज के वर्ग विशेष
के मन को टटोलने की कवायद में लगे रहना। बूथ रचना से सोशियल मीडिया तक,
प्रिंट मीडिया से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक सब जगह सुव्यवस्था।

8. विकास और व्यवस्था परिवर्तन के मुद्दे -मोदी की राष्ट्रवादी छवि और विकास
तथा परिवर्तन के मुद्दों की सरल व्याख्या जनता के दिल को छू लेती है। लोग
मोदी में भविष्य के सपने ढूँढ़ते हैं और मोदी गुजरात के विकास कामों को एक -
एक कर बताते जाते हैं और लोगों से आह्वान करते हैं उन पर भरोसा जताने का ,
विरोधीयों के तर्कों की धज्जियाँ उड़ाने में मोदी माहिर हैं।

9. राज्य के अनुसार टीम वर्क - मोदी जानते हैं की केवल विकास की बातों से
पूरी बात नहीं बनेगी। सपने को साकार करने के लिए जीत चाहिए और उसमें
जो नीति फीट बैठती हो उस पर डटे रहना है। राज्य के हिसाब से हर कार्ड को
खेलना है। मीडिया उनके बारे में क्या सोचता है या आलोचना करता है ,वे उस
पर कभी टिप्पणी नहीं करते ,उनकी अपनी टीम है और मौलिक सोच है।

10. अधूरे प्रतिस्पर्धी - मोदी को मजबूत प्रतिस्पर्धी नहीं मिले हैं ,विरोधियों
के कारनामें ,उनका कार्यकाल ,उनके राज्य की आन्तरिक अव्यवस्था ,
तुष्टिकरण की नाव में बैठे सभी प्रतिस्पर्धी ,विरोधियों की कथनी करनी का
फर्क ,बढ़ती महँगाई ये सब उनकी जीत में सहयोग कर रहे हैं।          


सोमवार, 17 मार्च 2014

भँग की तरँग में नेताजी

भँग की तरँग में नेताजी 

नेता और तरँग एक साथ चलते हैं ,जिसमें तरँग नहीं वो नेता कैसा ?नशा और तरँग में
यही एक मोटा फर्क है नशा उतरने के बाद असलियत बता देता है और तरंग उतरती -
चढ़ती है इसलिए नेता भूतपूर्व हो सकता है मगर तरँग के कारण खुद को नेता ही
मानता है।

एक बूढ़े अर्थ विज्ञानी को एक नेता ने तरँग की घुट्टी पिला दी,घुट्टी पीने के बाद वो
भी नेता बन गए और अर्थ पर घूम घूम कर यह बताते फिरते हैं कि मेने किया बहुत
कुछ मगर नजर नहीं आता है। अब उन्हें कौन समझाये कि ताऊ काले रँग में सब
छिप जाता है नजर आता है केवल रँग। …

एक उप प्रमुख तो भँग की तरँग में सपने देख कर उसका लाइव प्रसारण भी करने
लग गए। कम मत समझना ,इस बार पप्पू 200 अँक से पास होगा,सब कुछ रट
लिया है बस 2 G, खेल ,मकान ,जमीन ,रक्षा और कोयला ये पाठ दर्द बढ़ा रहे हैं।
ये कोर्स में नहीं है ,बाहर से जोड़ दिए गए हैं ,भूल जाओ   …

एक दल की माँ तो भाँग की तरँग को दस साल से उतरने ही नहीं दे रही है सुबह
शाम हर पत्ते को पिसती है मगर हर तरँग में छुटकू फिर भी छुटकू ही नजर आता
है ,बड़ा ही नहीं होता छुटकू !हे राम ,कब बड़ा होगा ,सयाना होगा ,घोड़े चढ़ेगा  …

एक दल के नेता तरँग में चैन उतरी साइकिल पर पेडल मारे जा रहे हैं। साँस
फूलने के बाद उतरती तरँग में खुद को वहीं का वहीं पाते हैं। एक दौ गाली
और झिड़की पुरानी कुर्सी को देते हैं और चढ़ती तरँग से जोर से पेडल मारते हैं,
सपने देखते हैं,शम्भू मेले का आयोजन करते हैं ,हरे -हरे पत्ते घिसते हैं मगर
तरँग ठहरती ही नहीं है  .... 

