सोमवार, 30 जून 2014

भक्त और भगवान

भक्त और भगवान 

भक्त -भक्त अपने आराध्य का गुणगान करता है और उसकी शरण लेना चाहता है।
       भक्त अपने आराध्य की कृपा से मनुष्यों के कष्ट दूर करने के प्रयास में लगा
       रहता है। भक्त भगवान को रिझाने में अपना जीवन समर्पण कर देता है। भक्त
       मानव कल्याण के लिए पुरुषार्थ करता है और अपने शक्ति स्त्रोत भगवान से
       प्रार्थना करता है। भक्त भगवान का पूजन -अर्चन करता है और अपने स्वामी
       की सेवा में प्रस्तुत रहता है। मगर मनुष्य अपने लौकिक स्वार्थ को पूरा करने
      के उद्देश्य को लेकर इन दोनों के समीप जाता है और धन या पदार्थ के बल से
      इनकी प्रसन्नता चाहता है और भक्ति मार्ग में यह कृत्य आडम्बर कहलाता है।

      भक्त अपने गुणगान,धन ,सम्मान या किसी पदार्थ को पाकर प्रसन्न नहीं होता
      वह तो उसके आराध्य को प्रसन्न करने के प्रयास करने वाले सच्चे मनुष्य से
      हमेशा खुश रहता है और भगवान से उसके कल्याण की दुआ करता है। भक्त
      भगवान की महिमा का गान सुन कर प्रसन्न हो जाता है ,स्व-प्रशंसा उसे खिन्न
     कर देती है। भक्त की चाह भगवान के चरण वंदन और दर्शन की रहती है वह तो
     अपने स्वामी के बराबर स्थान पर स्वप्न में भी बैठना नहीं चाहता है मगर मनुष्य
    अपनी अभीष्ट की प्राप्ति के लिये उसे भगवान मान लेता है,बहुत स्वार्थी है ना मनुष्य !

    भक्त भगवान की लीला का अनुकरण नहीं करता है यदि उसके कारण से मानव जाति
     का दू:ख दूर हो जाता है तो वह अपने स्वामी की कृपा मानता है मगर इंसान अपने
    लालच के कारण भक्त को महिमा मंडित करने में लग जाता है। क्या कोई भक्त खुद
    को भगवान कहलाने की इच्छा रखता है ?क्या कोई भक्त खुद को भगवान के स्थान
    पर विराजमान होते देखना चाहता है ? तो फिर भक्त की इच्छा क्या रहती है ?क्या
   भक्त खुद की मृत्यु के उपरांत उसकी याद में मंदिर,मूर्ति या प्रतिष्ठा चाहता है ?भक्त
    का जीवन या लौकिक शरीर भगवान को समर्पित होता है उसका रोम -रोम हर क्षण
    अपने आराध्य के नाम स्मरण में बीतता है यह तो मनुष्य का स्वार्थ है जिस कारण
    से भक्त को भगवान मान उसे महिमा मंडित करता है। हमारी आस्था और विश्वास
    का केंद्र  सर्व शक्तिमान भगवान है और भक्त का जीवन चरित्र  अनुकरण के योग्य
    होता है।

भगवान - भगवान को सबसे अधिक प्रिय उसका भक्त लगता है। भगवान अपने ह्रदय
      में भक्त को स्थान देता है। जो मनुष्य भगवान के भक्त की सेवा करता है भगवान
      उस पर प्रसन्न हो जाते हैं। भक्त का पूजन,सत्कार और आदर भगवान खुद चाहते
     हैं। भगवान खुद अपने भक्त की रक्षा में लगे रहते हैं ,उसके कष्टों को दूर करते हैं।
     भगवान तो खुद भक्त की गाथा में तल्लीन रहते हैं परन्तु भगवान यह नहीं कहते
    हैं कि भक्त सम्पूर्ण सत्य स्वरूप है। भगवान तो उसे अपना अंश मानते हैं। भक्त
    भगवान में समा जाये यही भक्ति की पराकाष्ठा है।

मनुष्य भगवान की माया में उलझ कर रह जाता है। उसे अपने स्वार्थ के अनुकूल जो
अच्छा लगता है उसके कीर्तन में लग जाता है उसे भक्त या भगवान से खास लेना -देना
नहीं है। मनुष्य तो ठगना चाहता है चाहे वह भक्त हो या भगवान मगर सच्चाई यह है कि
मनुष्य से ना भक्त ठगा गया है और ना ही भगवान।         
     

शुक्रवार, 27 जून 2014

85 %लीकेज वाला ट्यूब है अर्थ व्यवस्था

85 %लीकेज वाला ट्यूब है अर्थ व्यवस्था 

श्री राजीव गांधी ने कहा था सरकार रुपया खर्च करती है मगर आम जनता को
पंद्रह पैसे ही मिलते है !!बाकी पैसे कहाँ जाते हैं ?इसका उत्तर वो नहीं दे पाये थे।
ट्यूब में एक पंक्चर हो तो गाडी चलती नहीं है फिर 85 %पंक्चर अर्थ व्यवस्था
का कायाकल्प कैसे होगा ?अर्थव्यवस्था में इतने पंक्चर किसने हो जाने दिये ?

