रविवार, 20 अप्रैल 2014

वोट के अधिकार से लोकतंत्र बचा लो तुम

वोट के अधिकार से लोकतंत्र बचा लो तुम 

इतिहास करवट बदलना चाहता है,वर्षों की गुलामी के कारण हम भारतवासी अधिकार
को भूल गए थे और आजादी के बाद भी "जीने के अधिकार" के लिए तरस रहे हैं,कारण
देश के वो शासक थे जिनको हमने चुन कर इसलिए इतने साल तक भेजा कि वो हमें
सुदृढ़ भविष्य देंगे मगर हमें घोर निराशा मिली।

हमारी आज की अविकसित अवस्था और चरमरा गयी व्यवस्था के दोषी देश के नेता
के साथ हम खुद भी रहे हैं। हमने वोट के अधिकार का इस्तेमाल जाति ,धर्म और वर्ग
को ध्यान में रख कर किया और ज्यादातर लोगों ने अपने अधिकार का इस्तेमाल भी
नहीं किया इसका नतीजा यह रहा कि देश जातियों और धर्म के नाम पर बँटता रहा
12 %से 20 %वोट पाने वाले लोग नेता बनकर राज करने लगे। जब इतने कम अंतर
से सांसद और विधायक चुने जाने लगे तो शातिर और धूर्त लोग राष्ट्रिय सेवा को व्यापार
बना कर सौदा करने लगे और निजी लाभ की खातिर देश की सम्पदा पर लूट चलाने
लगे ,इस लूट के विरोध में कुछ लोग आशा हीन होकर व्यवस्था के विरुद्ध हो गए तो
कुछ लोग चाटुकार हो गए और अधिकांश मतदाता वोट देने से ही कतराने लगे।

माँ विदुला और पुत्र संजय का इतिहास याद होगा। विदुला ने कहा था -पुत्र संजय ,यूँ
कायरता से संग्राम छोड़ देने से अच्छा था कर्तव्य निभाते हुये रण में वीर गति को
वरण कर लेता, धुँआ करने वाली गीली लकड़ी की तरह जीने का क्या अर्थ ,इससे
अच्छा काम कम समय के लिए मगर सूखी लकड़ी की धधक कर जीता। मानते हैं कि
युग बदला है और अधिकार पाने के तरीके भी बदले हैं। लोकतंत्र में वोट का अधिकार
बहुत बड़ा होता है ,इसकी शक्ति से तख़्त और ताज बदलते हैं। जो शासक व्यवस्था
नहीं कर सकता,परिस्थति के वश में होकर रोना रोता है,प्रजा के धन को लूट लेता
है और चाटुकार प्रिय हो जाता है उसे नहीं बदलने वाला भी तो दोषी है। हम जातिगत
भेदभाव सहते हैं ,तुष्टिकरण सहते हैं,भ्रष्टाचार सहते हैं,गरीबी और भुखमरी को सहते
हैं, बेकारी को सहते हैं और सामाजिक अव्यवस्था को सहते हैं और गीली लकड़ी की
तरह घुट -घुट कर जीते हैं ,क्यों ? .... क्योंकि हम बदलाव से डरते हैं या फिर अच्छे
और बुरे की पहचान करना भूल गये हैं।

आज जो नेता देश की दुर्दशा पर हमें घूम घूम कर जगा रहा है,राष्ट्र की गरिमा और
अस्मिता को बचाने में सहयोग माँग रहा है,अभावों के जीवन से छुटकारा दिलाना
चाहता है हम उस पर भी शंका करते हैं। जरुरत है कि हम धूर्त नेताओं के ,झूठे
नेताओं के चुँगल से छुटकारा पाये। अगर इतने  साल भी अंधकार में जीये तो फिर
अंधकार को चुन लेना मूर्खता नहीं होगी ,विकास की व्यवस्था के लिए जर्जर व्यवस्था
को हटाना पड़ेगा और काम हम सबका है और सबको करना पड़ेगा। यदि इस बार
भी हमने अपने अधिकार का इस्तेमाल बुद्धि से नहीं किया और जाती, धर्म, भाषा और
वंशवाद पर कर दिया तो महँगाई ,गरीबी और बेरोजगारी पर रोना मत।

आपका हर वोट भारत को बदलेगा शर्त इतनी की योग्य शासक की पार्टी को वोट
करना,इस बार प्रान्त ,भाषा ,मजहब और जाति को दूर रखना। आधे देश ने वोट
करके देश की दिशा तय कर दी है आप भी अब वोट के अधिकार से सशक्त भारत के
लिए वोट का प्रयोग करना                  

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

हिल गये ना झूठे सेक्युलर !

हिल गये ना झूठे सेक्युलर !

