गुरुवार, 31 जुलाई 2014

.... स्वार्थी मित्र है या हितेषी ?

.... स्वार्थी मित्र है या हितेषी ?

आप जब कमजोर होते हैं तब स्वार्थी मित्र आपसे दूरियाँ बढ़ा लेते हैं और आपको
भूलने का या फिर अनुचित दबाब बढ़ाने का प्रयास करते हैं। अपने को ताकतवर
समझने वाले लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए या आपको नीचा दिखाने के लिए
आपके दुश्मन तथा विरोधी का सहयोग करते रहते हैं लेकिन जब आप ताकतवर
बन उभरते हैं तो स्वार्थी मित्र आपकी वाहवाही में लग जाते हैं,आपके दिए स्लोगन
या आपके द्वारा कही गई सामान्य बात पर भी तालियाँ पीटने लगते हैं। अपनी सीमा
से स्वार्थी लोग आपको इसलिए दूर रखते हैं ताकि उनका स्वार्थ सिद्ध होता रहे।
क्या ऐसे लोग कभी मित्र भी हो सकते हैं ?

ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाये ? हमारे नीति शास्त्र कभी भी ऐसे
तुच्छ लोगों से मित्रता करने की सलाह नहीं देते हैं और ना ही उन पर विश्वास
जताने की सलाह देते हैं जिस तरह शठ के लिए शठ नीति है उसी तरह स्वार्थी लोगों
से खुद का स्वार्थ पूरा करके उन्हेँ बरगलाये रखना अच्छा है। स्वार्थी लोग खुद को
अच्छी तरह से पहचानते हैं वे स्वार्थ पूरा करने के लिए जो मिठ्ठी बात करते हैं
या सहयोग करने का वादा करते हैं वास्तव में उसका मूल्य कौड़ी का होता है। यदि
हम उन चिकनी बातों पर विश्वास करते हैं तो हम ही फिसलते हैं और चोट खाते हैं.

विश्व के डरावने स्वार्थी मित्र जब आपको निमंत्रण देते हैं और आपके पैरों तले लाल
कालीन बिछाते हैं इसका मतलब यह नहीं मानना चाहिए कि ये आपकी सफलता की
कद्र कर रहे हैं। ये लोग अपना स्वार्थ और आर्थिक हित देखने आते हैं और हमें भोन्दु
समझ अपना काम निकालने की फिराक में रहते हैं। जो लोग स्वार्थी मित्र से बढ़िया
सम्बन्ध बनाने में ऊर्जा नष्ट करते हैं वास्तव में अपने सच्चे मित्रों की उस समय
अवहेलना करते हैं क्योंकि हम तब उन्हें सम्मान देने में लगे रहते हैं जिसकी पात्रता
नहीं है और उत्साह अतिरेक में सच्चे मित्रों को खुद से दूर कर लेते हैं।

"सबका साथ और सबका विकास "तो भारतीय दर्शन का  मूलमंत्र रहा है हमारे ग्रन्थ
वसुधैव कुटुम्बकम का मन्त्र हजारों साल से दे रहे हैं मगर स्वार्थी लोग उसकी कद्र
आज तक नहीं कर पाये हैं परन्तु अपना हित साधने के लिए अभी वो इस मन्त्र की
प्रशंसा करते नहीं थक रहे हैं ?क्या हम वास्तविकता को समझ रहे हैं ? हमारे सच्चे
मित्र छोटे हैं तो भी हमारे लिए उत्तम है क्योंकि इतिहास और पुराण गवाह है श्री राम
की विजय में सहयोग करने वाले निषाद,भील,वानर ,काक जैसे सहयोगियों के समर्पित
भाव का।

कोयला जलता हुआ होता है तो भी उसका सम्पर्क हाथ जला सकता है और बुझा हुआ
है तो हाथ काले कर देता है ,स्वार्थी त्याज है। स्वार्थी मित्र को दूर करना है तो मनुष्य को
शांति पूर्वक अपना बहुत बड़ा स्वार्थ पूरा करने की बात रख देनी चाहिए वह उलटे पाँव
खिसक जाता है।    