    रुपया सरकार की तिजोरी से निकलते ही घिसना चालू हो जाता है। भ्रष्ट
नेता,भ्रष्ट उद्योगपति ,भ्रष्ट नौकरशाही और भ्रष्ट हो रही न्याय व्यवस्था और
इनके दलदल में फँसे हैं 80%भारतीय जो इसलिए ईमानदार हैं क्योंकि उनके
पास तो अर्थ है ही नहीं।

   देश की जन कल्याणकारी योजनायें जनता के लिए तमाशा और उससे जुड़े
भ्रष्ट लोगों के लिए लॉटरी है। देश की नौकरशाही कागजों पर फूल बनाती है और
फाइलों पर चिपका देती है। जनता इसलिए खुश होती है कि ये कागज के फूल
मुरझाते नहीं हैं और बाकी चैनल इसलिए खुश है कि उन्हें असल में खुशबु आती
है।
   हमारी वितरण व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यह है कि उसका recheck का
बटन अँधा ,बहरा और लकवाग्रस्त है। राशन का अनाज बाजार में बिक जाता
है  या बड़ी मिलों में सप्लाई हो जाता है। अनाज सरंक्षण की व्यवस्था हर गरीब
के घर में है परन्तु उसको अनुपयोगी समझ लिया गया है। क्या कोई भी सरकार
रातों रात भंडारण और सरँक्षण व्यवस्था तैयार कर लेगी ?तो फिर उस अनाज
का सड़ना और बाजार के हवाले होना तय है।

  BPL से निचे का बड़ा वर्ग जिसके पास ना गाँव है ,ना समाज ;वह तो फुटपाथ
पर जीता और मर जाता है या जंगलों में गुजर बसर कर जिंदगी घसीट रहा है ,
उसके जीवन में उजाला कैसे होगा क्योंकि सरकार के पास उसके लिए कोई
योजना है ही नहीं। यह वर्ग सरकार की वितरण व्यवस्था के दायरे में कैसे और
कब आयेगा ?

   सरकार की सफलता का पैमाना हम बढ़ते स्टॉक मार्केट,बढ़ते अरबपति और
करोड़पति,बड़े उद्योग धंधों में देखते हैं मगर हम इस चकाचोंध में यह भूल जाते
हैं कि करोड़ों भारतीय बहुत पीछे छूटते जा रहे हैं। सरकार की कोशिश यह होनी
चाहिये कि पीछे छूटने वाले का रुक कर साथ करे और उन्हें साथ लेकर चले ना
कि उन पर रहम की रोटी बरसायें।     

बुधवार, 25 जून 2014

महँगाई से लड़ने का तरीका क्या हो

महँगाई से लड़ने का तरीका क्या हो 

महँगाई नहीं रोक पाने में अभी तक सरकारें असफल क्यों रही है?

हमारा रुपया खर्च कहाँ होता है और उसे कहाँ खर्च करना होगा ,यह व्यवस्था
ही महँगाई को कम करेगी। भारत के लोग उधार के रूपये पर कितने दिन घी
पियेंगे।

हमारे पास पेट्रोल नहीं है और बाहर से खरीद करना पड़ता है फिर भी हम
पेट्रोल की खपत को कम करने के उपाय नहीं ढूंढते हैं.हम पब्लिक ट्रांसपोर्ट
की सेवा को दुरस्त नहीं कर पाते हैं,सड़कों को दुरस्त नहीं कर पाते हैं,यातायात
व्यवस्था को सहज नहीं बना पा रहे हैं, निजी कारों को सब्सिडी भाव से ही
पेट्रोल ,गैस  या डीजल की आपूर्ति कर रहे हैं। जब तक पेट्रोल की बचत के
तरीके नहीं खोजे जायेंगे तब तक हमारे धन का दुरूपयोग नहीं रुकेगा और
महँगाई भी नहीं रुकेगी। क्या पेट्रोल की राशनिंग का वक्त नहीं आ गया है ?
क्या 80 % भारतीयों के पास कार है ,नहीं हैं ना तो 20% रहीशो को सब्सिडी
वाला पेट्रोल,डीजल ,गैस उपलब्ध क्यों ?

आधुनिकीकरण,उदारीकरण ने हमें जेब खाली होने पर भी खर्च करने को
प्रोत्साहित किया। उधार लेकर जलसे करना सिखाया। गरीब के शौक को
बढ़ावा देना सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता है। हम ब्याज पर पैसा
लेकर शौक पुरे करते हैं और ब्याज को चुकाने के लिए कर्ज लेते हैं। हमारे
बजट का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में चला जाता है और इस कारण से
रुपया मूल्य खोता जा रहा है।

बड़े उद्योगो को बढ़ावा दिया मगर पाया क्या ?सिवाय पूँजी के केन्द्रीयकरण के।
आज बहुत से बड़े उद्योगपति देश की बैंकों का ब्याज और मूल रकम कुछ भी नहीं
चूका रहे हैं तो बैंकों का घाटा पूरा कैसे होगा और उस बोझ को कौन ढोयेगा ?
80%गरीब भारतीय ही ना। बड़े उद्योगो को सब्सिडी क्यों ?उन्हें धंधा बढ़ाना है
तो सरकार सहायता दे और 80%वाले अपनी मेहनत से व्यापार करे!! क्या
किसानों,फुटकर व्यापारियों ,अति लघु ,कुटीर और लघु उद्योगो को बिना
ब्याज के कोई बैंक कर्ज देती है। 