राष्ट्रवाद के सामने छद्म धर्मनिरपेक्षता बुरी तरह हिल गयी ना। पूरा देश एक लहर में
है और वो लहर है राष्ट्रवाद की। इस देश को लम्बे इन्तजार के बाद एक ऐसा नेता
मिला है जो छाती ठोक कर कहता है मैं हर धर्म का आदर करता हूँ पर मुझे अपने
हिंदुत्व पर गर्व है,संस्कृति पर गर्व है ,भारत भूमि पर गर्व है।

इस देश से काँग्रेस का सफाया क्यों हो रहा है ?अध नंगे फकीर की काँग्रेस भारत से
विलीन क्यों हो गयी ? कारण साफ है इस सत्ता ने भारतीयों को दौ समुदाय में बँटने
दिया -अल्प संख्यक और बहु संख्यक इतना ही नहीं बहु संख्यक को बाँटने के लिए
दलित,पिछड़ा ,अति पिछड़ा वर्ग को जाति के आधार खण्डित किया इसका गलत
असर देश के विकास पर पड़ा क्योंकि सभी वर्ग आपस में भ्रमित हो गए। इसका
नुकसान देश और देशवासियों को हुआ और फायदा  … ?

इस प्रपंच से देशवासी विकास से दूर होते गये उनके हिस्से में आई बेकारी,भ्रष्टाचार,
धार्मिक कटटरता,अशिक्षा,भुखमरी और गरीबी। देशवासी स्वराज्य और स्वतंत्रता
के स्वरूप को तरसते रह गये और लालफीताशाही,अफसरशाही तथा नेताशाही के
नागपाश में बंध गए। लोकतंत्र के नाम पर वर्षो तक लूट चली, गरीब और गरीब
होता रहा और राज नेताओ की दया नीतियों पर मृत्यु की प्रतीक्षा करता जीता रहा।

किसे मालुम था कि एक साधारण परिवार से निकला बच्चा देश की पीड़ा को दूर
करने के लिए चट्टान बन कर छद्म धर्मनिरपेक्षता के तूफान को इस तरह रोक देगा !!
आज देश का हर वर्ग बेहाल है,सबको रोजी रोटी चाहिये। पेट की भुख धार्मिक
कटटरता के भाषण से दूर नहीं होती है ,तुष्टिकरण की नीति से दूर नही होती है।
नागरिकों के अधिकारों में जातिगत पक्षपात से सामाजिक भाईचारा ना तो पैदा
होने वाला था और ना हुआ,जातिगत पक्षपात से भाईचारा दूर होता गया और आपस
में मन मुटाव और द्वेष पैदा हुआ।

वर्षो तक अँधेरे में जीने के बाद देशवासी जागरूक होने लगे। सम्मान से रोजी रोटी
कमाकर भाईचारे का सपना देखने लगे। कौन सच्चा और कौन धुर्त है कि पहचान
करने लगे। राष्ट्रवाद के लिए,अमन चैन के लिए,सर्व धर्म समभाव के लिए ,रोजी -
रोटी की सुव्यवस्था के लिए देश ने अब तक के सेक्युलर आकाओ को धराशायी
करके उस नेता का हाथ थाम लिया जो दुसरो के सम्मान की रक्षा का वचन दे रहा
है और खुद के सम्मान की रक्षा में भी समर्थ है। अब परिवर्तन निश्चित है जिसे
रोकने का माद्दा स्वार्थी नेताओं में नहीं है ,यह परिवर्तन नए युग की नींव रखेगा
हम भारतवासी अपने मताधिकार का प्रयोग करके इस दीप की लौ को स्थिर
रखने में सहयोग दे ,यही समय का तकाजा है और छद्म लोगों को तमाचा।           
   

रविवार, 13 अप्रैल 2014

धर्म विहीन राजनीति या राजनीति विहीन धर्म

धर्म विहीन राजनीति या राजनीति विहीन धर्म 

देश को क्या चाहिये -धर्म विहीन राजनीति या राजनीति विहीन धर्म ?