रविवार, 27 जुलाई 2014

सच में ,जीतना आसान है।

सच में ,जीतना आसान है।

कार्य का परिणाम क्या आना चाहिये इस बात पर गहन चिंतन और विचार विमर्श
तब तक होना चाहिए जब तक उस काम को करना शुरू नहीं किया है। पूर्ण चिंतन
के बाद करने योग्य काम में देरी करना हमारे कमजोर आत्मविश्वास को दर्शाता है।
काम को शुरू नहीं करना हमारे निठल्लेपन को दर्शाता है। हाथ में लिए काम को
भय वश बीच में छोड़ देना हमारी अयोग्यता को दर्शाता है। कार्य के पूरा ना होने
तक हार जीत की परवाह किये बिना पुरे मनोयोग से डटे रहना दैवीय सत्ता को
उचित परिणाम देने के लिए मजबूर करना दर्शाता है। इसलिए वेद कहते हैं कि
देव भी पुरुषार्थ के पीछे चलता है  ………

यदि सही में आप जीत चाहते हैं तो दुनियाँ की कोई ताकत आपको हरा नहीं सकती।
जीत के लिए खुद को पूर्ण रूप से तैयार तो कीजिये, आप ने अपने को हार की जंजीरो
से झकड रखा है!! एक बार आत्म विश्लेषण कीजिये ,खुद को जानिये। अगर आप खुद
को जान जायेंगे तो आप निश्चित रूप से अपने असफल होने के सही कारण को पकड़
पायेंगे। क्या आपने अपने प्रति हीन विचार बना रखे हैं ?क्या आप अपने पर शंका
करते रहते हैं ?क्या आप अपने मन को कार्य शुरू करने से पहले ही नकारात्मक
सन्देश देने लग जाते हैं ?क्या आप अपने मन में भय,चिन्ता,निराशा,असफलता ,
हानि और दुःस्वप्न को स्थान दे चुके हैं ? यदि हाँ तो फिर आप जीत के लिए बने ही
नहीं है। जीत से पहले मन में जीत के ,केवल जीत के विचार लाने पड़ते हैं और यह
काम दूसरा नहीं कर सकता सिर्फ आप ही कर सकते हैं  

आप सफलता के शिखर तक पहुँचना चाहते हैं इसलिए तो उस अनजान मार्ग की ओर
कदम बढ़ा चुके हैं ,मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ है ,इस मार्ग पर आपको जगह -जगह
निश्चित रूप से मार्गदर्शक पट्टिकाएँ मिलेगी जो आपका मार्ग दर्शन करेंगी। मैं चाहूँगा कि
आप उन साइनबोर्ड को पढ़कर वापिस नहीं लौटेंगे और नयी रह चुनते हुये आगे बढ़ते जायेंगे।
मार्ग में लिखे उन साइन बोर्ड पर मोटे अक्षरों में लिखा मिलेगा -"यह रास्ता सफलता की ओर
नहीं जाता " वास्तव में असफलता हमे नए मार्ग की तरफ बढ़ने को प्रोत्साहित करने के लिए
आती है हमारी सही मार्ग दर्शक बनकर,यह हमे हताश करने नहीं आती मगर हम इसे राह का
रोड़ा मानकर खुद के आत्मविश्वास को कमजोर कर लेते है ओर असफलता को नकारात्मक
रूप में लेकर कदम थाम लेते हैं या पीछे मुड़ जाते हैं  ...................     
  

