रविवार, 20 अप्रैल 2014

वोट के अधिकार से लोकतंत्र बचा लो तुम

वोट के अधिकार से लोकतंत्र बचा लो तुम 

इतिहास करवट बदलना चाहता है,वर्षों की गुलामी के कारण हम भारतवासी अधिकार
को भूल गए थे और आजादी के बाद भी "जीने के अधिकार" के लिए तरस रहे हैं,कारण
देश के वो शासक थे जिनको हमने चुन कर इसलिए इतने साल तक भेजा कि वो हमें
सुदृढ़ भविष्य देंगे मगर हमें घोर निराशा मिली।

हमारी आज की अविकसित अवस्था और चरमरा गयी व्यवस्था के दोषी देश के नेता
के साथ हम खुद भी रहे हैं। हमने वोट के अधिकार का इस्तेमाल जाति ,धर्म और वर्ग
को ध्यान में रख कर किया और ज्यादातर लोगों ने अपने अधिकार का इस्तेमाल भी
नहीं किया इसका नतीजा यह रहा कि देश जातियों और धर्म के नाम पर बँटता रहा
12 %से 20 %वोट पाने वाले लोग नेता बनकर राज करने लगे। जब इतने कम अंतर
से सांसद और विधायक चुने जाने लगे तो शातिर और धूर्त लोग राष्ट्रिय सेवा को व्यापार
बना कर सौदा करने लगे और निजी लाभ की खातिर देश की सम्पदा पर लूट चलाने
लगे ,इस लूट के विरोध में कुछ लोग आशा हीन होकर व्यवस्था के विरुद्ध हो गए तो
कुछ लोग चाटुकार हो गए और अधिकांश मतदाता वोट देने से ही कतराने लगे।

माँ विदुला और पुत्र संजय का इतिहास याद होगा। विदुला ने कहा था -पुत्र संजय ,यूँ
कायरता से संग्राम छोड़ देने से अच्छा था कर्तव्य निभाते हुये रण में वीर गति को
वरण कर लेता, धुँआ करने वाली गीली लकड़ी की तरह जीने का क्या अर्थ ,इससे
अच्छा काम कम समय के लिए मगर सूखी लकड़ी की धधक कर जीता। मानते हैं कि
युग बदला है और अधिकार पाने के तरीके भी बदले हैं। लोकतंत्र में वोट का अधिकार
बहुत बड़ा होता है ,इसकी शक्ति से तख़्त और ताज बदलते हैं। जो शासक व्यवस्था
नहीं कर सकता,परिस्थति के वश में होकर रोना रोता है,प्रजा के धन को लूट लेता
है और चाटुकार प्रिय हो जाता है उसे नहीं बदलने वाला भी तो दोषी है। हम जातिगत
भेदभाव सहते हैं ,तुष्टिकरण सहते हैं,भ्रष्टाचार सहते हैं,गरीबी और भुखमरी को सहते
हैं, बेकारी को सहते हैं और सामाजिक अव्यवस्था को सहते हैं और गीली लकड़ी की
तरह घुट -घुट कर जीते हैं ,क्यों ? .... क्योंकि हम बदलाव से डरते हैं या फिर अच्छे
और बुरे की पहचान करना भूल गये हैं।

आज जो नेता देश की दुर्दशा पर हमें घूम घूम कर जगा रहा है,राष्ट्र की गरिमा और
अस्मिता को बचाने में सहयोग माँग रहा है,अभावों के जीवन से छुटकारा दिलाना
चाहता है हम उस पर भी शंका करते हैं। जरुरत है कि हम धूर्त नेताओं के ,झूठे
नेताओं के चुँगल से छुटकारा पाये। अगर इतने  साल भी अंधकार में जीये तो फिर
अंधकार को चुन लेना मूर्खता नहीं होगी ,विकास की व्यवस्था के लिए जर्जर व्यवस्था
को हटाना पड़ेगा और काम हम सबका है और सबको करना पड़ेगा। यदि इस बार
भी हमने अपने अधिकार का इस्तेमाल बुद्धि से नहीं किया और जाती, धर्म, भाषा और
वंशवाद पर कर दिया तो महँगाई ,गरीबी और बेरोजगारी पर रोना मत।

आपका हर वोट भारत को बदलेगा शर्त इतनी की योग्य शासक की पार्टी को वोट
करना,इस बार प्रान्त ,भाषा ,मजहब और जाति को दूर रखना। आधे देश ने वोट
करके देश की दिशा तय कर दी है आप भी अब वोट के अधिकार से सशक्त भारत के
लिए वोट का प्रयोग करना                  

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