शुक्रवार, 30 मई 2014

भारतीय मीडिया में गन्दगी

भारतीय मीडिया में गन्दगी

मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है परन्तु भारत का मीडिया नकारात्मक
हो गया है। मनगढ़ंत खबरे दिखाना ,बहस के नाम पर बतंगड़ खड़े करना,
राजनैतिक आकाओं का प्यादा बनके गुलामी करना,भारतीय प्रजा में
जातिवाद के बीज बोना ,अश्लिलता परोसकर पैसे कमाना,राष्ट्र हित के
सकारात्मक समाचारों से दुरी बनाये रखना जैसे नाना प्रकार के दूषण के
भरी बोझ से दबा है। बड़ा अजीब लगता है जब देश के प्रबुद्ध लोग उनके
बचकाने प्रश्नो का उत्तर देने के लिए घंटों ख़राब करते हैं।
जब किसी बात से दावानल प्रगट करवाना हो,किसी महानुभाव के कहे
गये स्टेटमेंट का खोटा अर्थ निकलना हो, अहम मुद्दो से देश का ध्यान
भटकाना हो  इत्यादि काम बड़ा रस लेकर करता है इसीलिए अच्छे और
काम में विश्वास रखने वाले नेता इनसे अच्छी दुरी बनाये रखते हैं।

कुछ समाचार वाचक जो खुद को तारणहार समझते हैं एक सिरफिरे दल
के अर्द्ध विकसित मानसिकता वाले की शान में इस तरह कसीदे पढ़ रहे
थे जैसे उसे वे देश का मुखिया बना देंगे पर जनता है वो सब जानती है
समाचार देखती जरूर है पर कसौटी पर कस के खुद देखती है और खुद
निर्णय पर पहुँचती है।

मीडिया का काम सुचना पहुँचाना है उसकी व्याख्या करना नहीं परन्तु
भारतीय मीडिया सुचना को तोड़ मरोड़ के पेश करता है और हर चैनल
उस खबर की खाल निकालता है ,उनकी इन करतूतों से देश को क्या मिला ?
किसी पक्ष को बचाना और किसी को जबरदस्ती गिराना यही काम प्रमुखता
से करते रहने में कैसी सार्थकता नजर आती है। मीडिया समाचार का भावार्थ
निकाल कर दर्शकों के दिमाग में भ्रम क्यों पैदा कर क्या हासिल करना चाहता
है ?

देश हित में लगकर सकारात्मक,जस की तस बात पहुँचाने की कोशिश मीडिया
कब करेगा ?केवल आलोचना करने से अच्छा समाचार वाचक नहीं बना जाता
है। किसी पर राग-द्वेष से पूर्वाग्रसित होकर खबर देने से वह लोकतंत्र का स्तम्भ
नहीं बन सकता। सरकारी भोंपू बनने से देश का हित नहीं सधता।

पत्रकारिता का गौरव बना रहे और राष्ट्र का हित सधता रहे इस सूत्र को पकड़
कर ही वह देश का मजबूत स्तम्भ बन सकता है और उसे बनना चाहिये       

बुधवार, 28 मई 2014

नैतिकता ,त्याग,पुरुषार्थ और सरकारी नीतियाँ =स्वर्णिम भारत

नैतिकता ,त्याग,पुरुषार्थ और सरकारी नीतियाँ =स्वर्णिम भारत 

सरकार बदल देने मात्र से जनता यह सोचे कि अच्छे दिन आ जायेंगे तो यह भूल
होगी। विगत साठ सालों में सरकारे आई और गई मगर अच्छे दिन दूर खिसकते
गये ,क्यों ?

सरकारी नीतियाँ और चालक बल -जनता अपने नेताओँ के आचरण का ही
अनुकरण करती है। नेता यदि आदर्श आचरण पर चलते हुये दिखे हैं तब जनता
भी आदर्शों का स्वेच्छा से अनुकरण करती है और जब नेता भ्रष्ट आचरण में
सिर तक डूबे रहते हैं तब जनता भी भ्रष्ट उपायों का खुला उपयोग करती है।
बड़ी विडंबना है कि जब हमारे पास साधन सीमित थे तब विश्व हमें सोने की
चिड़ियाँ से जानता था आज जब हमारे पास तुलनात्मक रूप से साधन ज्यादा
है तो विश्ब हमें गरीब राष्ट्र के रूप में जानता है। क्यों हुआ ऐसा ?जब देश का
चालक बल नैतिकता,राष्ट्रभक्ति ,त्याग और पुरुषार्थ खोने लगा और जनता पर
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर लगा कर अपने सुख आराम में लीन हो गया। जब
राजा ही जनता को लूटने लग जाए तो स्वर्णिम सपने भी दुःस्वप्न में बदल
जाते है। अच्छे दिन लाने के लिए सरकार को चाहिये कि वो जनता पर कर का
भार घटा दे,खोटे खर्चे बंद करे ,संवेदनशील बने और सरकारी छुट्टियाँ घटा कर
पुरुषार्थ करे।