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

जीवन सूत्र

जीवन सूत्र 

जो जीतना चाहता है वह समस्या को सिरे से समझने पर ध्यान केंद्रित कर देता
है और हारने वाला समस्या को नजरअंदाज कर देता है

बेशक, झूठ बोलने से काफी काम बन जाते हैं मगर झूठ गढ़ने, झूठी योजना तैयार
करने, झूठे साक्ष्य बनाने, झूठ को पेश करने और जिंदगी भर हर झूठ पर दी गई
दलील को याद रखने में बहुत ऊर्जा और उम्र (समय) खर्च हो जाती है जबकि सच
बोलने में बहुत कम ऊर्जा और समय लगता है। उम्र छोटी होती है और फैसला स्वयं
को ही करना होता है कि किसको चुने - झूठ या सच  .......

यह सच है कि हम सबके पास अपने स्वर्णिम भविष्य की योजना है लेकिन यह भी
सच है कि हम में से अधिकांश असफल या गुमनाम हो जाते हैं इसका कारण यह है
कि हम अपने लिए अच्छी योजना आज "TODAY"बनाते हैं और उसे कल TOMORROW
से शुरू करना चाहते हैं।

परमात्मा ने जिस मनुष्य को जो कुछ दिया है उसको वह न्यूनतम लगता है तथा
और ज्यादा पाने की याचना करता है,मगर किसी मित्र,परिचित या रिश्तेदार को कुछ
देता है तो मनुष्य उसे बहुत ज्यादा मानता है और ईर्ष्या से सुलगता रहता है। मनुष्य
ने जो कुछ भी अर्जित किया है उसका श्रेय खुद को देता है और जिसे प्राप्त नहीं कर
सका उसका कारण भगवान में ढूंढता है। जो मनुष्य इससे परे है वह पूजनीय है  ....

इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है की एवरेस्ट की चोटी हजारों फीट की
ऊँचाई पर है परन्तु यह भी सच है कि कदम दर कदम चल कर इसके शिखर को
पैरों तले रौंदा जा सकता है। इरादा जब अटूट बन जाता है तो काँटे गुलाब की
मुस्कराहट को रोकने में कामयाब नहीं होते और कीचड़ भी कमल को खिलने से
रोक नहीं सकता।

पँछी अपने घोंसले से सुबह चहचहाता हुआ उड़ान भरता है और शाम को कलरव
करता लौट आता है,उसके लिए कोई भी दिन बुरा नहीं होता क्योंकि उसको अपनी
उड़ान पर भरोसा है ,भयंकर दुष्काल में भी वह जमीन के अन्दर पड़े दाने को खोज
निकालता है और एक तरफ विवेक और बुद्धि से सम्पन्न मनुष्य है जो हर समय
अच्छे वक्त के इन्तजार में बैठा रहता है,प्रतिकुल समय में आर्थिक मंदी का मातम
मनाता हुआ दीन हीन बन कर बैठ जाता है या सरकार के कंधे की सवारी कर वैतरणी
पार करना चाहता है,क्या हम रोना रोते बैठे रहने वालो की कतार में खड़े रहना चाहते
हैं या पुरुषार्थ के पँख लगाकर उड़ना चाहते हैं ?फैसला भगवान ने मनुष्य पर छोड़
रखा है कि उसे क्या मिलना चाहिये और क्या नहीं  ………।

परचर्चा  हर घर में होनी चाहिये और सपरिवार परचर्चा करने की शुभ आदत दैनिक
कार्यक्रम में अवश्य शामिल होनी चाहिये। परचर्चा सुबह या रात में सोने से पहले
हो तो उत्तम है। जब भी हम परचर्चा में शामिल होते हैं तो उसके लाभों से वंचित
रह जाते हैं क्योंकि हम उस समय परचर्चा नहीं करके पर दोष दर्शन कर रहे होते
हैं ,किसी अन्य के अवगुणों की विस्तृत व्याख्या कर रहे होते हैं या ईर्ष्या ,द्वेष से
किसी को नीचा दिखाने के तर्क दे रहे होते हैं। यदि हम परचर्चा का सकुटुम्ब ,
सामूहिक रूप से अमृत पान करना चाहते हैं तो हमे मामूली सा बदलाव करना है।
सार्थक परचर्चा के लिए नजरिया बदलना है। किसी के दोष दर्शन की जगह गुण
दर्शन करना है।गुण दर्शन अगर परचर्चा में होगा तो हम सकारात्मक ऊर्जा से जुड़
जायेंगे ,हमारे में आत्म विश्वास बढ़ेगा ,हमारा उत्साह हिलोरे लेने लगेगा ,हम उस
समय श्रेष्ठ करने को प्रेरित रहेंगे। गुण  दर्शन की परचर्चा ही सत्संग है और दोष
दर्शन की परचर्चा कुसंग है।



