शनिवार, 30 अगस्त 2014

विनम्रता

विनम्रता 

लोहे के तार ने रबर के तार से कहा - तेरे शरीर में जान नहीं है,कितना दुर्बल
शरीर पाया है तुमने। मेरा शरीर देख,मैं लोहे का बना हूँ ,बहुत मजबूत हूँ।

रबर के तार ने कहा -मजबूत होना बुरा नहीं है दोस्त परन्तु मजबूती का
घमण्ड करना बुरा है।
कुछ दिन बाद बारिस आयी। बारिस को देख लोहे के तार को भय लगने लगा
और कुछ ही दिनों में जंग खा गया। लोहे के तार ने रबर के तार से पूछा -तुम
कमजोर होकर भी पानी को कैसे सहन कर लेते हो,जबकि मैं मजबूत होकर
भी टूटने की कगार पर हूँ?

रबर के तार ने कहा -तुम शक्ति के घमण्ड में चूर होकर अकड़ते हुये जीते रहे
और मैं विनम्र होकर जीता रहा। वक्त कब बदल जाता है मालुम नहीं पड़ता
दोस्त,तेरी अकड़ के कारण तू अंतिम साँसे गिन रहा है और मैं विनम्रता के
कारण कमजोर होते हुए भी शान से जी रहा हूँ।      


गुरुवार, 28 अगस्त 2014

क्या हिन्दुओं के पर्व - त्यौहार साजिश का शिकार हो रहे हैं ?



क्या हिन्दुओं के पर्व - त्यौहार साजिश का शिकार हो रहे हैं ?

हिन्दुओं के हर त्यौहार को परम्परागत तरीके से मनाने पर अतिवादी,अंग्रेजी तोते ,
तथाकथित धर्मनिरपेक्ष,बिके हुए पत्रकार आये दिन ध्वनि प्रदुषण फैलाते रहते हैं और
उनके अनुपयोगी,असैद्धांतिक,अव्यावहारिक और सत्यहीन तर्कों पर अज्ञानी हिन्दू
बिना सोचे विचारे समर्थन भी कर देते हैं जैसे -

होली के त्यौहार पर ही अख़बार वाले हिन्दुओं को पानी से होली खेलने के विरुद्ध
उकसाते हैं और सूखी होली खेलने का प्रचार करते हैं,अगर पानी बचाने की इतनी
चिंता इन लोगों को है तो देश को ठण्डा पेय उपलब्ध करने वाली विदेशी कम्पनियों
के खिलाफ क्यों नहीं जाग्रत करते हैं जो प्रतिदिन लाखों लीटर पेयजल नष्ट कर रही
है।

हिन्दुओं के त्यौहार दिवाली पर पटाखे से वायु प्रदूषण फैलने के विज्ञापन ये शातिर
लोग पुरे देश में दिखाते हैं अगर इनको पर्यावरण से इतना ही प्रेम है तो ये लोग बूचड़
-खानों के खिलाफ प्रदर्शन क्यों नहीं करते हैं और उन कारखानों के खिलाफ आवाज
क्यों नहीं उठाते हैं जिनके कारण से देश की नदियां और हवा हर पल प्रदूषित हो रही
है।

हिन्दुओं के त्यौहार गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की मूर्तियॉ का आकार छोटा
करने की और उनको विसर्जन से पानी प्रदुषित होने की बातें होती है मगर अन्य
समुदाय के लोगों के द्वारा उनके त्यौहार पर वायु और पानी प्रदुषण की बात पर ये
लोग खामोश हो जाते हैं।

हिन्दुओं के त्यौहार नवरात्री पर रात्रि के दस बजने के बाद साउंड पर प्रतिबन्ध लगाने
की प्रशासन द्वारा तथाकथित विद्वानों द्वारा पैरवी की जाती है और अन्य समुदायों को
उनके त्यौहार पर सप्ताहों तक रात भर हल्ला मचाने की छूट रहती है।