जनता का कर्तव्य - अपनी सरकार चुन कर पाँच साल नींद लेना अकर्तव्य है।
आज तक जनता यही तो करती आयी है। सरकार चुन लेने मात्र से परिस्थिति
में आमूलचूल परिवर्तन नही आता है,सरकार चुनने के बाद सजग रहना पड़ता
है और पुरुषार्थी बनना पड़ता है। आज जनता में नैतिकता का स्तर गिरता जा
रहा है,लोग अपना रुपया बचाने के लिए अठ्ठनी भ्रष्ट लोगों पर खर्च कर देते हैं।
जनता में त्याग और राष्ट्र प्रेम दिखावा बन गया है,सरकारी नियमों की अवहेलना
करना आचरण में आ गया है। सरकार यदि काम करती है तो जनता उसको और
बढ़ाने में लग जाती है वह यह नहीं सोचती है कि सरकार के काम को बढ़ाने पर
अंतिम बोझ उसी पर आना है। हम बिना शर्म महसूस किये सड़कों पर कचरा
फैंक देते हैं,मिठ्ठे पानी में कचरा फैंकते हैं, कानून तोड़ आवारागर्दी करते हैं और
पुरुषार्थ छोड़ आलसी बन सरकार से अनुदान बाँटने की गुहार लगाते हैं।

स्वर्णिम भारत - अच्छे दिन देखने का संकल्प यदि देशवासियों में है तो उन्हें
नैतिक बनना होगा ,संवेदनशील रहना होगा ,दैवीय गुणों को आचरण में लाना
होगा और पुरुषार्थी बनना होगा। प्रजा यदि नैतिक ,पुरुषार्थी और सजग है तो
सरकार भी प्रजा के हित में काम करेगी। स्वर्णिम भारत के लिए सरकार जनता
के लिए सरल रास्ते तैयार करे और जनता कन्धे से कन्धा मिला कर उन रास्तों
पर आगे बढे।              

रविवार, 25 मई 2014

पड़ोसी पाकिस्तान और भारत की नीति ?

पड़ोसी पाकिस्तान और भारत की नीति ?

देश आजाद हुआ और भारतवर्ष खंडित हो गया और उसका ही अँग उसका शत्रु
बन गया जो आज तक सामने के हाथ में फूल और पीछे के हाथ में छुरा रखता
है। क्या इसके पीछे का मूल कारण प्राकृतिक सम्पदा से सम्पन्न कश्मीर है या
पाकिस्तान की काल्पनिक शंका से युक्त मनोदशा ?

पाकिस्तान मामले में भारत का रुख हमेशा से नरम रहा है या ढुलमुल रहा ,इसके
पीछे का कारण अदूरदृष्टा राजनीतिज्ञ रहे या भारतीय लोकतन्त्र की वोटबैंक साधने
की कुटिल नीति ,कारण चाहे दोनों ही रहे हो या एक लेकिन नतीजा यह रहा कि
हमारी सरहद अकारण सुलगती रही और अन्य विदेशी ताकतें जो भारत के बढ़ते
प्रभुत्व को सह नहीं पा रही थी वे अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए पाकिस्तान का
बेजा और भारत का साधारण इस्तेमाल अपना आर्थिक और सामरिक हित साधने
में करती रही।

स्वतंत्र भारत अब अपना नया युग शुरू कर रहा है और ऐसे में सारा विश्व अपनी
निगाहें गड़ाये हर हलचल का अपने -अपने स्वार्थ के अनुसार नफा नुकसान का
गणित पढ़ रहा है। भारत की नीति इस बात को केंद्र में रख कर होनी चाहिए कि 
हमारा बिलकुल भी अहित ना हो और दुश्मन का भी जहाँ तक बन सके वहाँ तक 
भला हो। क्षमा वीरस्य भूषणम  यह नीति है कोई आध्यात्मिक चिन्तन नही है। 
भारत ने आज तक इस नीति का दुरूपयोग किया है और आज तक इसका 
दुष्परिणाम भोगा है। जब शत्रु का अपराध प्रमाणित हो जाता है और वह उचित 
दण्ड से बचा रहता है इसे क्षमा का दुरूपयोग माना जाता है। प्रमाणित अपराध 
पर शत्रु को उचित दण्ड देना ही क्षमा नीति का उपयोग होता है। 

