शनिवार, 21 जून 2014

पर्यावरण


पर्यावरण (व्यंग्य )

सेमिनार हॉल के मुख्य द्वार के पास के कोने में पान की पिचकारी मारी और वह अंदर
दाखिल हो गया। वह व्यक्ति बेसिन की ओर बढ़ा, मुँह में पड़ा पान का कचरा बेसिन
में गिराने के साथ  नल चालू कर कुल्ले करने लगा।  अब वह कुर्सियों की तरफ बढ़
रहा था,उसे आते देख हॉल में चहल पहल बढ़ गई। आयोजक ने उनका फूल हार से
स्वागत किया और उचित स्थान पर बैठाया। कुछ वक्ता पर्यावरण पर बोले उसके बाद
शहर के पर्यावरण को बचाने में विशेष योगदान देने के लिए एक नाम की मंच से
घोषणा की गई। वह व्यक्ति उठा और मंच की ओर बढ़ गया। आयोजक मंडल के
सदस्यों ने उन महाशय के पर्यावरण प्रेम की गाथा प्रस्तुत की, उसे शॉल भेंट की,
प्रशस्ति पत्र दिया और सगुन के तौर पर एक पान का बीड़ा दिया। वह व्यक्ति भेंट में
दिए पान को शान के साथ मुँह में चबाने लगा.सेमीनार की समाप्ति की घोषणा के बाद
उपस्थित लोग हॉल से बाहर जाने लगे। वह व्यक्ति भी हाथ जोड़कर आयोजक मंडल
से विदा लेकर मुख्य द्वार से बाहर निकल रहा था। मुख्यद्वार के पास के कोने की तरफ
बढ़ा,बेफिक्री के साथ दीवार पर पान की पिचकारी मारी और अपनी कार की तरफ
बढ़ गया।         

कोई टिप्पणी नहीं: