गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

अभिमन्यु और चुनावी समर का दृश्य

अभिमन्यु और चुनावी समर का दृश्य 

महाभारत युद्ध में भी युद्ध के नीति नियम बने थे जिन्हे दोनों पक्षों को मानना था
मगर विशेष आपात परिस्थियों में नियम टूटे थे फिर वर्त्तमान चुनावी समर में
नियमों का कठोरता से पालन असम्भव है क्योंकि साम दाम दण्ड भेद के द्वारा
वोट खींचना ही उम्मीदवारों का लक्ष्य रह गया है।

हर चुनावी समर में जनता अभिमन्यु बन कर रह जाती है। छद्म निरपेक्षता के
मोह में नेता धृतराष्ट बन गए हैं। विद्वान लोग विदुर बन युद्ध के कर्त्तव्य से दूर हट
गए हैं। चोरों को बचाने और उनकी विजय को निश्चित बनाने के प्रयास में राष्ट्र
का झंडा उठाते हुए शिखंडी हाय तोबा मचा रहे हैं। शकुनि वर्त्तमान अर्जुन के विजय
रथ को रोकने के लिए दुशासन और दुर्योधन को कूटनीति पढ़ा रहे हैं। अधर्म और
धर्म निरपेक्षता समान अर्थ में प्रयुक्त हो रहे हैं। झूठे वादो और सुख के सपनों के तीर
सबके तरकस में सजे हैं ,सब पार्टियाँ जी खोल कर आश्वासन बाँट रही है क्योंकि
इस देश में वादे ना निभाने पर उम्मीदवार और पार्टियों को सजा देने का प्रावधान
कानून में नहीं है।

मतदाता उदासीन है क्योंकि वह जानता है कि अभिमन्यु की मौत निश्चित है ,कुछ
मतदाता इसे कमाने के अवसर के रूप में देख रहे हैं क्योंकि वोट के बदले चंद सिक्के
कुछ समय के लिए उसके पेट की भूख को शांत करने वाले हैं। कुछ मतदाता वोट
डालेंगे मगर वास्तव में खुद ही फर्जी हैं। कुछ मतदाताओं के वोट उनके बिना डाले
ही बाहुबली डालने वाले हैं और कुछ मतदाता वोट का उपयोग ना करके अपने अहम
का पोषण करेंगे।ज्यादातर मतदाता अपने मजहब को बचाने के लिए पार्टी विशेष
के पक्ष में मतदान करेंगे और निर्बल मजहब को सहारा देंगे। कुछ अपनी जाति का
लिहाज करेंगे और आँखे मूँदकर मूर्खों को वोट डाल देंगे। बहुत कम ऐसे लोग हैं जो
लोकतंत्र और जनहित के लिए मतदान करेंगे।

इस समर में कृष्ण सारथी की नहीं अर्जुन की जगह लेना चाह रहे हैं पर भीष्म
पितामह के कारण अपने मनसूबे पुरे नहीं कर पा रहे हैं पर ताक में बैठे हैं कैसे
भी जैसे ही विजय कुछ हाथ दूर रह जाए तो तुरंत अर्जुन बन जाये।

चुनावी समर का योद्धा अर्जुन अकेला डटा है और चक्रव्यूह को तोड़ने की जिद्द
अभिमन्यु को नहीं करने दे रहा है। व्यूह बद्ध खड़े विरोधी गालियाँ बक रहे हैं,
टोह लेने के लिए दूत छोड़ रहे हैं,आरोप लगा रहे हैं,कीचड़ उछाल रहे हैं,मगर फिर
भी मर्द का बच्चा अकेला डटा है ,खुद ही सारथी और खुद ही योद्धा बना हुँकार
भर रहा है। उसकी हुँकार से सुदूर देश भी त्राहिमाम पुकार कर लाल जाजम अपने
स्वार्थ पूरा करने की फिराक से बिछा रहे हैं मगर वह सब समझ रहा है उसकी
फिक्र यही है कि अभिमन्यु बचा रहे और उसके पीछे सहारा बन खड़ा रहे।                 

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