सोमवार, 17 मार्च 2014

भँग की तरँग में नेताजी

भँग की तरँग में नेताजी 

नेता और तरँग एक साथ चलते हैं ,जिसमें तरँग नहीं वो नेता कैसा ?नशा और तरँग में
यही एक मोटा फर्क है नशा उतरने के बाद असलियत बता देता है और तरंग उतरती -
चढ़ती है इसलिए नेता भूतपूर्व हो सकता है मगर तरँग के कारण खुद को नेता ही
मानता है।

एक बूढ़े अर्थ विज्ञानी को एक नेता ने तरँग की घुट्टी पिला दी,घुट्टी पीने के बाद वो
भी नेता बन गए और अर्थ पर घूम घूम कर यह बताते फिरते हैं कि मेने किया बहुत
कुछ मगर नजर नहीं आता है। अब उन्हें कौन समझाये कि ताऊ काले रँग में सब
छिप जाता है नजर आता है केवल रँग। …

एक उप प्रमुख तो भँग की तरँग में सपने देख कर उसका लाइव प्रसारण भी करने
लग गए। कम मत समझना ,इस बार पप्पू 200 अँक से पास होगा,सब कुछ रट
लिया है बस 2 G, खेल ,मकान ,जमीन ,रक्षा और कोयला ये पाठ दर्द बढ़ा रहे हैं।
ये कोर्स में नहीं है ,बाहर से जोड़ दिए गए हैं ,भूल जाओ   …

एक दल की माँ तो भाँग की तरँग को दस साल से उतरने ही नहीं दे रही है सुबह
शाम हर पत्ते को पिसती है मगर हर तरँग में छुटकू फिर भी छुटकू ही नजर आता
है ,बड़ा ही नहीं होता छुटकू !हे राम ,कब बड़ा होगा ,सयाना होगा ,घोड़े चढ़ेगा  …

एक दल के नेता तरँग में चैन उतरी साइकिल पर पेडल मारे जा रहे हैं। साँस
फूलने के बाद उतरती तरँग में खुद को वहीं का वहीं पाते हैं। एक दौ गाली
और झिड़की पुरानी कुर्सी को देते हैं और चढ़ती तरँग से जोर से पेडल मारते हैं,
सपने देखते हैं,शम्भू मेले का आयोजन करते हैं ,हरे -हरे पत्ते घिसते हैं मगर
तरँग ठहरती ही नहीं है  .... 

एक नेता तो अभी तक खाये हुए पत्ते चारे को पचाने के लिए तिहाड़ यात्रा पर जाते हैं
भँग के पत्ते को बट्टे पर पिसते हैं और नहीं खाने पर लठ बंधन पर ठुमका लगा देते
हैं खाने के बाद तरँग में गठबंधन की ताल पर उछलते हैं

एक विद्रोही ने कुछ समय पहले भंग कि नशीली घुट्टी बनायी ,पढ़े लिखे लोगों
पर आजमाई जब सबको एक साथ चढ़ गयी तो सबने तरँग में बैठा दिया टीले पर।
वहाँ ऊँचे टीले पर बैठने से विद्रोही का नेता में रूपांतरण हो गया। चढ़ती तरँग
में टीले पर कूदा कूद की ,निचे गिरा और रायता बना कर भंग घोटने लगा। भँग
की तरँग में चिल्लाने लगा -जोर लगा के  … सा ,खुद को तरँग में उड़ते पाया
लेकिन जनता ने रायता पी लिया और तरँग से बाहर आ गयी मगर भाई अभी
भी झूल रहा है ,जोर लगा के ही ई सा  …

एक नेता ने 15 साल पहले भंग की तरँग का बगीचा लगाया ,छक कर पी और
सबको घुट्टी पीने का न्योता दिया ,पहले गाँव वालो ने पी और झूम कर नाचने
लगे ,तरँग ऐसी चढ़ी की उतरी ही नहीं तब उस परफेक्ट पुड़िया को ले घर घर
पहुँच गए जो भी जिस भी कोने में बैठ कर पी रहा है तो तरंग में गाता है -हर
हर हर हर हर   …… घर घर घर घर     ....  यही तो तरँग की अद्भुत देन  ……       

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