पडोसी देश छोटा है या बड़ा यह बाद की बात है हमारी सीमायें उसकी सीमाओं
से सटी है इसलिए हमारे लिए सबका महत्व है। भारत के विकास के लिए
आवश्यक है पडोसी देशों में सुख समृद्धि और विकास का होना। यदि हमारे
पडोसी देशों में गरीबी ,भुखमरी ,बीमारी और अशिक्षा है तो इसका असर हमारे
पर पड़ना ही है। भारत अपने पडोसी देशों के साथ मिलकर इन मुद्दों पर सार्थक
बात करे यदि ये रुग्णता मिटेंगी तो सरहद पर काफी समस्याएँ खत्म हो जाएगी।
गरीबी और अशिक्षा आतँकवाद को प्रश्रय देते हैं ,हमें खड़ा होना है तो पहले इन
रुग्णताओं को नेस्तनाबूद करना है, अपने देश से भी और पडोसी देशो से भी।
जब पेट भरा होगा तो आवाम जीना चाहेगा और जीने के लिए सहयोग और
सहकार के मन्त्र सीखेगा।

हमें अपने पडोसी देशों को स्पष्ट और कड़ा सन्देश देना पड़ेगा कि भारत में अस्थिरता
फैलाने के सपने देखने वाले पडोसी पर कठोर कार्यवाही की जायेगी जो शाब्दिक
नहीं होगी तथा जो पडोसी अपने देश के विकास के लिए भारत से हर स्तर पर
अच्छे सम्बन्ध रखना चाहता है भारत सदैव उसके साथ सहकार और सहयोग रखेगा।
अगर हमारे पडोसी एक फूल भेँट करेंगे तो हम दस करेंगे और वो एक गोली मारेगा
तो हमारी दस बंदूकें गरजेगी।  

बाप

बाप

बाप की थप्पड़-
दुनियाँ की अँधड़ से बचाती है;
क्योंकि -
उन की थप्पड़ में- 
अनुशासन का पाठ है ,
कर्तव्य का ज्ञान है ,
कुल के गौरव का ध्यान है ,
बाप की थप्पड़ -
दुनियाँ की थपेड़ों से बचाती है ;
क्योंकि -
उन की थप्पड़ में, 
सही -गलत की पहचान है,
लोक व्यवहार की खान है, 
स्वाभिमान की तान है, 
बाप की थप्पड़ -
दुनियाँ की थप्पड़ों से बचाती है; 
क्योंकि -
उन की थप्पड़ में ,
तपते भविष्य का सूरज है ,
सुनहरे जीवन के सितारे हैं,
दमकती रोशनी का चाँद है ,
सही मायने में 
बाप की थप्पड़ -
कच्चे लोहे को 
फौलादी इस्पात में 
बदलने की प्रक्रिया है। 
जब दुनियाँ की ठोकर ,
चकनाचूर कर देती है,
तब  
बाप से मिली नन्हीं सी ठोकर;
सारी दुनियाँ को बाँधना सिखाती है। 




शनिवार, 24 मई 2014

माँ

माँ 

बहुत छोटा सा अक्षर है -माँ 
मगर, 
हर रिश्ते से ऊपर है ;
क्योंकि -
इसके दिल में, 
ममता है ,
वात्सल्य है ,
दुलार है ,
इसकी आँखों में- 
प्यार की सौगात है ,
मिलन की आस है ,
बिछुड़ने का दर्द है ,
इसकी जबाँ पर -
स्नेह की छाँव है ,
मिठ्ठी झिड़की है ,
सन्तान का नाम है ,
इसके हाथों में -
भोर का कलेवा है,
सुबह की रोटी है, 
शाम का भात है ,
ताउम्र इसने क्या किया ?
कभी दूध पिलाती है, 
कभी खाना सिखाती है ,
कभी चलना सिखाती है ,
कभी लिखना सिखाती है ,
सन्तान की ख़ुशी में खुश होती है ,
संतान के दुःख में आँसू बहाती है ,
देरी से घर लौटने पर चोखट पर डोलती है ,
मन्नते माँगती है कभी मन्दिर में ,
दुआएँ माँगती है कभी मस्जिद से ,
कभी नजर उतारती है, 
कभी राई-नोन उवारती है,
संतान के सुख के लिए ,
सर्वस्व लुटाती है। 
सन्तान इसके ऋण को 
उतारे या ना उतारे ,
इसके मुख से हमेशा 
दुआ ही निकलती है ,
दुआ ही निकलती है। 
  



