शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

पंक्चर वाला और बजट

पंक्चर वाला और बजट 

बाईक चलते -चलते डगमगा गयी ,मेने टायर की ओर देखा जो पिचका जा रहा था।
बाईक को घसीटते हुए पंक्चर की दुकान तक लाया और पंक्चर वाले से पंक्चर
बनाने को कहकर वहाँ पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। ट्यूब में दौ -तीन पंक्चर पड़े देख
मेने पंक्चर वाले से कहा -भैया ,पंक्चर बनाना रहने दो तुम ऐसा करो कि जल्दी से
नया ट्यूब डाल दो ,थोड़ी देर में बजट आने वाला है उसे लाइव सुनना है।
       पंक्चर वाले ने नया ट्यूब निकाला और उसमें हवा भर के लीकेज चेक किया
ट्यूब सही था। मेने एक नजर से ट्यूब को देखा और बोला -भैया जल्दी करो ,मुझे
बजट सुनना है।
       पंक्चर वाले ने हाँ में सिर हिलाया और नए ट्यूब में भरी हवा को निकाल दिया
और टायर को चेक करने लगा। टायर चेक करता देख मेने पूछा -भैया ,नया ट्यूब
डलवा रहा हूँ फिर टायर को चेक करके टाइम क्यों बिगाड़ रहे हो ?
    पंक्चर वाला मुस्कराया और टायर चेक करता रहा -एकबार  … दो बार  … तीन
बार  … वह टायर के अंदर हाथ घुमाता जा रहा था। उसे टाइम पास करता देख मैं
अकला गया और बोला -भैया ,चेक हो गया ;अब फिटिंग कर दो ,मुझे बजट सुनना
है   .......
    मेरी बात काटते हुए वह बोला -क्या फर्क पड़ता है साब बजट सुनने या ना सुन
पाने में। हर साल बजट तो नया ही आता है ना फिर यह देश पंक्चर क्यों है ?
   मै उसकी बात का हल खोजने के लिए सोचने लगा ,इतने में वह उठा ,पास पड़ा
एक ड्राइव उठाया और टायर में घुसेड़ कर छोटी सी लौहे की कील को निकाल दिया।
अब उसके चेहरे पर संतुष्टि थी। टायर फीट करते हुए बोला -साब ,क्या सोच रहे हैं ?
इतने साल बजट आते गये और देश पंक्चर ही रहा इसका कारण टायर में दबी
कीले ही तो है। जब तक ये कीले खोज खोज कर नहीं निकाली जायेगी तब नए
ट्यूब से क्या फायदा !
     मुझे लगा यह पंक्चर वाला सही सोच रहा है। नीतियाँ बनती है पर उसका लाभ
व्यवस्था में आड़े आ रही असंख्य भ्रष्ट कीले चाट जाती है।    

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