एक नेता तो अभी तक खाये हुए पत्ते चारे को पचाने के लिए तिहाड़ यात्रा पर जाते हैं
भँग के पत्ते को बट्टे पर पिसते हैं और नहीं खाने पर लठ बंधन पर ठुमका लगा देते
हैं खाने के बाद तरँग में गठबंधन की ताल पर उछलते हैं

एक विद्रोही ने कुछ समय पहले भंग कि नशीली घुट्टी बनायी ,पढ़े लिखे लोगों
पर आजमाई जब सबको एक साथ चढ़ गयी तो सबने तरँग में बैठा दिया टीले पर।
वहाँ ऊँचे टीले पर बैठने से विद्रोही का नेता में रूपांतरण हो गया। चढ़ती तरँग
में टीले पर कूदा कूद की ,निचे गिरा और रायता बना कर भंग घोटने लगा। भँग
की तरँग में चिल्लाने लगा -जोर लगा के  … सा ,खुद को तरँग में उड़ते पाया
लेकिन जनता ने रायता पी लिया और तरँग से बाहर आ गयी मगर भाई अभी
भी झूल रहा है ,जोर लगा के ही ई सा  …

एक नेता ने 15 साल पहले भंग की तरँग का बगीचा लगाया ,छक कर पी और
सबको घुट्टी पीने का न्योता दिया ,पहले गाँव वालो ने पी और झूम कर नाचने
लगे ,तरँग ऐसी चढ़ी की उतरी ही नहीं तब उस परफेक्ट पुड़िया को ले घर घर
पहुँच गए जो भी जिस भी कोने में बैठ कर पी रहा है तो तरंग में गाता है -हर
हर हर हर हर   …… घर घर घर घर     ....  यही तो तरँग की अद्भुत देन  ……       

रविवार, 16 मार्च 2014

मोदी की राजनीति और कांग्रेस की भूलें

मोदी की राजनीति और कांग्रेस की भूलें 

चुनाव 2014 का घमासान शुरू हो चूका है और सभी दलों की राजनैतिक उठापठक भी।
एक बात सामने है कि हर दल का निशाना मोदी है। क्या मोदी का व्यक्तित्व वर्त्तमान
समय में इतना बड़ा हो चूका है कि सभी दल उस पर वार करना चाहते हैं,क्यों ?विश्व
की महासत्ता भी मोदी से क्यों कांप रही थी ?विश्व के कुछ शक्तिशाली राष्ट्र मोदी को
आँख दिखा कर आज "नमो" जाप करने लग गये हैं ,क्यों ?क्या खास है मोदी की
राजनैतिक शैली में।

आज गुजरात में विपक्ष मटियामेट हो चूका है ,कांग्रेस के बड़े -बड़े गढ़ गुजरात में
धराशायी हो गए हैं और इस बार के चुनाव में काँग्रेस अपना खाता भी खोल ले तो
बड़ी बात होगी ,इसका मतलब काँग्रेस गुजरात में अपनी प्रासंगिकता खो रही है ,
एक मायने में देखा जाये तो यह काँग्रेस की तुष्टिकरण की नीति का दर्दनाक हश्र
है। तुष्टिकरण के अँधेरे में काँग्रेस धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करती रही उसके कारण
एक बड़ा समुदाय मोदी के साथ हो गया जो मजबूती से उसके साथ जुड़ा। काँग्रेस
2002 के दंगे के बाद के दर्द को एक पक्षीय अन्याय के रूप में आज तक प्रचारित
करती रही जिसका कुप्रभाव यह पड़ा कि वह पिछले दस सालों में सिमटती चली
गयी ,काश !काँग्रेस 2002 का दंगा के पहले के हालात पर घोर कर लेती और
बेगुनाह जला दिए लोगों पर निष्पक्ष निर्णय करती तो स्थिति कुछ और होती।
कांग्रेस की इस चूक का फायदा मोदी जी को अनायास मिल गया और मोदीजी ने
गुजरात को भाजपा का अजेय किला बना दिया।

काँग्रेस ने ठोस काम करने की जगह लोकलुभावने काम को महत्व दिया जबकि
वे जानते थे कि वे अपव्यय कर रहे हैं क्योंकि जो धन जनता के लिए खर्च होना
था उन योजनाओं से वह लूटेरों के हाथ में जाता गया और आम जनता खाली हाथ
रह गयी। रोजगार गारंटी,भोजन की गारंटी,बढ़ते हुये वेतन और भत्ते,घटती हुयी
डीजल -गैस तथा खाद बीज सब्सिडी,लुप्त होते रोजगार के अवसर,मूल्य खोता
रुपया,बेलगाम महँगाई के कुचक्र में काँग्रेस धँसती चली गयी और आम जनता
त्राहिमाम पुकार उठी ,आम जनता के दर्द को समझने के प्रयास की जगह काँग्रेस
नेताओं के बयान जनता के दर्द को सालों से बढ़ाते रहे। नतीजन काँग्रेस खुद के
बनाये जाल में फँसती गयी और इस नाकामी को मोदीजी ने बढ़िया तरीके से
देश के सामने रखा और जनता के सामने विकल्प के रूप में खुद के गुजरात में
किये विकास के कामों को रख दिया। काँग्रेस की अर्थनीति की विफलता ने मोदी
के विकास के झंडे को फहराने में भरपूर मदद की और आज वो विकास का झंडा
लेकर फहरा रहे हैं।

UPA की सरकार गठबंधन कि थी जिसका नेतृत्व काँग्रेस करती है और जो
नेतृत्व करता है उसे ही सबसे ज्यादा कुफल भोगने पड़ते हैं क्योंकि आम जनता
के लिए वही दल खलनायक होता है। कांग्रेस की एक बड़ी भूल यह रही कि उसने
यह मान लिया कि भारत में एक दल की सरकार के जमाने लद गए हैं उसने इतने
वर्षों में केवल इतना ही श्रम किया कि वह अन्य दलों के सहारे खड़ी होकर सरकार
का नेतृत्व करती रहे उसका परिणाम यह हुआ कि उसने सत्ता तो प्राप्त कर ली मगर
अपनी ताकत नहीं बना पायी ,जब टेका देने वाले दलों ने देश की तिजोरी का धन
लूटना शुरू किया तो वह सत्ता बचाने के चक्कर में आँखे बंद करके बैठ गयी। काँग्रेस
की  इस चुप्पी ने मोदी को उसे ललकारने का मौका दे दिया ,परिस्थिति यह बनी कि
देश लूटता गया ,काँग्रेस बचाव में मौन रही और उसके खुद के नेता भी तिजोरी को
लूटने के मौके बनाते गये ,जब काँग्रेस के नेता भी भ्रष्ट आचरण के दोषी साबित
होने लग गये तो मोदी गरजने लग गये। AAP का भी जन्म इसी कारण हुआ।

UPA की  विदेश नीति की विफलता,सीमाओं पर पडोसी देशों की मनमानी ,गिरता
हुआ सैनिक मनोबल,बढ़ती हुयी घुसपैठ ,आतंक का मँडराता साया ,यह सब चलता
रहा और काँग्रेस के नेता जबाबी कार्यवाही की जगह जबान चलाते रहे इसका हर
भारतीय पर गलत असर पड़ा और मोदी ने अपने राज्य कि कानून व्यवस्था को
दुरस्त रखा और काँग्रेस की नाकामयाबियों को हर मंच से देश को बताते रहे,इससे
लोगों का मन मोदी मय हो गया।       
           

रविवार, 9 मार्च 2014

मूल समस्याओं से देश का ध्यान हटाने का पाप क्यों हो रहा है

मूल समस्याओं से देश का ध्यान हटाने का पाप क्यों हो रहा है 

पहला दृश्य -
एक पार्टी ने घोटालों और गपल्लों से भरपूर सरकार चलाई ,देश की तिजोरी को
लूटने दिया ;सरकार के मुख्य वजीर अपने कटे हाथ जनता को दिखाते रहे और
कहते रहे -देखों मेरे तो हाथ ही कटे हुए हैं फिर मैं तो ईमानदार ही कहलाऊंगा
ना !मैं कैसे कोई घोटाला कर सकता हूँ ?जिसने किया है घोटाला उसे कुर्सी से
हटा दिया (पैसे खा गया तो खा गया ,पैसे तो जनता से कर के रूप में और ऐंठ
लिए जायेंगे ) क़ुछ रूपये पैसे बहु -बेटी के काम आ गए तो यह नारी सम्मान
की बात है,क्या दामाद से हर पैसे का हिसाब माँगूगा ,ना भाई !रिश्ते की बात
है और अहसान का बदला भी चुकता करना था ,इसलिए हजार बार चुप्पी।
मगर चुनाव और चुप्पी एक साथ नहीं चल सकती थी ,जनता हर संदेह भरे
सवाल का सीधा सपाट उत्तर चाहती है और सही उत्तर सत्ता से बाहर का रास्ता
तय कर सकता है इसलिए गलत सवाल फेंको या साइड पार्टियों से फिंकवाओ
ताकि जनता के सवाल पेट में ही रह जाये और बे बात पर मोहर लगा दे !!!

दूसरा दृश्य -
जनता थोडा सा भी भरोसा करे और सत्ता के करीब पहुँचा दे तो सीट पर
विरोधी लोगों से सहायता लेकर बैठ जाओ और इस सफलता को जनता
की जीत कह कर खुद मौज मनाओ,बंगले ,गाडी ,भत्ते ,सुरक्षा,वेतन पक्का
करो और पतली गली से बड़े आराम से निकल लो क्योंकि जो काम करता
ही नहीं है उस पर अंगुली कैसे उठ सकती है। जिसने काम किया है उस पर
अंगुली आडी -तिरछी कैसे भी उठा दो। जनता ने बवंडर बनाया तो बल्ले -
बल्ले और जनता ने आपत्ति उठाई तो हँगामा कर दो। जो बड़ा है उस पर
पत्थर मारो क्योंकि कहीं ना कहीं तो लगेगा ही। सही लगा तो मजे और नहीं
लगा तो भी मजे। लोग हैं ,सड़क पर डपली बजाने वाले के इर्दगिर्द भी घेरा
डाल देते हैं तो दुखती नस पर हाथ सहलाने से तो साथ खड़े हो ही जायेंगे।
देश में अराजकता फैले तो उनको क्या वो तो हाथ उठाकर भारत माता की
फिर भी दिखावटी जय गला फाड़ कर बोल ही देंगे। जनता इनसे सवाल
भी क्या करे ये तो कुछ काम किये ही नहीं हैं ना।

तीसरा दृश्य - 
तुष्टिकरण को हवा देना और पार्टियाँ एक -दौ नहीं यानि एक -दौ को छोड़ कर
सब। गजब की निर्लज्जता है इन नेताओँ में। छड़े चौक 100 करोड़ लोगों को
सांप्रदायिक कहते फिरते हैं जैसे इनको सांप्रदायिक वोटों की जरुरत ही नहीं है।
तुष्टिकरण में खलल पड़ने पर धाड़ मार मार के आसुँ बहाते हैं। तुष्टिकरण को
हथियार बनाकर देश के दुश्मनों को नायक ठहराते हैं। बहुत सयानेपन से मुर्ख
बनाकर सत्ता की गोटी साधते रहे हैं। इन सबका एक ही काम और धर्म है कैसे
भी करो ,तुष्टिकरण को जिन्दा रखो ताकि वोट थोकबंद मिलते रहे।

चौथा दृश्य

एक पार्टी हर मंच से चाहे वह कॉलेज हो ,उद्योग मेला हो ,महिला मंडल हो ,
गाँव की चौपाल हो,शहर की बस्ती हो ,सबसे विकास की बात करती है।
किसानो के लिए बिजली और खाद की कम दाम पर उपलब्धि ,युवाओं के
लिए रोजगार के अवसर ,उद्योगो के लिए संतुलित परिस्थिति का निर्माण ,
नारी की सुरक्षा और आत्म निर्भरता की बात,सैनिकों के गौरव की बात,
घुसपैठियों पर लगाम की बात, कानून के सरली करण की बात ,काले धन
को वापिस लाने की बात ,भ्रष्ट व्यवस्था पर प्रहार की बात करती है मगर
बाकी सभी पार्टियाँ इस पार्टी को मुद्दों से भटका कर तथ्यहीन बातों की ओर
मोड़ने का मिलकर प्रयास कर रही है ,क्यों ?देश कि समस्याओं से हटकर
बात करने वाले सियासी दल क्या भारतीयों को बुद्धिहीन समझते हैं ?जनता
जानना चाहती है कि क्या तुष्टिकरण से देश आगे बढ़ जायेगा ?क्या साँप की
लकीरों को पीटने से बात बन जायेगी ?क्या सबको भ्रष्ट ठहरा देने से विकास
हो जायेगा ?