धर्म विहीन राजनीति किस काम की ? जिस तरह आत्मा बिना शरीर कुछ काम
का नहीं होता है उसी तरह धर्म तत्व के बिना राजनीति कैसी ?
इस देश के नेता हर दिन धर्म विहीन राजनीति की बात करते हैं जब -जब भी
राजनीति से धर्म का लोप हुआ है तब -तब अनाचार ,अत्याचार ,अनैतिकता
को बढ़ावा मिला है और उस अनैतिकता को परास्त करने के लिए हर युग में
धर्मयुद्ध लड़ा गया है। आज देश पीड़ा में है क्योंकि राज नेतृत्व की सोच बदल
गयी है आज के नेता अब जनता पर धर्म विहीन राज कर रहे हैं ,जब शासक
धर्म विहीनता की बात करता है ,धर्म विहीनता की पैरवी करता है तब देश
में अराजकता का राज हो जाता है।
धर्म मानवीय जीवन मूल्यों का सरंक्षण करता है ,संस्कृति की रक्षा करता है
सद्गुणों का पोषण करता है। धर्म मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा रहता है। धर्म
परोपकार ,मैत्री ,दया ,क्षमा ,करुणा और सद्भाव जैसे दैवीय गुणों को आचरण
में लाना सिखाता है अगर हम धर्म विहीन हो जायेंगे तो राक्षस बन जायेंगे और
राजनेता धर्म विहीन हो जायेंगे तब जनता शोषित और दुःखी हो जायेगी।
यह कटु सत्य है कि आज के नेता धर्म विहीन राजनीति करते हैं और इसी कारण
से देश भ्रष्ट शासक वर्ग से बेहाल है। जब शासक वर्ग में नीति ना होगी तो उच्च
जीवन मुल्य की कल्पना भी खत्म हो जायेगी। आज ज्यादातर नेता धर्म निरपेक्षता
की बात करते हैं मगर देश फिर भी बेहाल है ,क्यों ?
आज समय की मांग है धर्म से रक्षित राजनीति की। हमारे देश के नेताओं को धर्म
का पालन और अनुसरण करना असहज लगता है इसलिए राजनीति से धर्म को
हटाकर धर्म के प्रतीक चिन्हों पर शठ नीति कर रहे हैं धर्म की जगह मतवाद को
पंथवाद को बढ़ावा देकर खून खराबा करवा रहे हैं जो देश को गर्त में धकेल रहा है.

देश को चाहिए राजनीति विहीन धर्म। धर्म के नाम पर राजनीति का कुचक्र सालों
से देश पर लाद दिया गया है। धर्म में राजनीति घुसा कर स्वार्थ पूरा किया जा रहा
है। अगर नेता लोग धर्म को धर्म रहने दे और उसमें कुचेष्टा ना करें तो वो ज्यादा
कुछ नहीं करते हुए भी बहुत कुछ देश के लिए कर देंगे। अगर धर्म में राजनीति
ना होगी तो तुष्टिकरण खत्म हो जायेगा,सर्व धर्म समभाव  रहा तो पंथवाद पर हो
रहा खराबा खत्म हो जायेगा और मतावलम्बियों को मद्देनजर रख कर बनने वाली
निकृष्ट नीतियाँ बंद हो जायेगी। क्या खुद को सेक्युलर जमात के नेता समझने वाले
आयना लेकर एक बार खुद को निहारेंगे और धर्म के नाम पर राजनीति करना बंद
करेंगे ?

देश की माँग है धर्म युक्त राजनीती की। समय परिवर्तन के रास्ते से गुजर रहा है और
हर बालिग़ समझदार नागरिक को अवसर दे रहा है ,यह अवसर चूक गए तो फिर
धर्म विहीन राजनीति होगी ,भ्रष्ट शासक होंगे। समय देश वासियों को भाग्य विधाता
बनने का अवसर दे रहा है और राष्टवाद का सपना दे रहा है ,आओ हम सब मिलकर
राष्ट्र भक्त नेता को चुने और धर्म की संस्थापना के लिए वोट का उपयोग करे।    

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

मतदान को अवसर में बदलने का समय

मतदान को अवसर में बदलने का समय 

राष्ट्र के सामने रास्ता चुनकर आगे बढ़ने का समय है और समय को अवसर में बदल 
देने का मौका हर वोटर के हाथ में है ,हम अपने अधिकार का सदुपयोग और दुरूपयोग 
करने को स्वतंत्र हैं मगर इसके परिणाम भी हम खुद ही पाने वाले हैं इसलिए वोट 
देने से पहले राष्ट्र की अस्मिता पर विचार करना,अपने कर्तव्य पर विचार करना ,राष्ट्र 
वाद पर विचार करना। वोट देने से पहले इतना जरुर सोचना कि -

भारत में भुखमरी के लिए जिम्मेदार कौन है ?

भारत में भ्रष्ट राजनीति का पोषण कौन कर रहे हैं ?

भारत की राजनीति में विभिन्न धर्मावलम्बियों में फूट और सन्देह पैदा करके 
लड़ाने से किनका स्वार्थ पूरा हुआ ?

