शनिवार, 5 अप्रैल 2014

राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण

राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण 

आजाद भारत में जातिगत और धर्म के नाम पर भ्रम और भय फैलाने वाले लोग
कौन है और उनको कब तक सहना है ?यह तय करने का समय पक गया है।

वर्त्तमान भारत में भारतीयों को लड़ाने वाले सत्ताधीश क्या शासक बनने के पात्र
हैं,गलत गंतव्य की ओर भूल से बढ़ जाने का मतलब यह नहीं कि आप विपरीत
दिशा में मुँह घुमाकर कदम नहीं बढ़ा सकते हो,बस मुँह फेर कर कदम बढ़ाने की
जरुरत है,भारतीयों को लड़ाने वाले नेता धूल फाँकते नजर आयेँगे।

आजाद भारत इतने वर्षों बाद भी मुलभुत नागरिक सुविधाओं के लिए (बिजली,
पानी,सड़क,शिक्षा और मकान ) क्यों तरस रहा है ?  इतने सालों तक
जनता से कर के रूप में वसूला गया धन का बड़ा हिस्सा किसकी जेब में गया ?

आजादी के बाद से आज तक अल्पसंख्यकों के तारणहार बनने वाले यह स्पष्ट
करें की आज भी अल्प संख्यक विकास की मुख्यधारा से दूर निम्न जीवन
स्तर पर जीने को मजबूर क्यों हैं ?उन्हें राष्ट्रवाद की धारा से दूर रखने का नीच
कृत्य कौन लोग कर रहे हैं और क्यों ?

तुष्टिकरण और धर्म के आधार पर मानव -मानव में फर्क करना किन लोगों ने
सिखाया और इस अधम नीति से किसे फायदा हुआ ?

सर्व धर्म समभाव के आधार पर चल रहे हिंदुत्व की साम्प्रदायिक व्याख्या करने
वाले सत्ताधीश किस के हित के लिए मिथ्या भय भारतीयों में फैला रहे हैं ?इस
मिथ्या भय से राष्ट्र ने क्या खोया और किन लोगों ने कितना पाया।

हिंदुत्व एक जीवन पद्धति है तो इसका सँकुचित अर्थ करने वाले क्या राष्ट्र विरोधी
नहीं है ?क्या ऐसे निकृष्ट नेताओं का साथ देना राष्ट्र हित में है ?

क्या निर्धन भारतीयों को रोजगार देने की जगह उन्हें मुफ्त या सस्ता देने की
चाल चलने वाले नेता देश की बहुत बड़ी जनसँख्या को निठल्ला और कामचोर
नहीं बना रही है?उन्हें तुष्ट करके पुरुषार्थ से रोकने का काम राष्ट्र हित में है ?

अब तो नींद से जागो भारतीयों, हम सब एक और नेक बनें। राष्ट्र के विकास के
लिए जाग जाए वरना आने वाली पीढ़ियाँ माफ नहीं करेगी,आने वाले भविष्य
की समृद्धि के लिए राष्ट्र हित में फैसला ले। आने वाले पाँच साल के लिए ऐसा
नेता मत चुन लेना जो विकास की बातें करके राष्ट्र का सिर झुकाता हो ,ऐसा
नेता चुनना जो सतत विकास की राह पर चल रहा है,राष्ट्रवाद के लिए संघर्ष
कर रहा है।                  

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