भारत चाहता है सार्थक बहस जिसके मंथन से देश को स्फूर्ति मिले ,भारत
चाहता है समस्याओं का हल कौन पार्टी किस तरीके से करना चाहती है ,
भारत चाहता है अपना खोया हुआ आत्म सम्मान जो किस तरीके से कौन
दिला सकता है ,भारत चाहता है उसके कर के पैसों का हिसाब ,भारत
चाहता है रोजगार सृजन के उपाय ,भारत चाहता है नारी का वास्तविक
सम्मान जो किस तरह के सुधार से ठोस रूप से मिलेगा ,भारत चाहता है
निर्धनता से लड़ने का तरीका   … मगर सत्ता के लोभी इन पर बहस नहीं
होने देते और कोई पार्टी ये सवाल उछालती है तो बाकी मिलकर उसका
मुँह बंद करने में लग जाते हैं और उन्हें धर्म निरपेक्षता पर खतरा नजर
आता है और उसकी दुहाई में समय बर्बाद कर देती है जो कि गलत है।            

गुरुवार, 6 मार्च 2014

गुजरात धरने और पथराव से आगे नहीं बढ़ा है नेताश्री !

गुजरात धरने और पथराव से आगे नहीं बढ़ा है नेताश्री !

नेताजी गुजरात का विकास देखने के बहाने आये मगर उनके मन में खोट भरी थी
जिसे गुजरात की चतुर जनता ने पहचान लिया क्योंकि गुजरात की जनता पाटेकर के
अनगिनत मोरचे देख चुकी है और उसके कारण करोड़ो का खर्चा (विलम्ब के कारण
से बढ़ा उसे) भुगत चुकी है ,गुजरात का विकास देखना है तो चश्मा बदले,नजरिया
बदले,मन और आत्मा को शुद्ध करे,बदले।  कोई व्यक्ति जिस भी उद्देश्य से आया है उसे
अपना आने का उद्देश्य स्पष्ट करना चाहिए ,मुंह में राम और बगल में छुरी रख
कर गुजरात के अमन को आग लगाने की कोशिश करने वाले लोग वर्त्तमान में
अपनी साख और पहचान दोनों खो चुके हैं इस गुजरात की धरती से ।

   खुली सड़क पर आप जो चाहे बक दे और जुजारु प्रजा उसका विरोध ना करे ,आपने
गुजरात की प्रजा को मुर्ख समझा है क्या? गुजरात के विकास को देखने के लिए बुद्धि
चाहिए ,आप अपना स्वार्थ साधने के लिए गुजरात को धरने का ,पथराव का मन्त्र
देने आये हैं तो वापिस लौट जाइये क्योंकि गुजरात मेहनत और पुरुषार्थ के रास्ते पर
चल रहा है। गुजरात के विकास की पोल खोलने आये हैं ना आप ,यानि हमारे ही मेहमान
बनकर हमारा ही अपमान करना चाहते हैं ,आपको छह: करोड़ गुजरातियों की मेहनत
और पुरुषार्थ ढ़ोंग लगता है ?आप समझते क्या हैं खुद को ?क्या गुजरात के शान्त जल
में कंकड़ फैंकने आये हैं ?गुजरातियों को बेवकूफ बनाने की कोशिश मत करिये क्योंकि
गुजरात विकास करने वालों को और जबाबदारियों से भाग छूटने वाले कायरों को
पहचानता है। गुजरात में जब भूकम्प आया था तब आप कहाँ थे ?गुजरात जब बाढ़
से त्रस्त था तब आप कहाँ थे ?गुजरात जब प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त था तब आप
कहाँ थे ?गुजरात पर आतंकी हमला हुआ तब आप कहाँ थे ?आप झूठे और छली
समाज सेवको के साथ हैं ना ? अपना कौनसा रूप दिखने आये हैं?झूठी धर्म निरपेक्षता
के काँटों से गुजरातियों को लहुलुहान करने का इरादा तो नहीं हैं ना आपका ?