धूर्त ,कुबुद्धि,पाखण्डी,पक्षपाती ,अराजक ,शक्तिहीन ,अहँकारी ,ढोंगी और कामी को 
वोट का दान ना करे क्योंकि कुपात्र को दिया गया दान व्यर्थ का कर्म होता है ,इससे 
अच्छा है मत का उपयोग नहीं करे यदि आवश्यक लगे तो जो कम दुर्गुणी हो उसे 
वोट दे दे।

बदलाव का अर्थ यह नहीं कि खोटी उठा पटक करो ,बदलाव को उन्नति और विकास से 
जोड़कर देखो। बार बार वादा खिलाफी करने वाले, कहकर मुकरने वाले,कथनी करनी 
में अंतर रखने वाले निरंकुश लोगो के हाथ में शासन मत सौंपो। 

राष्ट्र की सरहदों की असलामती, अन्य राष्ट्रों की गुलामी और जी हजूरी, राष्ट्र के लिए 
अनर्थकारी नीति निर्माण, राष्ट्र मे आंतरिक अव्यवस्था, सद्भाव की जगह पक्षपात,
राष्ट्रिय सम्पदा की लूट खसोट और कमरतोड़ राजस्व की वसूली ने हमको गहरी 
खाई में धकेला है इसके लिए जिम्मेदार कौन ?क्या फिर से उनको वोट करना हमारी 
राष्ट्रभक्ति होगी ?सोचो ,सोचो ! वोट करो ,सब को जागृत करो ,देश भक्त सरकार चुनने 
का समय आया है ,अपने एक एक वोट से राष्ट्र निर्माण में सहयोगी बनो।            

    

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

विकसित भारत के लिए वोट करो

विकसित भारत के लिए वोट करो 

भारत रुग्ण अर्थव्यवस्था वाला देश क्यों बन कर रह गया ?क्या यहाँ का नागरिक
बुद्धि बल में कमजोर है या फिर सही नेता के अभाव में निराश हो गया है,यदि नेता
के अभाव में निराश है तो आशा का दीप जलाना कहाँ मना है ,आप का एक वोट
भारत के सुन्दर भविष्य के लिए मूल्यवान है वह भी तब जब आप बुद्धि का इस्तेमाल
करके वोट डालते हैं

आश्चर्य भी और विडम्बना भी !! हम पढ़े लिखे लोग वोट करने के लिए निकलते
नहीं हैं और देश की बदहाली पर हर दिन घंटो भड़ास निकालते हैं ,क्या फायदा ?
घंटो बहस करने की जगह सही और योग्य व्यक्ति को वोट किया होता तो आप
की कार्य क्षमता में 365 *5 घंटे और देश की कार्य क्षमता 365 *5 *800000000
घंटे से बढ़ जाती।

इससे भी बड़ी विडंबना कि पढ़े लिखे लोग जब वोट नहीं करते हैं तब नेता चुनने का
सारा बोझ उन लोगों पर आ जाता है जो निरक्षर या मामूली पढ़े लिखे हैं। जब ये
लोग नासमझी से गलत व्यक्ति को संसद में भेज देते हैं तब पढ़े लिखे लोग अखबारो
में ,मीडिया में ,सार्वजनिक मंचो से उनके खिलाफ जागृति फैलाने का काम करते हैं
जब जागने का समय आया तो हम नींद ले रहे थे और नींद लेनी थी ,चैन से रहना
था तब हायतौबा मचाते हैं।

हम आरोप लगाते हैं कि गरीब और भूखे भारतीय वोट की ताकत नहीं समझते और
वोट बेचते हैं चन्द रुपयों के लालच में, मगर वोट नहीं देकर हम लोकतन्त्र का या
खुद का क्या भला कर पाये हैं ?

हम उम्मीदवार की जीत और हार के लिए जाति और धर्म को प्रधानता देते हैं क्योंकि
खुद को पंडित और त्रिकालदर्शी ठहराने वाले लोग मतदान केंद्र पर पहुँचना हीन काम
मानते हैं जबकि वो जानते हैं कि उनके वोट ना करने से देश की तस्वीर पर गर्त जम
गयी है।

हमारा कर्त्तव्य बनता है कि हम राष्ट्रवादी लोगों को चुनकर भेजे और वे चुने हुए योग्य
लोग देश के उत्थान के लिए काम करे। देश को भ्रष्टाचार से ,गरीबी से ,बेरोजगारी से ,
छद्म निरपेक्षता से ,धूर्त सियासत से बचाना है तो वोट देने के लिए मतदान केंद्र तक
जाना सीखो,उसके बाद जो परिणाम होगा उससे वंशवाद,तुष्टिकरण,भय,वोटबैंक ,
गरीबी,बेकारी,दंगे -फसाद,अशिक्षा,भ्रष्टाचार ,नौकरशाही जैसे भयंकर रोग खत्म
होते नजर आयेंगे।                  

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

गन्दी बात ……

गन्दी बात  …… 

भारत की गरीबी और भुखमरी भारत के लिए गन्दी बात है मगर उन वादा करने
वाले ढोंगियों पर अंधविश्वास करते रहना भी गन्दी बात होगी।