जो हमारे होते हैं वे हमसे क्या चाहते हैं ? कोई बहुमूल्य भेंट ,रुपया ,सम्पति,जमीन
जायदाद !! शायद इनमें से कुछ भी नहीं। हमारे अपने हमसे वह चीज चाहते हैं जो
बाजार से मूल्य देकर नहीं खरीदनी है और वह हम सबके पास विपुल मात्रा में पड़ी
है मगर इसे विडंबना ही कहिये कि हम अपनों को बिना धन खर्च किये जो वस्तु
खुद के पास पड़ी है देने में भरपूर कंजूसी करते हैं। क्या आप जानना चाहेंगे उस वस्तु
के बारे में ?वह चीज है अंतस का प्रेम। आज हम ह्रदय में उमड़ते प्रेम को लुटाना तो
दूर,चिमटी भर भी बाँटना नहीं चाहते। एक बार बूढ़े माँ -बाप को ,पत्नी और बच्चो को ,
भाई और बहनो को ,मित्र और मानवता को निश्छल प्रेम दे कर के देखिये उसके
बदले में आप जो पायेंगे वही तो जीवन का सार है , Index Of Happiness ...?..... प्रेम
में कंजूसी से माँ -बाप की कद्र घट रही है,भाई बहन के रिश्ते कच्चे हो रहे हैं ,मित्रता
व्यावसायिक बन रही है,पत्नी और बच्चे किसी और में खुशियाँ ढूँढ़ते हैं,मानवता क्रूरता
में तब्दील हो रही है।  जब भी जिंदगी बोझिल लगे तब प्रेम को लुटाने का प्रयोग कीजिये
आप निश्चित रूप से खुशहाल जिंदगी को पा लेंगे।   

हम विचित्र आडम्बर को लाद कर सुख की खोज के लिए मारे-मारे फिरते हैं। यह
आडम्बर है -अपनों से शिकायत और गैरों से ,बाहर वालों से शिष्ट व्यवहार। कहने का
तात्पर्य यह है कि हम जितनी शिष्टता का ध्यान गैरों के साथ व्यवहार में देते हैं उतनी
शिष्टता और अपनापन अपनों को क्यों नहीं दे पाते हैं ?हम पिता ,माँ ,भाई,बहन,पत्नी ,
बच्चों और निकट के रिश्ते वालों को उचित शिष्टता दिखाने से क्यों चूकते हैं ?हम
प्राय: जानबूझकर भी बेमतलब के अहँकार को जिन्दा रखने के लिए ऐसा करते हैं।
क्या अपनों के मुल्य पर दूसरों के साथ आडम्बर पूर्ण शिष्टता हमें सुख दे पायी है ?
यदि हम अपनों को अपनायेंगे तो दुनियाँ खुद ब खुद आपको अपना लेगी,यही
वास्तविकता है जीवन पथ की  … प्रयोग कीजिये ,सुखद जीवन का यह सूत्र आपको
वह सुख देगा जो जीवन का मकसद है      

सोमवार, 14 जुलाई 2014

सरकार किन समस्याओं से पहले लड़े ?

सरकार किन समस्याओं से पहले लड़े ?