गुजरात की प्रजा सबसे पहले भारतीय गुजराती है,यहाँ हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई
को आपस में बाँट कर लड़ाने वाली दुकानो के शटर गिर चुके हैं। हमें विकास के
अलावा किसी में भी रूचि नहीं है। आपको कर दिखने का मौका दिया गया लेकिन
आप रणछोड़ बन गए क्योंकि काम करने में तपस्या, श्रम और समय लगता है लेकिन
आप ठहरे बड़बोले शँख ,आप काम नहीं करना चाहते थे और जो कर रहा है उसकी
गलतियाँ सूँघते फिरते हैं,यह अजीब राष्ट्र धर्म निभा रहे हैं आप ?भले ही हमारा गुजरात
छोटा प्रदेश है मगर जबाबदारियां बड़ी उठाने का हौसला रखता है। हम सब मिलकर
अपने प्रदेश को बेहतर बनाने में लगे हैं ,सर्वांगीण विकास में लगे हैं ,हम दशकों से
अमन चैन के दीप को रोशन किये हुए हैं और आप हैं कि जलते हुए दीप को फूँक मार
रहे हैं। खबरदार  …।

गुजरात में आपका स्वागत है इसका मतलब यह नहीं कि गुजराती प्रजा के काम का
मखौल उड़ाओ। अरे! नेताजी ,हम तो हर भारतीय से आशा करते हैं कि वह कुछ दिन
तो गुजारे हमारे गुजरात में ,हमारे विकास के हवन में हर भारतीय को आहुति देने का
अधिकार और निमंत्रण है मगर हमारे यज्ञ को नष्ट करने का अधिकार किसी को नहीं है 
गुजरात में सबका स्वागत है जो इसको जोड़ने और मजबूत बनाने के लिए आता है
इसलिए तो यहाँ देश के हर प्रदेश के वासिंदे हमेशा -हमेशा के लिए बस रहे हैं। 
          

बुधवार, 5 मार्च 2014

वोट देने से पहले …………

वोट देने से पहले  …………

वोट देने से पहले हिन्दुस्तानियों इतना जरुर सोचना कि -

80 %भारतीयों की थाली में भर पेट खाना क्यों नहीं हैं।?

पढ़े लिखे बेरोजगारों की कतार लम्बी क्यों होती जा रही है ?

जनता गरीब और नेता और बड़े अधिकारी बिना काम किये 
पूंजीपति कैसे बनते जा रहे हैं ?

किसान अपने उत्पाद आलू ,प्याज और गन्ने को क्यों बहुत 
बार अपने हाथों से नष्ट करने को मजबूर हो जाता है ?

देश के कर के पैसे का जिसने गबन किया क्यों आज तक उस 
नेता से देश की तिजोरी से निकला पैसा वापिस वसूल नहीं किया गया ?

क्यों योग्य अर्थशास्त्री के प्रधानमंत्री होते हुए देश की तिजोरी लूटती रही ?

FDI को रिटेल में खड़ाकर सरकार किसके हित में काम कर रही है ?

देश की सीमाओ पर सैनिक किसके पाप से सिर कटी लाश बने थे ?

देश में अन्य देशो के नागरिक अवैध रूप से भारत में क्यों जड़े मजबूत 
किये हुए हैं ?

देश में ज्यादातर अपराध अ -धर्मनिरपेक्षता के हाथों से क्यों हो रहे हैं ?

देश के हिन्दू यदि सांप्रदायिक हैं तो अ -धर्मनिरपेक्ष यहाँ क्यों टिकना चाहते हैं ?

धर्म के नाम पर कट्टरता को कौनसे दल शह देते हैं और उससे किसका 
हित सध रहा है ?

स्तरहीन शिक्षा और रट्टा मार पढाई क्यों जारी रखी जा रही है ?

बिना पढ़े लिखे व्यक्ति को हम वोट देकर संसद में क्यों भेजते रहते हैं ?

इस देश को वर्त्तमान में न्याय व्यवस्था बचा रही है या सरकार ?

देश की 30 %से ज्यादा आबादी मतदान करने की बजाय उस महत्वपूर्ण 
दिन में भी सोना या केवल बहस करने का कर्त्तव्य क्यों निभाना चाहती है ?