हम अच्छी बन्दुक और तोप भी अपने यहाँ नहीं बना पा रहे हैं दूसरे स्वचालित
सामरिक उपकरणों की बात क्या करे। आज हमारा रुपया सामरिक उपकरण
पर खर्च हो रहा है। विकसित देश भारी मुनाफे पर सामरिक उपकरण हमें
बेचते हैं और हम उनकी पुरानी टेक्नोलॉजी को ऊँचे दाम देकर खुश होते हैं और
उनके कबाड़ को खरीद कर पैसा चुकाते हैं ?कब तक चलेगा ऐसा ??

महँगाई का भार गरीब जनता पर ना पड़े इसका ख्याल मोदी सरकार को करना
होगा ?कड़वी दवा उनके लिए जरुरी है जो तीन लाख सालाना से ज्यादा आय कमाते
हैं। 50-100 रुपया दिन के कमाने वाले पर कड़वी दवा इस्तेमाल करने की भूल
करने पर इस सरकार का ५साल बाद क्या हश्र होगा ?जिस तरह काँग्रेस गयी ,यह
भी चली जायेगी।

नेताओं और नौकरशाहों के काले धन पर हाथ डालो,राष्ट्रिय बैंकों का कर्ज ना चुकाने
वाले बड़े मगरमच्छों के जबड़े पकड़ो, कामचोर और रिश्वत खोर अफसरों को घर
बैठाओ ,जमाखोरी वाले से राजनैतिक साँठगाँठ ख़त्म करो। प्रशासनिक जबाबदेही
के मानक तय करो। गरीबी भगाने के लिए कागजी योजनायें आज तक असफल
हुयी है ,समय पुरुषार्थ को पुकार रहा है।    

      

रविवार, 22 जून 2014

आचरण और परिणाम

आचरण और परिणाम  

गाँव के स्कुल में पढाई अच्छी नहीं हो रही थी। गाँव वालों ने अच्छे मुख्य आचार्य 
और अध्यापकों की व्यवस्था के लिए गुहार लगाईं। उनकी शिकायत थी कि स्कुल 
में अध्यापक समय पर नहीं आते हैं और आने पर भी पढ़ाते नहीं हैं। बच्चे अनुशासन 
में नहीं हैं,पढ़ने की जगह नकल करके पास होना चाहते हैं। स्कुल प्रांगण में गंदगी 
रहती है ,पीने के पानी की समुचित व्यवस्था नहीं है। गाँव वालों के पास समस्याओं 
का ढेर था और उनकी माँग थी कि अच्छा आचार्य और अच्छे अध्यापक स्कुल में 
नियुक्त किये जाये। वे सब वर्तमान व्यवस्था से नाखुश थे। सरकार ने उनकी बात 
मान ली और आचार्य और अध्यापकों की नयी भर्ती कर दी। 

        नए आचार्य ने गाँव सभा बुलवाई और उनसे उनकी मांगें पूछी। गाँव वालों 
ने उपरोक्त बातें दोहरा दी। नए आचार्य ने गाँव वालों को आश्वस्त किया कि बदलाव 
लाया जायेगा। 

अगले दिन जो बच्चे स्कुल में समय पर नहीं आये थे उन्हें समय पर आने के लिए 
कहकर उस दिन घर लौटा दिया।जो बच्चे घर लौट आये थे उनके अभिभावकों को 
यह दंड अनुचित लगा। उनका मानना था कि १५--२० मिनिट देर से आने वाले बच्चों 
को क्लास में बैठाना चाहिए था। 

उसके बाद आचार्य ने उन बच्चों को स्कुल से निकाल दिया जो स्कुल यूनिफॉर्म में 
नहीं आये थे। जो बच्चे स्कुल यूनिफॉर्म में नहीं गए थे उन्हें वापिस घर लौटा देख 
उनके अभिभावक चिढ गये और नए आचार्य को कोसने लगे। 

उसके कुछ दिन बाद आचार्य ने उन बच्चों को दण्ड दिया जो स्कुल प्राँगण में गंदगी 
कर रहे थे। गाँव वालों को जब आचार्य द्वारा दण्ड देने की बात का पता चला तो गाँव 
वाले गुस्से में आ गये। 

२-३ दिन बाद अध्यापकों ने जो छात्र होमवर्क नहीं करके लाये थे उनको ३-४ घंटे 
स्कुल में ज्यादा रोक कर रखा और होमवर्क करवाया। बच्चो को देरी से स्कुल से 
छोड़ने की बात पर गाँव के लोग नए आचार्य को बुरा भला कहने लगे। 

त्रैमासिक परीक्षा में स्कुल के अधिकांश बच्चे असफल रहे ,ज्यादातर बच्चों के 
परिणाम पत्र में लाल निशान लगे थे। अपने -अपने लाडलों को नापास देख  
अभिभावक धीरज खो बैठे और पुरानी व्यवस्था को अच्छा ठहराने लगे। वे सब 
मिलकर शिक्षा अधिकारी के पास आचार्य की शिकायत लेकर पहुँच गये। 

शिक्षा अधिकारी ने स्कुल में आकर सारी परिस्थिति का जायजा लिया और 
गाँव वालों से बोले -नए आचार्य और अध्यापक व्यवस्था सुधारने में लगे हैं ,आप 
चिंतित ना हो। अभी जो परिणाम दिखने में आ रहे हैं भले ही ख़राब लग रहे हो 
मगर लगातार चलने वाली प्रक्रिया से अच्छे होते जायेंगे।

गाँव के बुद्धिजीवियों,पंचों ,खबरियों और पुराने स्कुल व्यवस्थापकों को यह 
बात गले नहीं उत्तर रही थी ,वे सभी गलत आचरण को त्यागे बिना अच्छे दिन 
लाये जाने के सपने देख रहे थे और नयी व्यवस्था को कोस रहे थे।      

शनिवार, 21 जून 2014

पर्यावरण


पर्यावरण (व्यंग्य )

सेमिनार हॉल के मुख्य द्वार के पास के कोने में पान की पिचकारी मारी और वह अंदर
दाखिल हो गया। वह व्यक्ति बेसिन की ओर बढ़ा, मुँह में पड़ा पान का कचरा बेसिन
में गिराने के साथ  नल चालू कर कुल्ले करने लगा।  अब वह कुर्सियों की तरफ बढ़
रहा था,उसे आते देख हॉल में चहल पहल बढ़ गई। आयोजक ने उनका फूल हार से
स्वागत किया और उचित स्थान पर बैठाया। कुछ वक्ता पर्यावरण पर बोले उसके बाद
शहर के पर्यावरण को बचाने में विशेष योगदान देने के लिए एक नाम की मंच से
घोषणा की गई। वह व्यक्ति उठा और मंच की ओर बढ़ गया। आयोजक मंडल के
सदस्यों ने उन महाशय के पर्यावरण प्रेम की गाथा प्रस्तुत की, उसे शॉल भेंट की,
प्रशस्ति पत्र दिया और सगुन के तौर पर एक पान का बीड़ा दिया। वह व्यक्ति भेंट में
दिए पान को शान के साथ मुँह में चबाने लगा.सेमीनार की समाप्ति की घोषणा के बाद
उपस्थित लोग हॉल से बाहर जाने लगे। वह व्यक्ति भी हाथ जोड़कर आयोजक मंडल
से विदा लेकर मुख्य द्वार से बाहर निकल रहा था। मुख्यद्वार के पास के कोने की तरफ
बढ़ा,बेफिक्री के साथ दीवार पर पान की पिचकारी मारी और अपनी कार की तरफ
बढ़ गया।         

बुधवार, 18 जून 2014

अपरिग्रह से महँगाई मुक्ति

अपरिग्रह से महँगाई मुक्ति 

बढ़ती हुई महँगाई से गरीब और मध्यम वर्ग तो चिंतित होता ही है परन्तु शासक
दल भी परेशान रहता है। भारत की सरकार एक तरफ पर्याप्त खाद्य भंडार का दावा
करती है फिर भी महंगाई काबू में नहीं आ पाती है,क्यों ?

महँगाई के काबू में ना आने का कारण सरकार के पास वास्तविक आंकड़ों का
अभाव और जनता द्वारा आवश्यक पदार्थों को विकट परिस्थितिके भय से बिना
आवश्यकता के संग्रह करने की प्रवृति है। देश में महँगाई दर और उपभोक्ता सूचकाँक
का आधार वास्तविकता से कोसों दूर है ,हम गरीबी ,महँगाई के मानक वास्तविक आधार
पर तय क्यों नहीं करते हैं?क्या वास्तविकता छिपाने से गरीबी उन्मूलन हुआ है ?हमारे
पास अनाज, दाल,चावल के भण्डार के आँकड़े हो सकते हैं परन्तु किस राज्य को कितनी
मात्रा में और किस समय किस वस्तु की आवश्यकता है,के आँकड़े नहीं है और ना ही
उचित भंडारण और वितरण की व्यवस्था है। भारत में हर साल विपुल मात्रा में धान,
दालें,फल और सब्जियाँ की पैदावार होती है परन्तु उचित भण्डारण व्यवस्था ना तो किसान
के पास है और ना ही सरकार के पास। कंही पर अनाज सड़ रहा है तो किसी जगह फाके
पड़ रहे हैं उचित भंडारण व्यवस्था के अभाव में किसान को पैदावार कम दाम में बेचनी
पड़ती है और सरकार भी भंडारण व्यवस्था के अभाव में हाथ खड़े कर देती है।

जो काम साठ साल में नहीं हुआ या किया गया उसे तुरंत कैसे दुरस्त किया जाये यह एक
यक्ष प्रश्न है जिसका हल खोजने की जिम्मेदारी प्रशासन की है।