गुरुवार, 22 मई 2014

ताकत

ताकत 

गाँव के पास तालाब के किनारे कुछ बच्चे खेल रहे थे तभी एक दौ मुँह वाला साँप
रेंगता हुआ आ गया। पहले तो बच्चे साँप -सांप चिल्ला कर भयभीत हुये फिर
कुछ दूर जाकर ध्यान से उसे देखा और उसके निकट आकर उसे मारने सताने
लगे। दौ मुँह वाले साँप को सताते बच्चों को देख पास की कुटिया से एक महात्मा
निकले और उन्होंने बच्चों से पूछा -क्या तुम लोगों को भय नहीं है इससे ?

बच्चों ने कहा -यह दौ मुँह वाला दोगला साँप है इसमें ताकत नहीं होती है इसलिए
इससे भय कैसा ?

कुछ दिन बाद बच्चे वहां खेल रहे थे तभी एक साँप का बच्चा वहां से रेंगता हुआ
जा रहा था ,बच्चे साँप -साँप चिल्लाकर भयभीत हुये ,सुरक्षित दुरी से उन्होंने
उस साँप के बच्चे को देखा और चिल्लाये -भागो ,कालिंदर नाग का बच्चा है।

बच्चों को भागते देख महात्मा ने उन्हें रोका और पूछा -क्यों भाग रहे हो ?

बच्चों ने समवेत स्वर से कहा -सांप का बच्चा है वहाँ।

महात्मा ने निकट जाकर साँप के बच्चे को देखा और बोले -कुछ दिनों पहले
बड़े साँप से नहीं डरने वाले बच्चे इस नन्हे सपोलिये से क्यों डर रहे है ?

बच्चो में से एक ने कहा -महात्माजी ,उस दिन वाला दोगला साँप था जिसमे
जहर की ताकत नहीं थी ,यह सपोलिया (बच्चा) जरूर है पर काले नाग की
प्रजाति वाला है इसमें जहर की ताकत है।

महात्मा ने कहा -बच्चो ,तुम भी जिंदगी में ऐसे ही बनो ,दुष्ट व्यक्ति यदि शान्त
हो तो उसे छेड़ो मत और दुष्ट यदि तुम्हे अकारण छेड़ रहा हो तो पूरी शक्ति से
आक्रमण कर दो मगर दोगली नीति कभी मत रखना।  

बुधवार, 21 मई 2014

विस्तृत हो नये भारत का PMO

विस्तृत हो नये भारत का PMO 

आचार्य चाणक्य ने राज व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए मन्त्र दिये हैं।
राजा के मंत्री ही उसकी आँख होती है उन्हीं की मदद से राजा देश की सीमाओ से
परे तक हो रही हलचल को समझता है।

स्वतंत्र भारत की ताकत संसद है और PMO उसकी ताकत का ऊर्जा केंद्र है ,यदि
PMO लगातार ऊर्जा का उत्पादन और वितरण सुचारू रूप से करता है तो देश
के हर कोने में प्रकाश का होना स्वाभाविक है।

हमारा देश एक उपमहाद्वीप है ,जहाँ विभिन्न भाषाएँ हैं ,संस्कृतियाँ हैं और धर्म
हैं। यहाँ के हर राज्य की भौगोलिक स्थिति और जरुरत भिन्न -भिन्न है और
हर राज्य के विकास के लिए अभी जो व्यवस्था चल रही है उसमें आमूलचूल
परिवर्तन की आवश्यकता है। राज्य और केंद्र में अलग -अलग दलों की सरकार
होगी और उनमें आपसी मतभेद और टकराव हो जाने की स्थिति में देश का
विकास अवरुद्ध हो जाता है।

प्रधानमंत्री कार्यालय और सरकार देश के लिए होती है। आज तक की सरकारे
केंद्र में किस तरह चली और उनका राज्यों के साथ सौतेला व्यवहार किसी से
छिपा नहीं है। अब जब युग परिवर्तन हुआ है तो जर्जर व्यवस्था के स्थान पर
नई व्यवस्था आनी चाहिये।

प्रधानमंत्री कार्यालय केवल दिल्ली से ही पुरे देश का नियंत्रण क्यों करे ,PMO
का स्वरूप विस्तृत होना चाहिये। हर राज्य की राजधानी में PMO का क्षेत्रीय
कार्यालय बनना चाहिए जो अपने मुख्य केंद्रीय कार्यालय और स्थानीय राज्य
सरकार की मदद में मुस्तैद रहे। क्षेत्रीय PMO में निष्णात व्यक्तियों की टीम हो
जो राज्य के विकास के लिए दी जा रही वित्तीय व्यवस्था तथा नयी वित्तीय
आवश्यकता पर नजर रखे और राज्य की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के प्रबंधन
पर नजर रखे और राज्य और केंद्र के बीच पुल का काम करे।