गरीब भारतीयों से छुपे हुए कर लगाकर लिए गए पैसे डकारना  गन्दी बात,मगर
देश की तिजोरी को खाली करने वालो को फिर से संसद में भेजना भी गन्दी बात
होगी।

गैस के सिलेण्डर बारह से नौ करना गन्दी बात थी क्योंकि सबसे ज्यादा सब्सिडी
तो पैसेवालों पर लूटा दी जाती है और नौ से बारह सिलेण्डर करना भी गन्दी चाल
थी। मुर्ख समझने वालों को सत्कार से संसद में बैठाना भी गन्दी बात होगी।

सीमा पर बहादुरों के शीश काट लिए जाए और हिन्दुस्तानी सल्तनत का खून नहीं
खोलना गन्दी बात थी ,हिन्दुस्थान में आतँक फैलाने वालो के लिए दुवा माँगना भी
गन्दी बात थी ,बहादुर शहीद शर्मा जी की शहादत बेकार चली गई तो गन्दी बात
होगी।

ईमानदार ऑफिसर का बार बार तबादला गन्दी बात है ,मगर ईमानदार ऑफिसर
के सवालों पर जनता  सही प्रतिसाद ना दे तो भी गन्दी बात होगी।

अल्पसंख्यको को विकास की ऊँचाई पर ना ले जाना भी गन्दी बात थी मगर उन्हें
तुष्टिकरण की अँधेरी खाई की ओर धकेलते जाना भी गन्दी बात है फिर भी अपनी
समझ को नहीं जगा पाना और वोट बैंक बने रहना भी गन्दी बात होगी।

गरीब भारतीय को 26 से 32 रूपये कमाने पर धनवान मान लेना गन्दी बात है
26 में गुजारा करने के लिए उन्हें अन्न दान माँगने के लिए मजबूर करना भी
गन्दी बात है। गरीब दान के सस्ते अन्न को खा कर अब भी सोता रहा तो भी
गन्दी बात होगी।

लुच्चे नेता को साहूकार बताने वाली खबरे बताते रहना गन्दी बात है मगर लुच्चो
को बचाने के लिए ईमानदारी का खौफनाक नाटक खेलना भी गन्दी बात है। इस
धूर्तता के नाटक को वास्तविकता समझना भी गन्दी बात है। राष्ट्रवादियों को
शासन चलाने से दूर रखने के लिए षड़यंत्र रचना भी गन्दी बात होगी।

चीन हमें आँख दिखाए ,पाकिस्तान साजिश रचे यह देश के लिए गन्दी बात है
मगर हम हुँकार भरने की जगह बिरयानी से उनका स्वागत करने वालो को
साँसद बना दे तो यह भी गन्दी बात होगी।

हमारा वोट ना करना भी गन्दी बात है मगर घुसपेठियों के मतदान के कारण कोई
राष्ट्रवादी हार जाए तो भी गन्दी बात होगी।    

रविवार, 6 अप्रैल 2014

व्यवस्था परिवर्तन की ओर हिन्दुस्थान

व्यवस्था परिवर्तन की ओर हिन्दुस्थान 

हमें बहुमूल्य मानव  रत्न गँवाने के बाद आजादी मिली मगर सुराज्य नहीं मिला,
सुराज्य नहीं मिलने के पीछे जो कारण रहे हैं उनमें शासक वर्ग की खोटी नीतियाँ 
जिम्मेदार है -
बहुसंख्यक वर्ग की घोर अवहेलना 
बहुसंख्यक वर्ग में फूट डालना और वैमनस्य बढ़ाना 
पूजा -पद्धति और ईष्ट के आधार पर बहुसंख्यक वर्ग के टुकड़े करना 
जन्म और जाति के आधार पर गरीबी के मापदण्ड तय करना और आरक्षण देना 
अल्पसंख्यकों को झूठा भय दिखाना 
अल्पसंख्यकों को समान नागरिक अधिकार से दूर रख कर मुख्यधारा से अलग 
रखना 
अल्पसंख्यको को विकास की जगह तुष्टिकरण का झुनझुना थमा देना 
आम जनता पर छुपे कर लगा कर उन्हें निरन्तर गरीब बनाये रखना 
पूंजीपतियों को औद्योगीकरण के नाम पर भारी सब्सिडी देकर कर से प्राप्त आय 
का दुरूपयोग करना 
व्यवस्था के नाम पर अफसर शाही थोपना 
कानून के सरलीकरण की जगह पेचीदा और अधूरा बनाये रखना जिससे भ्रष्ट 
व्यवस्था को पोषण मिलता रहे 
आदर्श चरित्र और देश हित में निर्णय लेने वाले नेताओं का अकाल 
शिक्षा में गुणवत्ता का अभाव 
लघु उद्योगो के विकास की नीति का अभाव 
स्वास्थ्य सेवाओं की फोरी हालत 
कृषि क्षेत्र में उन्नत बीज और नयी तकनीक का अभाव 
चिलाचालु सामाजिक विकास की योजनाये 
 क्या इन बीमार नीतियों से विकसित भारत तैयार होगा ?बदलनी है देश की 
तस्वीर तो सबसे पहले जागरूक बनो और व्यवस्था परिवर्तन का इरादा रखने 
वाले शेरो का चुनाव करो और 100 %मतदान करो। अब तक के सड़े गले शासन 
से छुटकारा पाओ ,सुराज का दिखावा करने वाले धूर्तों को रास्ता दिखाओ और 
जो निष्ठां से देश सेवा में लगे हैं उनके स्वर को बुलँद करो।  
 

