गुरुवार, 10 जुलाई 2014

विदेशी वस्तुओं का मोह : दलदल या प्रगति पथ

विदेशी वस्तुओं का मोह :  दलदल या प्रगति पथ 

जिस देश की ३०% जनता के हाथ में 70%प्रतिशत खरीद शक्ति हो और वो 30%
लोग स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग प्राय :टालते हो तो देश की अर्थ व्यवस्था कैसे
मजबूत बनेगी ? इस देश की 70% प्रतिशत जनता पेट भरने के लिए संघर्ष
करती है और ना ही उसे यह पता है कि वह जो भी चीज खरीद रही है उससे मुनाफा
किसको होता है और जिस पढ़े लिखे वर्ग में यह जानकारी है वह आडम्बर में
रचा बसा है उसे वाही वस्तु ब्रांडेड लगती है जिसे विदेशी कम्पनियाँ बेचती हो
चाहे वह वस्तु खाने -पीने की हो ,पहनने की हो या विलासिता की हो।
            हम यह जानते हैं कि ठेले पर शुद्ध सामग्री से बना समोसा या पराठा
हमारे शरीर को नुकसान नहीं पहुँचाता लेकिन हम हानिकारक पित्ज़ा,बर्गर
खाने में शान समझते हैं। हम यह नहीं सोचते हैं कि रेहड़ी से एक परिवार पलता
है ,छोटी दुकान से एक साधारण परिवार में खुशियाँ आती है जबकि पित्ज़ा बर्गर
बेचने वाली आलिशान रेस्तरा से देश की पूँजी विदेशी हाथों में चली जाती है।
             हम हमारे वेदों में सुझाया नीम बबूल आदि का बना स्वदेशी दन्त मंजन
उपयोग में लाने से कतराते हैं जबकि हानिकारक टूथपेस्ट मुँह में डाल लेते हैं।
पहले छोटे शहरों से लेकर महा नगरो तक नीम और बबूल की टहनियों का ताजा
आरोग्य दायी ब्रश मिलते थे और गरीब ग्रामवासी उन्हें बेच कर अपने परिवार का
पालन पोषण कर लेते थे ,हमने उनको दरकिनार करके बड़ी विदेशी कम्पनियों के
पेस्ट उपयोग में लाने शुरू कर दिये जिसका परिणाम यह हुआ कि हर साल अरबों
रुपया विदेशी कम्पनियों की जेब में चला जाता है।
            हम भारत वासी दूध,लस्सी या निम्बू शिकंजी से अपने दिन की शुरुआत
करते थे ,मेहमानों की आवभगत करते थे तब बीमारियाँ कोसों दूर थी मगर हमने
बड़ी विदेशी कम्पनियों के कुप्रचार में आकर ठन्डे नुकसान दायक पेय पदार्थो का
सेवन करना शुरू किया नतीजा यह हुआ कि हम पैसे देकर केमिकल पीना सीख
गये और स्वास्थ्य और धन खोने लगे,विदेशी कम्पनियाँ खरबो रूपये कमा कर
ले जाने लग गयी।
             विदेशी रेशमी वस्त्रों की होली जलाने वाले हमारे पूर्वज देशप्रेमी थे खादी
भले ही मोटा कपडा थी मगर वे उसे पहन कर और विदेशी चीजों की होली जलाकर
इस देश को आजाद करा चुके थे मगर हम अपने पूर्वजों के भी नहीं रहे,तन को
सुन्दर दिखने की चाह में हम स्वदेशी उत्पाद को भूलते चले गये। आज हाल यह है
कि घरेलु वस्त्र उद्योग मरणासन्न है और विदेशी कपडे की दुकाने चमन है।
                यह देश के लिए जीने का युग है। हम जाग्रत बने और स्वदेशी को
अपनाये। जब हम स्वदेशी को अपनाएंगे तो हमारे उद्योग चल निकलेंगे उनमे अच्छा
उत्पाद बनाने का हौसला आयेगा ,अगर ब्रांड इण्डिया की धाक विश्व में पैदा करनी है
तो स्वदेशी उत्पाद को अपनाना होगा।     

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