 PMO के विस्तृत स्वरूप का फायदा यह होगा कि राज्य व्यवस्था हर समय केंद्र से
सम्पर्क में रहेगी ,विकास के कामों को गति मिलेगी और प्रधानमन्त्री हर राज्य से
प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा रहेगा। देश के P M किसी भी राज्य में उपस्थित रहते हुये सहजता
से अपने काम को करते रहेंगे। 

रविवार, 18 मई 2014

हाँ ,यह हिँदुत्व की जीत है।

हाँ ,यह हिँदुत्व की जीत है। 

2014 के चुनाव परिणाम का निष्कर्ष यही है कि यह हिंदुत्व की जीत और छद्म
धर्म निरपेक्षता के दानव की वध कथा है। यह मेरी कट्टर सोच नहीं है क्योंकि
हिन्दुत्व  सर्वधर्म सद्भाव और समभाव की विरासत से लबालब है। स्वतंत्र
भारत के नेताऑ की नई जमात ने फिरंगी नीति पर ही काम किया। देश में
फुट डालो और राज करो की नीति ने राष्ट्रवाद ,राष्ट्र प्रेम और आर्य संस्कृति को
मटियामेट कर दिया। हिन्दू जातियों को जन्म के आधार पर तोड़ने का काम
हजारों वर्षों में नहीं हुआ उतना 60 वर्ष में हुआ। अनपढ़ और गरीब कुचले हिन्दू
अपने सर्वांगीण विकास के लिए देश के मति भ्रष्ट नेताओ के साथ हो गये और
मुस्लिम वर्ग को हिंदुऑ का झूठा भय दिखाकर उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा से
अलग रख वोट बैंक बना डाला ,मतिभ्रष्ट नेताओं की इस नीति ने उन्हें सत्ता का
सुख दिया मगर देश कंगाल होता गया। सोने की चिड़ियाँ फड़फड़ाती रही।

नास्त्रेदम की भविष्यवाणी थी की एशिया की धरती से एक भगवा सन्त आयेगा
जो विश्व को नयी प्रेरणा देगा ,हम लोगों ने उसे किवदंती मान लिया मगर समय
अपना काम करता है। जब प्रकृति ने वैरागी संत को वापिस जन -जन के कल्याण
के लिये पून: समाज को समर्पित कर दिया तो वह संत सेवा में निस्वार्थ भाव से
लग गया ,विरोधियों ने उस पर नाना तरह के आरोप लगाये,विदेशी ताकतों ने उसे
गिराने की भरपूर कोशिश की मगर दैव उस संत के साथ खड़ा हो गया।

देश ने 16 मई 2014 में अद्भुत युग परिवर्तन देखा। यह युग परिवर्तन जातिवाद के
खिलाफ था,तुष्टिकरण की कुत्सित राजनीती के खिलाफ था ,देश का राष्ट्रवादी समाज
संगठित हो गया क्योंकि वह जाति और आराधना पद्धति पर चल रही राजनीति से
ऊब गया था उसे रोटी, रोजगार और रक्षा चाहिये थी और उसके लिए वह घर से
बाहर निकला और अपने मत के अधिकार का उपयोग किया। फिर वही हुआ जो
विश्व अचम्भे से देख रहा है और अपने उलझे समीकरण सुलझा रहा है ।

हिँदुत्व के इस नये युग में हिँदुत्व अपनी मूल व्याख्या में आयेगा। परहित चिंतन,
सद्भाव,समभाव,सर्वजन सुखाय,पुरुषार्थ,स्वाभिमान के गुणों से युक्त हिँदुत्व का
उदय निश्चित है। घट -घट में राम को देखने की नीति दिखेगी,विश्व समुदाय हिँदुत्व
को कमतर नहीं आँकेगा ,कायर नहीं समझेगा उसका कायल हो जायेगा।             

शनिवार, 17 मई 2014

अच्छे दिन लाने के लिए ....

अच्छे दिन लाने के लिए  .... 

