रविवार, 1 जून 2014

शायरी

शायरी

शायरी की विधा में मेरी लेखनी अधूरी रह सकती है क्योंकि इसमें कुछ
शब्दों में बहुत कुछ कहना होता है ,मेरे जैसे नये लेखक के लिए यह
लेखन मुश्किल राह पर चलने जैसा है फिर भी कोशिश करने से खुद
को नहीं रोक पाया हूँ -

गुजरे हुए कल की महक में कुछ तो भुला हूँ
खुशनुमा पल की तस्वीर में तुझे ही ढूंढता हूँ

हजारो गिले शिकवे लेकर चले थे घर से
मिले उनसे तो बस होँठ मुस्करा रहे थे

लहराती जुल्फों में क्या-कुछ नहीं खोया है 
एक ही दिल था, अब उसका भी ठिकाना नहीं

दर्द किसने किसका जाना कुछ खबर नहीं टीस हो मिठ्ठी तो बीमारी अच्छी लगती है


उनकी आँखों मे बसा है गहरा समन्दर हमने किनारे से देखा और डूबते चले गये



उफनते हुस्न के सागर में तैरना बेमानी है फिसलती घाटियों में डूबा वही तो जिन्दा है



इनके मासूमियत के किस्से की अजब दास्ताँ है

लबो पर मुस्कान रखते हैं दिल पर खँजर चलाते हैं


शरमा कर पलकें झुकाने के अंदाज़ को क्या माने  

इसे शोख अदा समझे या उल्फ़त का इकरार जाने










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