ये सब क्यों किया जा रहा है ?क्या हिन्दू धर्म को कमजोर करने की साजिश रची
जा रही है ? हिन्दुओं के त्यौहार मनाने के रिवाज और परम्परा पर सवालिया निशान
क्यों लगाये जा रहे हैं ?यह खेल निकृष्ट हिन्दुओं का साथ लेकर कौन खेल रहे हैं और
क्यों ? अपनी परम्परा को जीवित रखिये,परम्परा जीवित रहने से इतिहास नूतन
बना रहता है और इतिहास को समय -समय पर याद करते रहने से संस्कृति और
सभ्यता का गौरव बना रहता है। 













      

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

सफल होना कहाँ मना है

सफल होना कहाँ मना है 


टू -व्हीलर के प्लग पर थोड़ा सा कार्बन आ जाने पर उसके बाकी सभी पार्ट ठीक
होने पर भी स्टार्ट नहीं होता है ठीक इसी तरह से मनुष्य पूर्ण स्वस्थ होने पर भी,
विषय का आवश्यक ज्ञान होने पर भी,जरुरी संसाधन उपलब्ध होने पर भी बहुत
बार असफल हो जाता है? उसकी असफलता का कारण उसके मन पर कार्बन की
हल्की सी परत जम जाना है और वह परत है नकारात्मक सोच  .... नकारात्मक
सोच हमें सफल होने से रोक देती है क्योंकि इसका पहला कुप्रभाव हमारे हौसले
पर पड़ता है। हौसला टूटने से हमारा उत्साह खत्म हो जाता है। उत्साह खत्म होने
से हमारा लक्ष्य बिखर जाता है और लक्ष्य धुँधला होते ही हम असफल हो जाते हैं।

नीची उड़ान भरने वाले पंछी अक्सर मौके की तलाश में घूमते रहते हैं मगर अवसर
उनकी पकड़ से प्राय:दूर ही रहता है जबकि बाज बहुत ऊँचाई पर उड़ता है और अवसर
को मजबूती से दबोच लेता है। यह अंतर है सामान्य और बड़ी सोच में। हम किनारो
पर बैठकर मोती पाना चाहते हैं यानि हम पर्याप्त पुरुषार्थ के बिना वो हासिल करना
चाहते हैं जिसे हासिल करने के लिए ऊँची उड़ान,अवसर की टोह ,सटीक निर्णय क्षमता
और कड़ी मेहनत की जरुरत होती है। लक्ष्य अगर छोटा है तो भी असफलता और बहुत
बड़ा है तो भी असफलता। हमें उतनी ऊँचाई पर उड़ना चाहिए कि वहाँ से लक्ष्य स्पष्ट
दीखता रहे और मौका बनते ही बिना देरी किये दबोचा जा सके।

मजदुर कड़ी मेहनत करता है फिर भी कितना कमाता है सिर्फ पेट भर पाता है और
एक सेठ कम मेहनत करके भी बहुत अर्जन कर लेता है। इस कटु सत्य को लोग
किस्मत या भाग्य कहते हैं जबकि हकीकत में यह सोच,नजरिया या लक्ष्य का
फर्क है। लक्ष्य बहुत छोटा होगा तो कड़ी मेहनत भी सार्थक परिणाम नहीं दे पायेगी
नजरिया यदि संकीर्ण होगा तो बड़ी सोच पनप ही नहीं पायेगी और सोच  केवल
पेट भरने के जुगाड़ तक की होगी तो इससे ज्यादा मिलेगा क्यों ? सोच सकारात्मक
रखिये ,नजरिया स्पष्ट रखिये और लक्ष्य ठीक नाक के सामने रखिये  तब आप
जान जायेंगे की पुरुषार्थ का दूसरा नाम ही किस्मत है  …।