देश झूठी तुष्टिकरण और वंशवाद की राजनीति से आजाद होकर राष्ट्रवादी शक्तियों के
हाथ में है। देश ने महात्मा गाँधी की इच्छा का सम्मान करते हुए काँग्रेस के पतवार
को उखाड़ फेंका है। अब हम सशक्त भारत के लिए तैयार हैं। मोदी के हाथ में भारत
का भविष्य है और लोगों की मोदी से जुडी आशायें हैं। मोदी से आम भारतीय क्या
चाहते होंगे -
1. गरीब वर्ग को उन्नति के अवसर -आज तक हम केवल जाति की राजनीति
देखते आये हैं। जन्म के आधार पर हमने स्वर्ण जाति को उच्च मान लिया है भले
ही उसके जीवन में अँधेरा रहा हो ,हम चाहते हैं कि हर भारतीय के लिए गरीब की
परिभाषा एक ही हो और वार्षिक न्यूनतम आय से गरीबी का निर्धारण हो।

2. देश विरोधी ताकतों का नेस्तनाबूद हो -देश की सीमाएँ सुरक्षित हो और जवान
अत्याधुनिक शस्त्रों से संपन्न और अधिकार युक्त हो। देश के अंदर और बाहर
उपद्रवी और आतंकी तत्व नष्ट हो।

3. देश के लघु उद्योग क्षेत्र का जोरदार विकास हो और उन्हें पनपाने के लिए गैर
जरुरी मदो का आयात बंद हो तथा लघु उद्योगों को सस्ते दर पर ऋण उपलब्ध
हो। बड़े उद्योगों को सब्सिडी में कमी हो।

4. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवायें - शिक्षा नीति में आमूलचूल परिवर्तन हो और शिक्षा
रोजगार लक्षी हो। स्वास्थ्य सेवाओं का गाँवों तक विस्तार हो। शिक्षा और स्वास्थ्य
सेवाओं की गुणवत्ता की नियमित जाँच हो।

5. अनावश्यक योजनाएँ बंद हो - लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च बंद हो। मनरेगा
में केवल ग्रामीण महिलाओँ और 40 वर्ष से ऊपर के पुरुष को काम दिया जाये और
काम भी क्षेत्र की जरुरत के अनुसार तय हो। मनरेगा ने युवा ग्रामीण समुदाय की
सोच को कमजोर बना दिया है ,ग्रामीण युवाओं को कुशल कार्य का मुफ्त प्रशिक्षण
मिले ताकि उसके जीवन स्तर में सुधार हो और वह पुरुषार्थी बने।

6 मुफ्त भोजन की सुविधा - निराश्रित बच्चे ,अनाथ,विकलांग,वृद्ध और बीमार अशक्त
 लोगों के लिए ही सस्ता या मुफ्त भोजन उपलब्ध हो बाकी गरीब वर्ग को बाजार मूल्य
से 25 %खाद्य सब्सिडी हो ताकि नागरिक मुफ्त की सरकारी रोटी तोड़ने का आदी ना
बन सके।

7. टैक्स में सुधार - कर व्यवस्था में सुधार हो ,सेवा कर आवश्यक मदों से पूर्णत:
हटाया जाए और उसे विलासिता की मदों तक सीमित किया जाये। आयकर के
स्लेब में सुधार हो और पाँच लाख की वार्षिक आय कर मुक्त हो। काले धन पर
अंकुश लगे ऐसी सरल और व्यवहारिक कर प्रणाली को विकसित किया जाए।

8 न्याय व्यवस्था में सुधार -लचर हो रही न्याय व्यवस्था में सुधार हो और विलम्ब से
न्याय मिलने की पद्धति में सुधार हो। बड़े और रसूखदार अपराधियों के मामले
त्वरित कोर्ट में चले और शीघ्र निर्णय हो।

9. सरकारी दफ्तरों में कार्य के घंटे बढ़ाये जाए - सरकारी छुट्टियों में कमी की जाए
और काम के घंटे तथा शिफ्ट बढ़ायी जाए।

10. भ्रष्टाचार पर अंकुश - भ्रष्ट अधिकारियों पर भारी आर्थिक दंड और सजा हो,ज्यादा काम
करने वाले अधिकारी को विशेष पैकेज दिया जाए।      

गुरुवार, 8 मई 2014

56 इन्च का जादू ....

56 इन्च का जादू  .... 

