गुरुवार, 5 जून 2014

माहेश्वरी समाज और चुनौतियाँ

माहेश्वरी समाज और चुनौतियाँ 

हर समाज में चुनौतियाँ होती है और उनसे निपटा जाता है। मुझे अपने माहेश्वरी
होने पर गर्व है लेकिन माहेश्वरी समाज की विकराल होती चुनौतियों के सवाल
बने रहने की पीड़ा है। हम महेश नवमी सदियों से मनाते आये हैं लेकिन कोई
संकल्प पूरा नहीं कर पा रहे हैं। कुछ चुनौतियाँ जिनसे पार पाना जरुरी है -

1 पद का मोह -हम नेता बनके अहंकारी और संवेदनहीन होते जा रहे हैं। एक
दिन ऐसा आयेगा जब जिस भी गली में दौ चार माहेश्वरी परिवार रहते होंगे वहां
पर कोई ना कोई नाम से सामाजिक संगठन खड़ा हो जायेगा और पदाधिकारी
मिल जाएंगे। क्या समाज नेतापन से बदला जाता है ?

2 आर्थिक पैमाने से चुने जाते हैं कर्णधार -जिसने भी चार पैसे कमा लिये वह
नेता चुन लिया जाता है चाहे उसमें समाज को चलाने का ज्ञान नहीं भी हो। क्या
आर्थिक मापदण्ड ही नेतृत्व का पैमाना रहेगा या विद्धवता का भी मूल्याँकन
होगा ?

3 पैसे से खरीदा जाता है मताधिकार -जब पैसे से संगठन का ढाँचा बनेगा तो
मताधिकार भी पैसे के टुकड़ो पर बिक जाता है। भारत के नागरिक को मौलिक
अधिकार है अपना वोट करने का मगर बहुत जगह पर माहेश्वरी समाज में वोट
पैसे से बिकता है। एक आदमी ज्यादा पैसे देकर एक से ज्यादा वोट करता है और
बहुत से सामाजिक संगठन तो मेम्बरशिप ही संगठन की इतनी ऊँची करते हैं कि
मध्यम और निम्न आय वाला उस तक पहुंचने की सोच भी नहीं सकता है।

4 गरीब ,मध्यम और सुदृढ़ विभाग में बँटता समाज -समाज का सुदृढ़ वर्ग अपने
को समाज का ठेकेदार मानता है ,मध्यम वर्ग पैसे वाले की हाँ में हाँ ठोकता है और
गरीब वर्ग इन दोनों वर्गो को ठेंगा बता अपने सिद्धांत पर जीता है। यही एक बड़ा
कारण है कि माहेश्वरी समाज छोटे छोटे कबीलों की पँचायत बना हुआ है। सुदृढ़
वर्ग जमीन से ऊपर चलता है और नजरे आकाश की ओर ,यह वर्ग नियम खुद के
लिए नहीं बल्कि निचे के वर्ग के अमल के लिए बनाता है और खुद उन्ही नियमों की
चोर दरवाजे से धज्जियाँ उडाता है इसलिए समाज के नारे केवल नारे ही बने रह
गए हैं जमीनी स्टार पर उनका मूल्य नहीं है।

5. दिखावा और आडंबर - धनिक वर्ग में दिखावा और चकाचौध पर खर्च करने की
फैशन है ,मध्यम वर्ग उसके पीछे घसीटने को उतावला है और गरीब तो मटियामेट
हो रहा है। धनिक वर्ग केवल अपने रुआब की सोच कर खर्च करता है और मध्यम
अपने नाक को रोता है और गरीब रीति रिवाज के पचड़े में फँसा है।

6. व्यसन का प्रभाव -अन्य समाज की तरह माहेश्वरी समाज भी व्यसन में धँसता
जा रहा है ,बहुत से युवा भटकाव की ओर है ,अनेको अधेड़ अतृप्त आकांक्षाओं को पूरा
करने की तिगड़म में। व्यसन चाहे नशे का हो,रुआब का हो ,सामाजिक प्रभाव का हो,
सब पर हावी हो रहा है।

7. सामाजिक अव्यवस्था -पहले दहेज बड़ी समस्या थी अब तलाक,अन्य वर्ण वर्ग में
विवाह,कन्याभ्रूण हत्या ,बुजुर्गों के संम्मान में कमी ,टूटते परिवार ,आत्महत्या जैसी
भयंकर बीमारियां चपेट में लेती जा रही है। रास्ता कोई निकाल नहीं पा रहा है क्योंकि
नेता भाषण कला तक सीमित हैं और श्रोता नदारद।   

समाज की इन चुनौतियों से संघर्ष करने का दायित्व अब युवा वर्ग के जिम्मे है उसे
पुरानी अधकचरी सोच से आगे सोचना होगा। समाज के हर बालिग़ का सहयोग लेकर
नया निर्माण करना होगा। दीप की तरह खुद को खपा देने का हौसला दिखाना होगा।     

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