जब -जब भी देश में किसी खाद्य सामग्री की कमी होती है तब सबसे पहले उसी वस्तु की
अनावश्यक रूप से जनता द्वारा माँग बढ़ा दी जाती है। जैसे ही जनता किसी वस्तु की
कमी देख अनावश्यक घर में संग्रह करती है तो उस वस्तु से लाभ पाने की आशा में
मौजूदा व्यापारियों के अलावा कई पूँजीपति भी उस वस्तु की जमाखोरी में लग जाते हैं
नतीजा उस वस्तु के भाव अनावश्यक रूप से बढ़ जाते हैं। सरकार के पास जब यह खबर
चींटी की चाल से चलती हुयी पहुँचती है तब वह समीक्षा करने बैठती है और उस वस्तु की
पूर्ति बाजार में बढ़ाने के लिए ऊँचे दाम पर आनन -फानन में आयात करती है ,नतीजा
यह आता है कि देश का धन अनावश्यक रूप से खर्च होता है और नए पुराने जमाखोर
कमा लेते हैं।

अपरिग्रह का सिद्धांत यह सिखाता है कि हमें अनावश्यक रूप से किसी भी वस्तु के संग्रह
से बचना चाहिये क्योंकि वास्तव में उस वस्तु पर उस जरूरतमंद का अधिकार था जिसके
पास ऊँचे भाव में उस वस्तु को क्रय करने की क्षमता नहीं है।  धनी व्यक्ति उस वस्तु को
अनावश्यक रूप से संग्रह करके महँगी और आम आदमी की पहुँच से बाहर करके समस्या
को विकराल बना देता है। हमने देखा जापान में भूकम्प की भयावह आपदा आयी परन्तु
जापानी लोगों ने अपरिग्रह के सिद्धांत का आचरण करके व्यवस्था को सुव्यवस्थित रूप
से चलने दिया,सरकार आपदा निवारण के काम में लगी थी और नागरिक सुव्यवस्था बना
कर सरकार का सहयोग कर रहे थे। हमने अपरिग्रह का सिद्धांत दिया पर आचरण में
नहीं ला रहे हैं यह निकृष्ट आदत ही मुनाफाखोरों को जन्म देती है और महँगाई के रूप को
ज्यादा भयावह बनाती है।                  

रविवार, 15 जून 2014

देशभक्ति का पतन

देशभक्ति का पतन 

किसी भी देश में देशभक्ति का ह्रास तब होता है जब -

देश का शीर्ष नेतृत्व खुद के स्वार्थों को पूरा करने में डूबा रहता है

देश के राजनेता राजधन की लूट खसोट में लगे रहते हैं

देश की नौकरशाही आराम तलब,कामचोर और भ्रष्ट हो जाती है

देश की न्याय व्यवस्था अंधी ,बूढी और लाचार हो जाती है

देश के संचार साधन धनी लोगों की जबान बन कर सच कहने से कतराने
     लगते हैं

देश के शिक्षक ज्ञान के प्रकाश को पैसों में बेचने का धंधा करते हो 

देश की भाषा और संस्कृति को जाहिल समझ फ़ेंक दिया जाता है

देश के इतिहास पुरुषों की गाथाओं को विकृत करके पढ़ाया जाता है

देश में आक्रमणकारी राजाओं के इतिहास को गौरवशाली ठहराया जाता है

देश के नागरिक स्वदेशी उत्पाद के प्रयोग को छोड़ बाहरी देशों के उत्पादों का
    का अंधाधुंध उपयोग करते हैं

देश के नागरिक स्वधर्म को छोड़ पराये धर्म का गुणगान और स्तुति करने में
    गर्व अनुभव करते हो

देश के नागरिक पुरुषार्थ छोड़ राजकीय सहाय की ओर ताकता हो

देश की सीमाओं की रक्षा में खर्च को व्यर्थ का खर्चा समझा जाता हो

देश की नारी विकृतियों का अनुकरण करने में खुद की शान देखती हो

देश का पुरुष नारी के अपमान से खुद का मनोरन्जन करता हो

देश के धर्म गुरु सांसारिक भोग विलास में डूबे हो

देश का युवक निकम्मे काम में व्यस्त हो या बेरोजगार फिरता हो

देश के वयोवृद्ध स्वजनो से अपमानित हो घर त्यागने को मजबूर हो

देश के बालक सद्ग्रन्थों की जगह मायावी चलचित्रों के जाल में फँसा हो

देश में हर कोई सद आचरण से विमुख और भाषण कला में निपुण हो गया हो

         
   

शनिवार, 14 जून 2014

शिक्षा जगत दे सकता है -पर्यावरण और नैतिकता

शिक्षा जगत दे सकता है -पर्यावरण और नैतिकता 

पर्यावरण और नैतिकता से देश की बहुत सी रुग्णताएँ मिट सकती है और इस
अहम काम को पूरा करने के लिये स्कुल और कॉलेज के छात्रों को जोड़ा जाना
जरूरी है। आज देश में चल रही शिक्षा पद्धति में जो विषय प्रैक्टिकल रूप से
सिखाये जाने चाहिए उन्हें केवल रटाया जा रहा है जैसे -नैतिक शिक्षा और
पर्यावरण। क्या इन विषयों पर रट्टा लगाने से छात्र देश को कुछ दे पा रहे हैं ?
यदि नहीं तो फिर सरकारें नींद से जगती क्यों नहीं हैं ? देश का पर्यावरण
विभाग इतनी बड़ी शक्ति का सदुपयोग कब करना सीखेगा ?बाल विकास
मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय यदि सीधे और व्यावहारिक रूप से शिक्षा
जगत से जुड़ते हैं तो देश की तस्वीर दस साल में बदल सकती है।