देश के बदलाव मे अब आखिरी चरण बाक़ी है। देश बदलाव चाहता है और उस बदलाव
से सुकून चाहता है। 56 इंच  के नाम की आँधी ने सब विपक्षी दलों को नाको चने चबवा
दिये हैं, तथाकथित बुद्धिजीवी दहाड़े मार रहे हैं और स्क्रीन पर खीज निकाल रहे हैँ।
छद्म राजनीतिज्ञ बहरूपिये बन कर शेर का शिकार करने के रास्ते खोजने के लिये भटक
रहे हैं और बाकी दल दिग्भ्रमित हो ङोल रहें हैं। कोई कंठी उतार कर टोपी पहन रहा है
तो कोई रंडवे की लुगाई बनने का दिखावा कर रहा है। जो मीडिया कुछ समय पहले
जिन्हें पानी पी कर कोसने के तरीके बनाता था अब उसे धंधा चलाने के लिये मन मार
कर उनके गीत गाने पड़ रहे हैं।

    नीति में साम,दाम ,दण्ड ,भेद ,माया और इंद्रजाल का उल्लेख है और इसका सफल
उपयोग राजा को करना आना चाहिए क्योंकि विजय का ही महत्व है बाकि सारा किया
धरा व्यर्थ है। इस बार धूर्त,शठ,ठग और चालबाज चित्त पड़े हैं ;किसी को कोई मौका या
जीवनदान नहीं। हर छोटी से छोटी बात का विश्लेषण करके जाल बिछाया गया है जिसमे
हर दल फँसता जा रहा है और फड़फड़ाता जा रहा है ,सब पंछी एक साथ होकर जोर
लगा रहे हैं पर जाल से खुद को छुड़ा नहीं पा रहे हैं। 56 इंच की नीति का हथोड़ा चलता
जा रहा है और जर्जर नुस्खे ध्वस्त हो रहे हैं। 

    इस चुनावी समर मे प्रमुख सेनापति गुम और मौन है या उसका उपयोग जितना
करना था वह कर लिया अब हाशिये पर कर दिया गया है। वोट कटर ने सबसे पहले
उसी डाली को काटा जिसने उसे जन्म दिया था और अब पूरी तरह से भोथरा हो गया
है। ना चाहते हुए भी यह समर उन दौ हस्तियो के बीच खेला जा रहा है जिसमें एक
महारथी है और दूसरा अनाड़ी। अनाड़ी शस्त्र विद्या में काला अक्षर है और महारथी
उसके ही शस्त्र से उस पर वार कर रहा है। अनाड़ी सेना हथियार डाल कर महारथी की
जीत के जश्न को पचाने के उपाय ढूंढ रही है।

प्रजा सिँह के साथ खड़ी है और सियारों के टोलो को खदेड़ रही है.देश के हर कोने से
दहाड़ गूँज रही है। उत्तर ,दक्षिण ,पूर्व और पश्चिम -हर दिशा जग चूकी है और अब
यात्रा अन्तिम चरण पर है। छोटी सी चूक से फायदा उठाते महारथी को देख सियासत
भोंचक्की है ,विपक्षी अपने नुकसान की गिनती मे लगे हैं और हार का ठिकरा फोड़ने
के लिए बलि का बकरा ढूँढ़ रहे है। जनता एक ही नारा लगा रही है - अबकी बार  .............  

मंगलवार, 6 मई 2014

सप्ताह के नाम से साम्प्रदायिकता झलकती है

सप्ताह के नाम से साम्प्रदायिकता झलकती है

भारत में सप्ताह के नाम बदल दिये जाने चाहिए क्योंकि इन नामों से साम्प्रदायिकता 
झलकती है और भारत तो 1947 के बाद बिन सांप्रदायिक देश हो गया है। 

1947 के पहले का भारत युद्ध मे भी धर्म का पालन करता था मगर 1947 के बाद के 
भारत में धर्म भी अपना रुप खोकर निरपेक्ष हो गया है। 

भारत में नेता महात्मा गांधी ,नेहरू ,इंदिरा ,राजीव,काशीराम ,जयप्रकाश ,लोहिया आदि 
के नाम पर वोट माँग सकते हैँ मग़र श्री राम ,श्री कृष्ण ,भगवान शिव के नाम पर वोट 
नहीं माँग सकते क्योंकि श्रीं राम ,कृष्ण ,शिव के नाम पर वोट माँगने से धर्म निरपेक्षता 
खतरे में पड़ जाती है और गाँधी ,नेहरू ,काशीराम ,लोहिया के नाम से वोट माँगने पर 
निरपेक्षता मजबुत हो जाती है, वाह रे सेक्युलरिज्म !!