 वोट जरुर करे और वोट देने से पहले ये सवाल खुद की आत्मा से जरुर करे 
ताकि आप सही और योग्य व्यक्ति को संसद में भेजने का गौरव पा सकें।    

रविवार, 2 मार्च 2014

क्यों अच्छे लगते हैं मोदी के भाषण

क्यों अच्छे लगते हैं मोदी के भाषण 

देश आज मोदी के पीछे भाग रहा है उनको सुनने के लिए घंटों पसीना बहाता है। झूठ और
भ्रम फैलाने वाले मीडिया को ठेंगा दिखा कर उनकी सभाओं में देशवासी उमड़ पड़ते हैं,इसके
पीछे कुछ कारण हैं -
1. मोदी के चेहरे पर मक्कारी नहीं झलकती है जबकि बहुत से राजनेता मक्कार लगते हैं ।
2. मोदी अपनी बात सरलता से रखते हैं जबकि अन्य दल के नेता बात को उलझा देते हैं।
3. मोदी तर्कसंगत दृष्टिकोण रखते हैं जबकि उनके विरोधी कुतर्क रचते हैं।
4. मोदी की वाणी में निर्भीकता है जबकि उनके विरोधी वोटबैंक से डरकर चापलूसी करते हैं।
5. मोदी आत्मविश्वास से लबालब भरे रहते हैं जबकि अन्य दल के नेता खींसे निपोरते हैं।
6. मोदी के भाषणो में देश प्रेम हिलोरें लेता है जबकि विरोधी नेता जातिगत प्रेम दिखाते हैं।
7. मोदी स्पष्टवक्ता हैं जबकि उनके विरोधी नेता सत्य को जबान पर लाने कि हिम्मत भी
नहीं करते हैं।
8. मोदी जनभावना के अनुकूल बोलते हैं जबकि अन्य नेता जमीन से जुड़े नहीं होने के
कारण जन भावना को समझ ही नहीं पाते हैं या फिर अनुभवहीनता दिखाते हैं।
9. मोदी में छिछोरापन नहीं ,गम्भीरता है जबकि दूसरे नेता फिजूल के आरोप लगा कर
भाषण पूरा करते हैं।
10. मोदी समस्या पर करारी चोट करते हैं जबकि अन्य दल के लोग समस्या को पकड़ना
ही नहीं चाहते या फिर उसका पोषण करते हैं।
11. मोदी ने जो किया उसका हवाला देते हैं जबकि अन्य दल अपनी सफलता मोदी की
कमियाँ क्या है उसका ब्यौरा देने में देखते हैं।
12. मोदी श्रोता को खुद की लय से जोड़ते हैं जबकि अन्य नेता खुद ही प्रश्न करते हैं और
खुद ही उत्तर देते हैं।
13. मोदी के व्यंग चुटीले,तीखे और धारदार होते हैं जबकि अन्य नेता व्यंग को बोलने का
अंदाज मातम फैलाने जैसा कर देते हैं।
14. मोदी के नारे सार्थक और व्यापक अर्थ रखते हैं जबकि विरोधी दल के नारे खुद की 
जय जयकार पर आधारित होते हैं।
15. मोदी की बॉडी लेंग्वेज  सकारात्मक है जबकि अन्य नेताओं के हावभाव कोसने
वाले होते हैं।
16. मोदी जब व्यंग से मेडम और शहजादा कहते हैं तो ये सुंदर अलंकरण वाले शब्द भी
विरोधीओं की हवा निकल देते हैं जबकि विरोधी उन पर व्यंग्य में सिर्फ गाली या अपशब्द
ही कह अपनी खीज निकालते हैं।
17. मोदी सपने दिखाना और उनको साकार कर सकने का भरोसा जनता को दिलाते हैं
जबकि अन्य नेता जनता को नगद,सुविधा या पूरा ना किया जा सकने वाले वादे का
जाल फेंकते हैं।
18. मोदी हमेशा सहज ,बेफ़िक्र और जुजारु नजर आते हैं जबकि अन्य नेता  …
19. मोदी की व्यवस्था और सभा प्रबंधन मजबूत और आधुनिक होता है जबकि  …
20. मोदी शेर की तरह दहाड़ता है जबकि बाकी विरोधी  ....