पर्यावरण को बचाने के लिए किताबों का रट्टा लगाने से छात्र क्या सीखता है
क्यों नहीं हर क्लास वर्ग को किताबों की जगह इस विषय पर प्रेक्टिकल बनाया
जाये ?हर क्लास में बच्चों की टीम बना कर उनसे पेड़ लगवाया और उनका सरंक्षण
करना सिखाया जाये। सरकारें हर वर्ष पेड़ लगाने के नाम पर करोड़ों रूपये खर्च
करती है मगर धरती हरी भरी नहीं होती है,क्यों ?क्योंकि इस काम में केवल खाना पूर्ति
होती है,दिखावा होता है। यदि कक्षा 6 में पढ़ने वाला छात्र एक पौधा लगाता है और कक्षा
बाहरवीं में आने तक उसका सरँक्षण करता है और उसके इस प्रेक्टिकल काम को जाँच
कर अध्यापक इस विषय में अँक देता है तो निश्चित रूप से यह धरती हरी भरी बन
सकती है। गाँव या शहर को स्वच्छ बनाये रखने में इस फोर्स का सदुपयोग किया जा
सकता है। गाँव के तालाब ,सड़के और सार्वजनिक स्थल को इस फोर्स की मदद से
स्वच्छ रखा जा सकता है। स्नातक की परीक्षा में पास होने के बाद हर छात्र को कम
से कम छः महीने के लिए कृषि के क्षेत्र से प्रेक्टिकल रूप से जोड़ा जाए और उसके बाद
डिग्री दी जाए ताकि हर नवयुवक श्रमदान करके कृषि के क्षेत्र से जुड़ सके और उसके
आधुनिकीकरण में अपना सहयोग दे सके। पर्यावरण की सुरक्षा को जन आंदोलन
बनाना है तो स्कुल जीवन से यह शुरुआत होनी चाहिये। कचरे को हटाने और उसका
उपयोग करने से स्वच्छ्ता आयेगी ,बीमारियाँ मिटेंगी और उसके रिसाइक्लिंग से
आर्थिक लाभ भी होगा।

नैतिकता का विषय रट्टा लगाने के पढ़ने का है क्या ?यह आचरण में लाने का विषय
है मगर हम इस विषय पर भी पुस्तकें पढ़ा देते हैं। क्या पुस्तकें पढ़ने मात्र से नैतिकता
आ जायेगी। क्या हमारे देश में नैतिक शिक्षा पढ़ाने वाले नैतिक आचरण का अमल करने
वाले अध्यापक वास्तव में हैं भी या नहीं हैं। नैतिकता का विषय जिसकी देश को ज्यादा
जरुरत है वह भी किताबी हो गया है। बच्चों में नैतिकता के गुण पैदा हो उसके लिए अच्छे
और गुणी शिक्षक की प्रेक्टिकल शिक्षा जरूरी है ,यदि बाल्यकाल से शिक्षक बच्चो में
सुसंस्कार का सिंचन करता है तो वही पुष्प जब युवा बन कर समाज में आयेगा तो समाज
दुर्गुण मुक्त बनेगा ,बलात्कार ,भ्रष्टाचार,आतंकवाद से मुक्त युवाओं का निर्माण होगा।         

गुरुवार, 5 जून 2014

माहेश्वरी समाज और चुनौतियाँ

माहेश्वरी समाज और चुनौतियाँ 

हर समाज में चुनौतियाँ होती है और उनसे निपटा जाता है। मुझे अपने माहेश्वरी
होने पर गर्व है लेकिन माहेश्वरी समाज की विकराल होती चुनौतियों के सवाल
बने रहने की पीड़ा है। हम महेश नवमी सदियों से मनाते आये हैं लेकिन कोई
संकल्प पूरा नहीं कर पा रहे हैं। कुछ चुनौतियाँ जिनसे पार पाना जरुरी है -

1 पद का मोह -हम नेता बनके अहंकारी और संवेदनहीन होते जा रहे हैं। एक
दिन ऐसा आयेगा जब जिस भी गली में दौ चार माहेश्वरी परिवार रहते होंगे वहां
पर कोई ना कोई नाम से सामाजिक संगठन खड़ा हो जायेगा और पदाधिकारी
मिल जाएंगे। क्या समाज नेतापन से बदला जाता है ?

2 आर्थिक पैमाने से चुने जाते हैं कर्णधार -जिसने भी चार पैसे कमा लिये वह
नेता चुन लिया जाता है चाहे उसमें समाज को चलाने का ज्ञान नहीं भी हो। क्या
आर्थिक मापदण्ड ही नेतृत्व का पैमाना रहेगा या विद्धवता का भी मूल्याँकन
होगा ?