विगत साठ साल के दरमियान हमारे देश में समस्याएँ बढ़ती गयी ,कारण क्या
रहे इस विषय पर खूब विचार जानने को मिलते हैं ,दोषरोपण करने से कोई हल
निकलने वाला नहीं है। अब जब काँग्रेस मुक्त सरकार के हाथ में कमान है तब
आम जनता की आशाएँ बढ़ जाना स्वाभाविक है।
देश की प्रमुख पच्चीस समस्याएँ जिनसे निजात पाना बहुत आवश्यक है और
पाठकों की राय में वे पाँच प्रमुख समस्याएँ जिन्हें मोदी सरकार को प्रमुखता देकर
अपने कार्यकाल में खत्म करने का प्रामाणिक प्रयास करना चाहिए। प्रबुद्ध पाठक
उनका क्रम क्या होना चाहिए,बताये।

1. गरीबी 
2 बेरोज़गारी 
3. भ्रष्टाचार 
4. कर चोरी और काला धन  
5 . ऊर्जा की कमी 
6.  आतंकवाद और सांप्रदायिक दँगे
7. लचर न्याय प्रणाली 
8. कार्य संपादन में देरी /कामचोर नौकरशाही 
9. गलत शिक्षा प्रणाली 
10. प्राकृतिक संसाधनो को दुरूपयोग 
11. पिछड़ी ग्रामीण व्यवस्था
12. परम्परागत कृषि 
13. पिछड़ी तकनीक और ख़राब रिसर्च व्यवस्था 
14. खस्ताहाल स्वास्थ्य सेवाएँ 
15. ख़राब पर्यावरण और अस्वच्छता 
16. महँगाई 
17. पेयजल आपूर्ति समस्या 
18. घटता निर्यात
19. सामरिक ताकत में अनुत्साह 
20.  कुपोषण
21. सड़क और परिवहन समस्या 
22. खाद्य और भंडारण की अव्यवस्था 
23. खस्ताहाल वितरण व्यवस्था 
24. सही सुचना का अभाव 
25. नागरिकों में जागरूकता का अभाव 

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

पंक्चर वाला और बजट

पंक्चर वाला और बजट 

बाईक चलते -चलते डगमगा गयी ,मेने टायर की ओर देखा जो पिचका जा रहा था।
बाईक को घसीटते हुए पंक्चर की दुकान तक लाया और पंक्चर वाले से पंक्चर
बनाने को कहकर वहाँ पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। ट्यूब में दौ -तीन पंक्चर पड़े देख
मेने पंक्चर वाले से कहा -भैया ,पंक्चर बनाना रहने दो तुम ऐसा करो कि जल्दी से
नया ट्यूब डाल दो ,थोड़ी देर में बजट आने वाला है उसे लाइव सुनना है।
       पंक्चर वाले ने नया ट्यूब निकाला और उसमें हवा भर के लीकेज चेक किया
ट्यूब सही था। मेने एक नजर से ट्यूब को देखा और बोला -भैया जल्दी करो ,मुझे
बजट सुनना है।
       पंक्चर वाले ने हाँ में सिर हिलाया और नए ट्यूब में भरी हवा को निकाल दिया
और टायर को चेक करने लगा। टायर चेक करता देख मेने पूछा -भैया ,नया ट्यूब
डलवा रहा हूँ फिर टायर को चेक करके टाइम क्यों बिगाड़ रहे हो ?
    पंक्चर वाला मुस्कराया और टायर चेक करता रहा -एकबार  … दो बार  … तीन
बार  … वह टायर के अंदर हाथ घुमाता जा रहा था। उसे टाइम पास करता देख मैं
अकला गया और बोला -भैया ,चेक हो गया ;अब फिटिंग कर दो ,मुझे बजट सुनना
है   .......
    मेरी बात काटते हुए वह बोला -क्या फर्क पड़ता है साब बजट सुनने या ना सुन
पाने में। हर साल बजट तो नया ही आता है ना फिर यह देश पंक्चर क्यों है ?
   मै उसकी बात का हल खोजने के लिए सोचने लगा ,इतने में वह उठा ,पास पड़ा
एक ड्राइव उठाया और टायर में घुसेड़ कर छोटी सी लौहे की कील को निकाल दिया।
अब उसके चेहरे पर संतुष्टि थी। टायर फीट करते हुए बोला -साब ,क्या सोच रहे हैं ?
इतने साल बजट आते गये और देश पंक्चर ही रहा इसका कारण टायर में दबी
कीले ही तो है। जब तक ये कीले खोज खोज कर नहीं निकाली जायेगी तब नए
ट्यूब से क्या फायदा !
     मुझे लगा यह पंक्चर वाला सही सोच रहा है। नीतियाँ बनती है पर उसका लाभ
व्यवस्था में आड़े आ रही असंख्य भ्रष्ट कीले चाट जाती है।    