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण

राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण 

आजाद भारत में जातिगत और धर्म के नाम पर भ्रम और भय फैलाने वाले लोग
कौन है और उनको कब तक सहना है ?यह तय करने का समय पक गया है।

वर्त्तमान भारत में भारतीयों को लड़ाने वाले सत्ताधीश क्या शासक बनने के पात्र
हैं,गलत गंतव्य की ओर भूल से बढ़ जाने का मतलब यह नहीं कि आप विपरीत
दिशा में मुँह घुमाकर कदम नहीं बढ़ा सकते हो,बस मुँह फेर कर कदम बढ़ाने की
जरुरत है,भारतीयों को लड़ाने वाले नेता धूल फाँकते नजर आयेँगे।

आजाद भारत इतने वर्षों बाद भी मुलभुत नागरिक सुविधाओं के लिए (बिजली,
पानी,सड़क,शिक्षा और मकान ) क्यों तरस रहा है ?  इतने सालों तक
जनता से कर के रूप में वसूला गया धन का बड़ा हिस्सा किसकी जेब में गया ?

आजादी के बाद से आज तक अल्पसंख्यकों के तारणहार बनने वाले यह स्पष्ट
करें की आज भी अल्प संख्यक विकास की मुख्यधारा से दूर निम्न जीवन
स्तर पर जीने को मजबूर क्यों हैं ?उन्हें राष्ट्रवाद की धारा से दूर रखने का नीच
कृत्य कौन लोग कर रहे हैं और क्यों ?

तुष्टिकरण और धर्म के आधार पर मानव -मानव में फर्क करना किन लोगों ने
सिखाया और इस अधम नीति से किसे फायदा हुआ ?

सर्व धर्म समभाव के आधार पर चल रहे हिंदुत्व की साम्प्रदायिक व्याख्या करने
वाले सत्ताधीश किस के हित के लिए मिथ्या भय भारतीयों में फैला रहे हैं ?इस
मिथ्या भय से राष्ट्र ने क्या खोया और किन लोगों ने कितना पाया।

हिंदुत्व एक जीवन पद्धति है तो इसका सँकुचित अर्थ करने वाले क्या राष्ट्र विरोधी
नहीं है ?क्या ऐसे निकृष्ट नेताओं का साथ देना राष्ट्र हित में है ?

क्या निर्धन भारतीयों को रोजगार देने की जगह उन्हें मुफ्त या सस्ता देने की
चाल चलने वाले नेता देश की बहुत बड़ी जनसँख्या को निठल्ला और कामचोर
नहीं बना रही है?उन्हें तुष्ट करके पुरुषार्थ से रोकने का काम राष्ट्र हित में है ?

अब तो नींद से जागो भारतीयों, हम सब एक और नेक बनें। राष्ट्र के विकास के
लिए जाग जाए वरना आने वाली पीढ़ियाँ माफ नहीं करेगी,आने वाले भविष्य
की समृद्धि के लिए राष्ट्र हित में फैसला ले। आने वाले पाँच साल के लिए ऐसा
नेता मत चुन लेना जो विकास की बातें करके राष्ट्र का सिर झुकाता हो ,ऐसा
नेता चुनना जो सतत विकास की राह पर चल रहा है,राष्ट्रवाद के लिए संघर्ष
कर रहा है।                  

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

नव सर्जन के लिए ध्वंस

नव सर्जन के लिए ध्वंस 

पुनर्निर्माण और नव सर्जन के लिए जर्जर ढाँचे का ध्वंस होना जरुरी है। महात्मा ने
देश स्वतन्त्र होने के बाद यही सन्देश दिया था लेकिन देशवासी समझ नहीं पाये थे
और उस संगठन को जिन्दा रखते रहे जो देश की स्वतंत्रता के उद्देश्य के लिए बनाया
गया था और वह गौरवशाली संगठन अपना उद्देश्य पूरा कर चूका था। वन में खड़ा
कभी हरा -भरा रहा पेड़ जब ठूँठ बन जाता है तो उसे जलाने के उपयोग में ले लेना
चाहिए उसका खड़ा रहना वन की शोभा को कम करता है क्योंकि उस पर कभी पक्षियों
का कलरव नहीं गूँजता केवल उल्लू और कौए ही बसते हैं। हमने प्रकृति के विरुद्ध काम
किया और ठूँठ को जलाने की जगह हरा भरा करने में अपनी ऊर्जा लगाने लगे।