3 पैसे से खरीदा जाता है मताधिकार -जब पैसे से संगठन का ढाँचा बनेगा तो
मताधिकार भी पैसे के टुकड़ो पर बिक जाता है। भारत के नागरिक को मौलिक
अधिकार है अपना वोट करने का मगर बहुत जगह पर माहेश्वरी समाज में वोट
पैसे से बिकता है। एक आदमी ज्यादा पैसे देकर एक से ज्यादा वोट करता है और
बहुत से सामाजिक संगठन तो मेम्बरशिप ही संगठन की इतनी ऊँची करते हैं कि
मध्यम और निम्न आय वाला उस तक पहुंचने की सोच भी नहीं सकता है।

4 गरीब ,मध्यम और सुदृढ़ विभाग में बँटता समाज -समाज का सुदृढ़ वर्ग अपने
को समाज का ठेकेदार मानता है ,मध्यम वर्ग पैसे वाले की हाँ में हाँ ठोकता है और
गरीब वर्ग इन दोनों वर्गो को ठेंगा बता अपने सिद्धांत पर जीता है। यही एक बड़ा
कारण है कि माहेश्वरी समाज छोटे छोटे कबीलों की पँचायत बना हुआ है। सुदृढ़
वर्ग जमीन से ऊपर चलता है और नजरे आकाश की ओर ,यह वर्ग नियम खुद के
लिए नहीं बल्कि निचे के वर्ग के अमल के लिए बनाता है और खुद उन्ही नियमों की
चोर दरवाजे से धज्जियाँ उडाता है इसलिए समाज के नारे केवल नारे ही बने रह
गए हैं जमीनी स्टार पर उनका मूल्य नहीं है।

5. दिखावा और आडंबर - धनिक वर्ग में दिखावा और चकाचौध पर खर्च करने की
फैशन है ,मध्यम वर्ग उसके पीछे घसीटने को उतावला है और गरीब तो मटियामेट
हो रहा है। धनिक वर्ग केवल अपने रुआब की सोच कर खर्च करता है और मध्यम
अपने नाक को रोता है और गरीब रीति रिवाज के पचड़े में फँसा है।

6. व्यसन का प्रभाव -अन्य समाज की तरह माहेश्वरी समाज भी व्यसन में धँसता
जा रहा है ,बहुत से युवा भटकाव की ओर है ,अनेको अधेड़ अतृप्त आकांक्षाओं को पूरा
करने की तिगड़म में। व्यसन चाहे नशे का हो,रुआब का हो ,सामाजिक प्रभाव का हो,
सब पर हावी हो रहा है।

7. सामाजिक अव्यवस्था -पहले दहेज बड़ी समस्या थी अब तलाक,अन्य वर्ण वर्ग में
विवाह,कन्याभ्रूण हत्या ,बुजुर्गों के संम्मान में कमी ,टूटते परिवार ,आत्महत्या जैसी
भयंकर बीमारियां चपेट में लेती जा रही है। रास्ता कोई निकाल नहीं पा रहा है क्योंकि
नेता भाषण कला तक सीमित हैं और श्रोता नदारद।   

समाज की इन चुनौतियों से संघर्ष करने का दायित्व अब युवा वर्ग के जिम्मे है उसे
पुरानी अधकचरी सोच से आगे सोचना होगा। समाज के हर बालिग़ का सहयोग लेकर
नया निर्माण करना होगा। दीप की तरह खुद को खपा देने का हौसला दिखाना होगा।     

रविवार, 1 जून 2014

काँग्रेस "तथा "आप "की हार और मेनेजमेंट अध्याय

"काँग्रेस "तथा "आप "की हार और मेनेजमेंट अध्याय 

2014 के चुनाव परिणाम से आईआईएम ,मेनेजमेन्ट विश्व विद्यालय और
उद्योग जगत की हस्तियाँ सफलता के नये सूत्र ढूंढ रही है। सभी लोग मोदी
और मोदीत्व का विश्लेषण कर रहे हैं मगर व्यावसायिक सफलता के लिए
सूत्र जीत में नहीं विफलता में ढूँढे जाने चाहिये। "कांग्रेस "और "आप "की
बड़ी हार के अध्याय से आधुनिक भारत में सफलता के सूत्र ढूंढे जा सकते
हैं जिससे हम व्यावसायिक विफलता से बच सकते हैं।