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

विदेशी वस्तुओं का मोह : दलदल या प्रगति पथ

विदेशी वस्तुओं का मोह :  दलदल या प्रगति पथ 

जिस देश की ३०% जनता के हाथ में 70%प्रतिशत खरीद शक्ति हो और वो 30%
लोग स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग प्राय :टालते हो तो देश की अर्थ व्यवस्था कैसे
मजबूत बनेगी ? इस देश की 70% प्रतिशत जनता पेट भरने के लिए संघर्ष
करती है और ना ही उसे यह पता है कि वह जो भी चीज खरीद रही है उससे मुनाफा
किसको होता है और जिस पढ़े लिखे वर्ग में यह जानकारी है वह आडम्बर में
रचा बसा है उसे वाही वस्तु ब्रांडेड लगती है जिसे विदेशी कम्पनियाँ बेचती हो
चाहे वह वस्तु खाने -पीने की हो ,पहनने की हो या विलासिता की हो।
            हम यह जानते हैं कि ठेले पर शुद्ध सामग्री से बना समोसा या पराठा
हमारे शरीर को नुकसान नहीं पहुँचाता लेकिन हम हानिकारक पित्ज़ा,बर्गर
खाने में शान समझते हैं। हम यह नहीं सोचते हैं कि रेहड़ी से एक परिवार पलता
है ,छोटी दुकान से एक साधारण परिवार में खुशियाँ आती है जबकि पित्ज़ा बर्गर
बेचने वाली आलिशान रेस्तरा से देश की पूँजी विदेशी हाथों में चली जाती है।
             हम हमारे वेदों में सुझाया नीम बबूल आदि का बना स्वदेशी दन्त मंजन
उपयोग में लाने से कतराते हैं जबकि हानिकारक टूथपेस्ट मुँह में डाल लेते हैं।
पहले छोटे शहरों से लेकर महा नगरो तक नीम और बबूल की टहनियों का ताजा
आरोग्य दायी ब्रश मिलते थे और गरीब ग्रामवासी उन्हें बेच कर अपने परिवार का
पालन पोषण कर लेते थे ,हमने उनको दरकिनार करके बड़ी विदेशी कम्पनियों के
पेस्ट उपयोग में लाने शुरू कर दिये जिसका परिणाम यह हुआ कि हर साल अरबों
रुपया विदेशी कम्पनियों की जेब में चला जाता है।
            हम भारत वासी दूध,लस्सी या निम्बू शिकंजी से अपने दिन की शुरुआत
करते थे ,मेहमानों की आवभगत करते थे तब बीमारियाँ कोसों दूर थी मगर हमने
बड़ी विदेशी कम्पनियों के कुप्रचार में आकर ठन्डे नुकसान दायक पेय पदार्थो का
सेवन करना शुरू किया नतीजा यह हुआ कि हम पैसे देकर केमिकल पीना सीख
गये और स्वास्थ्य और धन खोने लगे,विदेशी कम्पनियाँ खरबो रूपये कमा कर
ले जाने लग गयी।
             विदेशी रेशमी वस्त्रों की होली जलाने वाले हमारे पूर्वज देशप्रेमी थे खादी
भले ही मोटा कपडा थी मगर वे उसे पहन कर और विदेशी चीजों की होली जलाकर
इस देश को आजाद करा चुके थे मगर हम अपने पूर्वजों के भी नहीं रहे,तन को
सुन्दर दिखने की चाह में हम स्वदेशी उत्पाद को भूलते चले गये। आज हाल यह है
कि घरेलु वस्त्र उद्योग मरणासन्न है और विदेशी कपडे की दुकाने चमन है।
                यह देश के लिए जीने का युग है। हम जाग्रत बने और स्वदेशी को
अपनाये। जब हम स्वदेशी को अपनाएंगे तो हमारे उद्योग चल निकलेंगे उनमे अच्छा
उत्पाद बनाने का हौसला आयेगा ,अगर ब्रांड इण्डिया की धाक विश्व में पैदा करनी है
तो स्वदेशी उत्पाद को अपनाना होगा।     