    देश की आजादी के लिए बना सँगठन हमें आजादी दे गया ,वह आजादी के बाद की
विकास गाथा को लिखने के लिए बना ही नही था मगर हम ध्वंस नहीं कर पाये और
नतीजा यह रहा कि हम विकास की दौड़ में लकवाग्रस्त होकर गिर पड़े। पेड़ की जड़े
भी साल में एक बार पेड़ के सभी पोषक तत्व पत्तो तक नहीं पहुँचने देती ,क्यों ?
जड़े जानती है कि पेड़ का नवसर्जन करना है तो पके हुए पत्तो का जड़ना जरूरी है
मगर हम पीले पड़ चुके पत्तो से ठण्डी हवा लेना चाहते थे ,क्या मिला ??

         देश को सुदृढ़ अर्थ तंत्र  किसी भी धर्म का प्रमुख नहीं दे सकता है,मजबूत
अर्थ व्यवस्था के लिए राष्ट्रवादी विचारधारा चाहिए और समर्पण चाहिए। देश का
दुर्भाग्य है कि हमारे नेता समर्पण से काम करने की बजाय पाँच साल तक नींद लेते
हैं और देश को लूटते हैं ,जनता पर आक्सीजन लेने और मरने के बाद अन्तिम
क्रियाकर्म को छोड़ हर गतिविधि पर कर के डंक मारते हैं मगर फिर भी आश्चर्य इस
बात का है कि हर कोई सहन करने का आदी हो चूका है ,तुच्छ नेता हमारे खून को
गर्म करके अपनी रोटियाँ सेकते रहते हैं मगर कभी हमारे दिमाग को नहीं झकझोरते
हैं।
  हम लोग रोना रोते हैं ,संघर्ष करते हैं,फोकट में सुविधाएँ चाहते हैं पर नवसर्जन
के लिए अनुपयोगी का ध्वंस नहीं चाहते। अनुपयोगी वस्तुओं से मोह हमें दुःख दे
रहा है। हम सालो तक बोझ ढो सकते हैं मगर नव सर्जन की चाह नहीं रखते।

  जब भी भारत का भविष्य बनाने का अवसर आता है हम कर्त्तव्यच्युत हो जाते
हैं ,हम अपने मताधिकार का राष्ट्र के हित में प्रयोग भी नहीं करते हैं। मतदान
के प्रति हमारी उदासीनता से हमारे पर लूटेरे,अपराधी,धुर्त,बलात्कारी,हत्यारे,
और लफंगे राज करते हैं, 12 से 22% मत पाने वाले लोग जन प्रतिनिधि बन
जाते हैं ,क्या ऐसे ही जीना चाहेंगे ?यदि हाँ तो फिर दोष देना बंद कीजिये और
अगर ना तो फिर नवसर्जन के लिए अनुपयोगी ठूँठ को उखाड़ फेंकिये। सबके
विकास के लिए मुट्ठी बाँध लीजिये और राष्ट्रवादी विचारधारा की जीत को
सुनिश्चित कीजिये।                

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

अभिमन्यु और चुनावी समर का दृश्य

अभिमन्यु और चुनावी समर का दृश्य 

महाभारत युद्ध में भी युद्ध के नीति नियम बने थे जिन्हे दोनों पक्षों को मानना था
मगर विशेष आपात परिस्थियों में नियम टूटे थे फिर वर्त्तमान चुनावी समर में
नियमों का कठोरता से पालन असम्भव है क्योंकि साम दाम दण्ड भेद के द्वारा
वोट खींचना ही उम्मीदवारों का लक्ष्य रह गया है।

हर चुनावी समर में जनता अभिमन्यु बन कर रह जाती है। छद्म निरपेक्षता के
मोह में नेता धृतराष्ट बन गए हैं। विद्वान लोग विदुर बन युद्ध के कर्त्तव्य से दूर हट
गए हैं। चोरों को बचाने और उनकी विजय को निश्चित बनाने के प्रयास में राष्ट्र
का झंडा उठाते हुए शिखंडी हाय तोबा मचा रहे हैं। शकुनि वर्त्तमान अर्जुन के विजय
रथ को रोकने के लिए दुशासन और दुर्योधन को कूटनीति पढ़ा रहे हैं। अधर्म और
धर्म निरपेक्षता समान अर्थ में प्रयुक्त हो रहे हैं। झूठे वादो और सुख के सपनों के तीर
सबके तरकस में सजे हैं ,सब पार्टियाँ जी खोल कर आश्वासन बाँट रही है क्योंकि
इस देश में वादे ना निभाने पर उम्मीदवार और पार्टियों को सजा देने का प्रावधान
कानून में नहीं है।

