शुक्रवार, 30 मई 2014

भारतीय मीडिया में गन्दगी

भारतीय मीडिया में गन्दगी

मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है परन्तु भारत का मीडिया नकारात्मक
हो गया है। मनगढ़ंत खबरे दिखाना ,बहस के नाम पर बतंगड़ खड़े करना,
राजनैतिक आकाओं का प्यादा बनके गुलामी करना,भारतीय प्रजा में
जातिवाद के बीज बोना ,अश्लिलता परोसकर पैसे कमाना,राष्ट्र हित के
सकारात्मक समाचारों से दुरी बनाये रखना जैसे नाना प्रकार के दूषण के
भरी बोझ से दबा है। बड़ा अजीब लगता है जब देश के प्रबुद्ध लोग उनके
बचकाने प्रश्नो का उत्तर देने के लिए घंटों ख़राब करते हैं।
जब किसी बात से दावानल प्रगट करवाना हो,किसी महानुभाव के कहे
गये स्टेटमेंट का खोटा अर्थ निकलना हो, अहम मुद्दो से देश का ध्यान
भटकाना हो  इत्यादि काम बड़ा रस लेकर करता है इसीलिए अच्छे और
काम में विश्वास रखने वाले नेता इनसे अच्छी दुरी बनाये रखते हैं।

कुछ समाचार वाचक जो खुद को तारणहार समझते हैं एक सिरफिरे दल
के अर्द्ध विकसित मानसिकता वाले की शान में इस तरह कसीदे पढ़ रहे
थे जैसे उसे वे देश का मुखिया बना देंगे पर जनता है वो सब जानती है
समाचार देखती जरूर है पर कसौटी पर कस के खुद देखती है और खुद
निर्णय पर पहुँचती है।

मीडिया का काम सुचना पहुँचाना है उसकी व्याख्या करना नहीं परन्तु
भारतीय मीडिया सुचना को तोड़ मरोड़ के पेश करता है और हर चैनल
उस खबर की खाल निकालता है ,उनकी इन करतूतों से देश को क्या मिला ?
किसी पक्ष को बचाना और किसी को जबरदस्ती गिराना यही काम प्रमुखता
से करते रहने में कैसी सार्थकता नजर आती है। मीडिया समाचार का भावार्थ
निकाल कर दर्शकों के दिमाग में भ्रम क्यों पैदा कर क्या हासिल करना चाहता
है ?

देश हित में लगकर सकारात्मक,जस की तस बात पहुँचाने की कोशिश मीडिया
कब करेगा ?केवल आलोचना करने से अच्छा समाचार वाचक नहीं बना जाता
है। किसी पर राग-द्वेष से पूर्वाग्रसित होकर खबर देने से वह लोकतंत्र का स्तम्भ
नहीं बन सकता। सरकारी भोंपू बनने से देश का हित नहीं सधता।

पत्रकारिता का गौरव बना रहे और राष्ट्र का हित सधता रहे इस सूत्र को पकड़
कर ही वह देश का मजबूत स्तम्भ बन सकता है और उसे बनना चाहिये       

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