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

… और कंगाल होता गया देश ?

… और कंगाल होता गया देश ?    

एक परिवार का मुखिया अच्छा कमा रहा था। परिवार में सबकी जरूरतें पूरी हो रही थी।
धीरे -धीरेबिन जरुरी आवश्यकताएं भी पैदा होने लगी,परिवार का मुखिया भविष्य में
अच्छा कमा लेने कीआशा में चुपचाप खर्चे बढ़ाता गया ,अब उस घर में अनिवार्य
आवश्यकताओं की जगह विलासिता ने ले ली ,सब सदस्य गुलछर्रे उड़ाने लगे।
संचित धन भी ज्यादा समय तक साथ नहीं दे पाया तबआवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
उधार लेना पड़ा ,लोग आसानी से उधार दे दें इसके लिए दिखावे के खर्चे और बढ़ा लिये ,
देखते ही देखते कर्ज बढता गया। मुखिया अपने परिवार को वास्तविकतानहीं बता पाया
और ना ही कमाई के साधन बढ़ा पाया ,अब उसका समय नए साहूकार से कर्ज पाने के
तरीके ढूढ़ने में बीतने लगा ,काम सारा चौपट होने लगा। परिवार वालों की आवश्यकता
पूर्ति समय पर नहीं होने लगी तो सब उसे ताने देने लगे ,आखिर उसने एक उपाय ढूंढा
जिससे की सारी निष्फलता का ठीकरा उस पर नहीं फूटे। उसने सभी सदस्यों को बुलाया
और अपने बुढ़ापे का वास्ता देकर यह परिवार ज्येष्ठ पुत्र को सँभालने को कहा।
अगले दिन ज्येष्ठ पुत्र काम पर गया एक ही दिन में सभी मांगने वालों का तकादा हुआ।
परिवार की यथास्थिति समझ उसने उसी रात घर के सभी सदस्यों को फरमान सुना
दिया कि सभी अनावश्यक खर्चे अभी से बन्द कर दिए जायेंगे जो पुरुष काम नहीं करेगा
उसका खर्चा वह खुद उठायेगा। उसका यह फरमान सबको गलत लगा और सब मुखिया
के राज की तारीफ करने लगे।
   अगले दिन सभी ने मुखिया को फिर से व्यवस्था सँभालने को कहा ,मुखिया ने हामी भर
दी और सबको पूर्ववत सुविधाएँ देनी शुरू कर दी। कर्ज चुकाने के लिए खेत की जमीन को
अनुपयोगी बताकर बेच दी ,कुछ पैसे ब्याज के चूका दिए और कुछ से विलासिता बढ़ा ली ,
यह खेल वर्षो तक चलता रहा ,बाप दादा की बपोती बिकती रही मगर थोथे खर्चे बंद नही
हुए।
      इसी तरह के  दुष्चक्र में यह देश भी फंसा है।गरीब के नाम पर धन बाँटने की योजना
बनती है और धन लुटेरों की जेब में चला जाता है बस कुछ सिक्के जरूर उछाल दिए जाते
हैं जिसका अहसान वह हर पाँच साल में चुकाता रहा है। विगत साठ सालों में देश की
जनता का दिवाला निकलता गया ,गरीबी रफ़्तार से बढ़ती रही ,गरीब बढ़ते गये और
गरीबी हटाने वाले मालदार और रुतबे वाले बनते गये।
         

सोमवार, 7 जुलाई 2014

क्या देश करवट बदलेगा ?