चुनावी समर धर्म युद्ध नहीँ होता है क्योंकि धर्म शब्द हीं सांप्रदायिक है इसीलिए 
नेता अधार्मिक आचरण करते हैं ,झूठे वादे करते हैं,पक्षपात करते हैं। 

कश्मीरी पंडितों और हिन्दु शरणार्थियो की बात ऱखने वाले नेता देश का माहौल ख़राब 
करते हैं क्योंकि इन पंडितों और शरणार्थियों की आत्मा और खून मे साम्प्रदायिकता 
बसी हुई है मगर देश मे घुसपेठियो के बसने और बसाने मे लगे लोगोँ और नेताओ मे 
धर्म निरपेक्षता बसती है। 

आतंकवादियों की मौत पर आँसू बहाने वाले नेता खुद को धर्म निरपेक्ष मानते हैं और 
देश के खातिर प्राण अर्पित करने वाले जवानो को गलत साबित करते है ,ये है सैक्युलरिज्म 

 क्या देश बदलना चाहते हो ? उठो ,जागो और मत के अधिकार क उपयोंग करों। 

आपका वोट झूठे और धूर्त नेताओं को हाशिये पर ला खड़ा करेगा। 
       

शनिवार, 3 मई 2014

सब दलों का प्रमुख मुद्दा मोदी विरोध ही क्यों ?

सब दलों का प्रमुख मुद्दा मोदी विरोध ही क्यों ?

देश मतदान के अन्तिम पड़ाव पर है ,सभी दल एक ही उद्देश्य लेकर खड़े हैँ -मोदी
नहीं आना चाहिये ,क्या कारण है इतनी बड़ी कसरत करने के पीछे ?

1. क्या मोदी के आ जाने से इनके नकली मुखोटे उतर जाएँगे और असली चेहरा  देश
के सामने आ जायेगा जिसे देखने के बाद इनकी दूकानें बन्द हो जायेगी।

2. क्या वास्तव मे सबसे बड़े भ्रष्टाचारी लोग इन्ही नेताओं मे से है जिन्होंने देश
के धन को लूट कर विदेशों मे जमा कर रखा है और मोदी के आने से विदेशों मे
छुपाया गया धन भारत के खजाने में आ जायेगा और ये काँव -काँव मचाने वाले
नेता सलाखों में होंगे और इनकी पीढ़ियाँ कंगली हो जायेगी।

3. क्या मोदी के आने से देश के लोग अपने भारतीय होने पर गर्व महसूस करने
लगेंगे और तुष्टिकरण,जातिवाद और छद्म धर्म निरपेक्षता का दौर मटियामेट हो
जायेगा और लूले-लँगड़े नेता अपने बोरियाँ -बिस्तर बाँध कर वनवास को स्वत:
स्वीकार कर लेंगे।

4. क्या मोदी युग के उदय होने के बाद काली राजनीति करने वाले नेताओ के
काले और घिनौने कारनामो से पर्दाफाश हो जायेगा और देश गुज़रात की प्रजा
की तरह सालों तक मोदी के पीछे एकजुट खड़ा हो जाएगा।

5. क्या विदेशी ताकतें जो अभी तक भारत को अस्थिर करने के प्रयत्न मे लगी
रहती है उन पर नकेल कस दी जायेगी और भारत सशक्त बन कर विकास के
नये इतिहास लिखने की ओर आगे बढ़ जायेगा।

6. क्या देश का धन गरीबों पर वास्तव मे रुपया मे से रुपया ख़र्च होने लग जायेगा
जो अभी तक नेताओ ,अफसरों की तिकड़मबाजी से 85 पैसा जितना बीच में ही
लूट लिया जाता था।

7. क्या मोदीयुग आ जाने पर देश की सँपदा पर चलती आ रही लूट खसोट खत्म
हो जायेगी और अब तक के पापियों के कर्मों का लेखाजोखा बिना लाग -लपेट के
त्वरित गति से होगा।

8. क्या मोदीयुग से मुखौटे सेनापति खडे करने की दुषित प्रणाली अवशिष्ट और
महत्वहीन हो जायेगी और धूर्त नेताओं की फौज सदा -सदा के लिए विसर्जित
हो जायेगी।

9. क्या मोदीयुग आने से आतंकी लोग अनँत नींद मे सो जायेंगे और सैन्य बल
मुस्तैद होकर हिम्मत से खड़ा हो जायेगा। 

देश एक बदलाव की ओर चल पड़ा है जिसका रुकना नामुमकिन है , जैसे -जैसे
मोदी की परीक्षाएँ होती जायेंगी वैसे -वैसे देश की जनता मोदी के पीछे लामबंध
होती जाएँगी ,मोदी अपने विरोधियों के कारण इस अन्तिम पड़ाव मे और मज़बूत
होकर उभरेंगे। जब चर्चा होगी -मोदी युग क्यों आया ,तब सबसे बड़ा काऱण मोदी
का सब दल मिलकर एक स्वर मे मोदी विरोध करना होगा।