लोग क्या चाहते हैं वही दो - "कांग्रेस "और "आप " की हार का पहला कारण
भारत के जन मानस की माँग को नहीं समझ पाना था। लोग महँगाई और
घटते रोजगार से परेशान थे और काँग्रेस मुफ्त में रोटी बाँटने की नीति बाँट
रही थी और आप जनता के हाथों से खुद के लिए रोटी सिकाने का दुःस्वप्न
देख रहा था। सफलता के लिए मजदूरों तथा स्टाफ को लोकलुभावन प्रलोभन
मत दो उनकी योग्यता का छल से व्यवसाय हित मत साधो। कार्यरत
कर्मचारियों को अच्छे भविष्य के लिए वर्तमान में कुशलता से लक्ष्य का पीछा
करने में कार्यरत करो।
अहँकार की जगह विनम्रता - "काँग्रेस "और "आप " अहँकार से लबालब थे। हर
काँग्रेसी अपने को नेता मान रहा था और "आप "का नेतृत्व खुद को तारणहार
मसीहा के रूप में देख रहा था। दोनों के पाँव चलते समय जमीन पर टिकते नहीं
थे। मेनेजमेंट को चाहिये कि वह व्यवसाय की सफलता में कर्मचारियों के मुल्य
को समझे और उन्हें महत्व दे। व्यावसायिक सफलता में खुद को श्रेय देना तथा
कर्मचारियों को नगण्य समझना विफलता का कारण होता है। सफलता के समय
में पैर की ओर गौर करते रहे कहीं जमीन से ऊपर तो नही उठ रहे हैं। सदैव विनम्र
बने।
टीम का नेता चुनें -"कांग्रेस " इस चुनाव में अपना भविष्य के टीम लीडर को चुनने
में विफल रही और "आप "भी विफल रही। जब हम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष
करते हैं तब टीम लीडर जरूर बनाये और टीम लीडर भी ऐसा चुने जो उत्साही हो
और लक्ष्य के पीछे बिना थके दौड़ने वाला हो। काँग्रेस नकारात्मक परिणाम की
अपेक्षा से भयभीत हो बिना लीडर के मैदान में जँग लड़ रही थी और बिना लीडर के
सेना मन चाहे ढँग से नीरस भाव से लड़ रही थी। "आप "तो बिना ताकत के सीमा
से ज्यादा बोझ उठा कर लड़खड़ा रहा था और रेंग भी नहीं पा रहा था। हर व्यवसायी
को चाहिये की संस्था का लक्ष्य निर्धारण करने के बाद हर टीम का टीम लीडर रखे
ताकि उचित परिणाम पाया जा सके।
बेदाग और पारदर्शी आचरण - "काँग्रेस के पास बेदाग और पारदर्शी आचरण वाली
नीति नहीं थी तो "आप "के पास अनुभव हीनता और अस्पष्ट नीति थी। "आप" खुद को
भगवान और बाकी सभी को बेवकूफ कह रही थी नतीजा यह रहा की खुद बेवकूफ
बन गहरे कुएँ में गिर पड़ी और काँग्रेस ना तो खुद को बेदाग और पारदर्शी बता पायी
जिसका परिणाम कमर तोड़ रहा। सफल व्यवसायी को चाहिए कि अपने प्रतिस्पर्धी
की आलोचना के बजाय खुद के प्रोडक्ट की सफलता के प्रयास पर ध्यान दे। अपने
प्रोडक्ट में नवीनता और मौलिकता दे उसे बेदाग रखे।
व्यवस्थित प्रचार - "कांग्रेस "प्रचार के पुराने औजार लेकर लड़ती रही और असफल रही
"आप "खुद के प्रोडक्ट को सर्वश्रेष्ठ तथा मार्किट में उपलब्ध प्रोडक्ट को घटिया साबित
करती रही और खुद घटिया बन गयी। मेनेजमेंट को चाहिये की प्रोडक्ट का प्रचार अच्छे
ढ़ंग से करे क्योंकि जनता प्रोडक्ट का इस्तेमाल बाद में करती है पहले प्रोडक्ट के प्रचार
के बारे में सुचना चाहती है। यदि अपने प्रोडक्ट को बेहतर और प्रतिस्पर्धी के प्रोडक्ट को
घटिया बताएँगे तो लोग पहले उस प्रोडक्ट को इस्तेमाल करना चाहेंगे जिसे हम घटिया
बता रहे थे  इसलिए बेमतलब का नेगेटीव प्रचार भी प्रतिस्पर्धी का ना करे।
सेल के बाद सर्विस - "आप "और कांग्रेस की नाकामी का बड़ा कारण सेल के बाद सर्विस
ना देना रहा था। दोनों दल सत्ता में आये ,सत्ता भोगी पर सर्विस ना दे पाये। सफल व्यवसायी
को सेल के बाद सर्विस पर ध्यान देना चाहिये वरना जनता उधर चली जाती है जहाँ यह
भरोसा या सेवा बेहतर मिलती हो।

शायरी

शायरी

शायरी की विधा में मेरी लेखनी अधूरी रह सकती है क्योंकि इसमें कुछ
शब्दों में बहुत कुछ कहना होता है ,मेरे जैसे नये लेखक के लिए यह
लेखन मुश्किल राह पर चलने जैसा है फिर भी कोशिश करने से खुद
को नहीं रोक पाया हूँ -

गुजरे हुए कल की महक में कुछ तो भुला हूँ
खुशनुमा पल की तस्वीर में तुझे ही ढूंढता हूँ

हजारो गिले शिकवे लेकर चले थे घर से
मिले उनसे तो बस होँठ मुस्करा रहे थे

लहराती जुल्फों में क्या-कुछ नहीं खोया है 
एक ही दिल था, अब उसका भी ठिकाना नहीं

दर्द किसने किसका जाना कुछ खबर नहीं टीस हो मिठ्ठी तो बीमारी अच्छी लगती है


उनकी आँखों मे बसा है गहरा समन्दर हमने किनारे से देखा और डूबते चले गये



उफनते हुस्न के सागर में तैरना बेमानी है फिसलती घाटियों में डूबा वही तो जिन्दा है



इनके मासूमियत के किस्से की अजब दास्ताँ है

लबो पर मुस्कान रखते हैं दिल पर खँजर चलाते हैं


शरमा कर पलकें झुकाने के अंदाज़ को क्या माने  

इसे शोख अदा समझे या उल्फ़त का इकरार जाने