क्या देश करवट बदलेगा  ?

देश की नयी सरकार का पहला बजट आने वाला है और देश का बजट ही यह
तय करता है कि देश किस दिशा में जाने वाला है।

आज समस्या बढ़ती हुयी महँगाई नहीं है,समस्या है घटता हुआ रोजगार। यदि
बजट रोजगार उत्पन्न करने में सक्षम होता है तो महँगाई समस्या नहीं रहेगी।

ग्रामीण क्षेत्र हमेशा रोजगार से वंचित रहे हैं क्योंकि आज तक गाँवों को सुदृढ़
बनाने का सोचा तक नही गया। गाँवों तक औद्योगिक विकास नहीं पहुँच पाया
और ना ही कृषि को उद्योग का दर्जा मिला ,गाँवों को मिला अकुशल श्रमिक का
काम जैसे -मनरेगा!!!

                             आप कल्पना कीजिये कि भारत की 65 %से ज्यादा प्रजा
गाँवों में बसती है और इतनी बड़ी जनसँख्या को हम उद्योग से जोड़ने में असफल
रहे हैं। इसका कारण अब तक की सरकारों की नकारात्मक सोच है जो इतने
बड़े जनसमूह का उपयोग देश के विकास में करने में नाकाम रही। आज
महँगाई से सबसे ज्यादा कौन प्रभावित है ? गाँव ही ना। बड़ा अजीब समाधान
है खाद्य सुरक्षा जिसे काँग्रेस लायी थी और भाजपा आगे बढ़ा रही है। सोच जब
बूढी हो जाती है तो अजीबोगरीब उपचार और टोटके ढूंढे जाते हैं ,अगर मोदी
सरकार भी गाँवों के विकास को आगे नहीं बढाती है तो देश की नींद अभी टूटने
वाली नहीं है और विकास के सपने सिर्फ सपने और वादे ही रह जाने वाले हैं
क्योंकि गाँवों में जब तक रोजगार नहीं बढ़ेगा तब तक महँगाई के नाग का तांडव
रुकने वाला नहीं है। आम व्यक्ति गरीब इसलिए है कि उसके पास भरपूर काम
और काम की सही दिशा नहीं है। आज सस्ते में अनाज बाँट देने से क्या गाँवों की
बदहाल हालत सुधर जायेगी ?सरकार गरीब के पेट में रोटी पहुँचाने की जुगत में
है ,मगर यह खाद्य सुरक्षा का हल कब तक ? क्या गरीब का पेट भर देने मात्र से
विकास का रास्ता निकल जायेगा ? किसी भी सुराख़ पर पैबंद लगाना आकस्मिक
व्यवस्था हो सकती है मगर दीर्घकालीन व्यवस्था के लिए नव सर्जन जरूरी होता
है।

मोदी सरकार कृषि को उद्योग की तरह सुविधा दे ,व्यवस्था दे ,तकनीक दे ताकि
देश का अन्न भण्डार बढे और निर्यात से आर्थिक सुदृढ़ता आये।

मोदी सरकार लघु उद्योगो को गाँवों में बढ़ाये ,छोटे उद्यमियों को कर और निवेश
में सहायता दे ,गाँवों में बिजली की आपूर्ति और सड़कों का निर्माण  करे ताकि
लघु उद्यमी वहां रोजगार पैदा कर सके।