मतदाता उदासीन है क्योंकि वह जानता है कि अभिमन्यु की मौत निश्चित है ,कुछ
मतदाता इसे कमाने के अवसर के रूप में देख रहे हैं क्योंकि वोट के बदले चंद सिक्के
कुछ समय के लिए उसके पेट की भूख को शांत करने वाले हैं। कुछ मतदाता वोट
डालेंगे मगर वास्तव में खुद ही फर्जी हैं। कुछ मतदाताओं के वोट उनके बिना डाले
ही बाहुबली डालने वाले हैं और कुछ मतदाता वोट का उपयोग ना करके अपने अहम
का पोषण करेंगे।ज्यादातर मतदाता अपने मजहब को बचाने के लिए पार्टी विशेष
के पक्ष में मतदान करेंगे और निर्बल मजहब को सहारा देंगे। कुछ अपनी जाति का
लिहाज करेंगे और आँखे मूँदकर मूर्खों को वोट डाल देंगे। बहुत कम ऐसे लोग हैं जो
लोकतंत्र और जनहित के लिए मतदान करेंगे।

इस समर में कृष्ण सारथी की नहीं अर्जुन की जगह लेना चाह रहे हैं पर भीष्म
पितामह के कारण अपने मनसूबे पुरे नहीं कर पा रहे हैं पर ताक में बैठे हैं कैसे
भी जैसे ही विजय कुछ हाथ दूर रह जाए तो तुरंत अर्जुन बन जाये।

चुनावी समर का योद्धा अर्जुन अकेला डटा है और चक्रव्यूह को तोड़ने की जिद्द
अभिमन्यु को नहीं करने दे रहा है। व्यूह बद्ध खड़े विरोधी गालियाँ बक रहे हैं,
टोह लेने के लिए दूत छोड़ रहे हैं,आरोप लगा रहे हैं,कीचड़ उछाल रहे हैं,मगर फिर
भी मर्द का बच्चा अकेला डटा है ,खुद ही सारथी और खुद ही योद्धा बना हुँकार
भर रहा है। उसकी हुँकार से सुदूर देश भी त्राहिमाम पुकार कर लाल जाजम अपने
स्वार्थ पूरा करने की फिराक से बिछा रहे हैं मगर वह सब समझ रहा है उसकी
फिक्र यही है कि अभिमन्यु बचा रहे और उसके पीछे सहारा बन खड़ा रहे।                 

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

छोड़े और पकड़ें

छोड़े और पकड़ें 

सुख और दुःख को समझने के लिए एक व्यक्ति ऋषियों ,विद्वानों और ज्ञानियों 
की खोज में भटक रहा था मगर उसे संतोष जनक उत्तर नहीं मिल पाया था। 

भटकते -भटकते उसकी भेंट एक किसान से हो गयी। किसान ने उससे भटकते 
फिरने का कारण पूछा तो उसने अपना प्रश्न बता दिया। किसान ने कहा -यदि 
एक महीना तुम मेरे पास रहो तो तुम्हे इसका हल मिल जायेगा। वह व्यक्ति 
किसान के पास रुक गया। किसान हर रात उसके पास आता और उसको 
चंद्रदेव का दर्शन करने को कहता। एक महीना बीत जाने के बाद उस व्यक्ति 
ने किसान से अपने प्रश्न का हल पूछा तो किसान ने कहा -तुमने पुरे एक 
महीने तक चन्द्रदेव का दर्शन किया ,तुमने चंद्रदेव में क्या देखा ?

वह व्यक्ति बोला -पन्द्रह दिन तक चन्द्र का स्वरुप क्षीण होता गया और अगले 
पंद्रह दिन में स्वरुप पूर्णता प्राप्त करता गया। 

किसान बोला -इसी स्वरुप में तेरे प्रश्न का उत्तर निहित है ,हम पंद्रह दिन अपनी 
बुराइयाँ छोड़ने में लगाये और अगले पन्द्रह दिन सद्गुणो के विकास में बिताये। 
बुराइयों का क्षीण होना ही सुख है और सदगुणों का क्षीण होना ही दुःख है। 
बुराइयों को प्रयत्न पूर्वक छोड़े और सद्गुणों को प्रयत्न पूर्वक पकडे ,सुख -दुःख को 
समझने का यह सरलतम उपाय है।