मेंढक और कछुवे में एक समानता यह है कि दोनों जल के जीव हैं मगर इनके स्वभाव
में जो भिन्नता है उनमें भी जीवन सूत्र छिपा है। थोड़ा सा सुहाना मौसम और बारिस
का पानी देख मेंढक जोर -जोर से टर्राने लग जाते हैं और उछलने लगते हैं जबकि कछुआ
गहरे पानी के बीच भी शान्त रहता है इसी प्रकार का स्वभाव मनुष्य का होता है ,जब
थोड़ी सी सफलता प्राप्त कर लेते हैं या थोड़ा सा अनुकूल समय आता है तो खुद को अहँकार
से भर लेते हैं या आडम्बर को पकड़ लेते हैं या अपने को महत्वपूर्ण और दूसरों को हिन
समझने का दिखावा करते हैं और विपरीत परिस्थिति आते ही गुमनामी में खो जाते हैं।
कछुआ पर्याप्त जल में रहकर भी धीर गंभीर बना रहता है और आपत्ति काल में अपनी
समस्त इन्द्रियों को वश में कर आत्म चिंतन करता है और अनुकूल समय ना आने तक
धीरज रखता है।   …। index of happiness . 

किसी भी घटना को तटस्थ भाव से समझना और महसूस करना भी योग या ध्यान का
एक प्रकार है। हम अपनी गलतियों को प्राय :पकड़ नहीं पाते हैं या उनको जैसी है वैसी
देखने का साहस नहीं कर पाते हैं। मनुष्य की आदत है की वह जब भी वह कोई गलती
करता है तब उसे देखने के लिए जिस रंग का काँच (लैंस )उसे पसंद है उसी से देखता है
जिस कारण से उसे अपनी भूल और गलती भी उचित लगती है और जब उसे अन्य की
गलती देखनी हो तो वह अपनी आँखों पर पारदर्शी काँच (लैंस)लगा कर सूक्ष्मता से
अवलोकन करता है। यदि हम इसका उल्टा करके जीने की कला सीख जाये तो सफलता
को शीघ्र पा सकते हैं औरयदि हम तटस्थ भाव से विषय वस्तु या घटना को देखते हैं और
गलत और सही की पहचान कर गलत की वास्तविक आलोचना और सही का सहयोग
करते हैं तो समाज,देश और मानवता का भला कर सकते हैं।  



  

बुधवार, 20 अगस्त 2014

शायरी

शायरी

....  नन्हीं सी कोशिश आपकी खिदमत में शायरी सजाने की 


दिल की बैचेनी का इल्जाम क्यों गैरो पर थोपें 
कमबख्त की झलक से ही धड़कनें बढ़ जाती है

दास्तान ए परवाने बेखुबी समझ रहा हूँ
शमा के जलने से क्यों जान जाती है तेरी

हुश्न के समंदर में कब के डूब चुके थे हम
वो हमें जिन्दा समझते हैं,अजीब वाकया है

जिंदगी उलझती गई उड़ती रेशमी जुल्फों में
छोड़ दी हमने भी जिद्द उलझी को सुलझाने की

ऐ वक्त ,जरा इंतजार कर,यूँ आगे ना बढ़ 
जी भर के जीने दे मोहब्बत के हसीँ लम्हे को 

लज़ीज पकवान भी बेस्वाद क्यों लगता है
क्या किसी रसीले फल का स्वाद चख लिया है

सुलगते हुश्न ने बढ़ा दी सर्द मौसम में तल्खी
लबों से रोक पाने की यह आखिरी कोशिश है

गीत गुनगुनाने के लिए सुखद अहसास चाहिए 
राग की नही जरुरत बस दिल की आवाज चाहिए 

उल्फत के पल को जी भर कर जी लो  
सुना है ,वक्त की रफ़्तार बड़ी तेज होती है 






रविवार, 17 अगस्त 2014

सफलता के लिए गीता अध्ययन करे

सफलता के लिए गीता अध्ययन करे 

श्रीमद भगवत गीता को धार्मिक ग्रन्थ मानकर हम उसे पढ़ते नहीं है जबकि
अन्य विदेशी लेखकों के अपूर्ण ज्ञान की ढेरों किताबें पढ़ लेते हैं। सँस्कृत
साहित्य की घोर उपेक्षा आजादी के बाद हुयी जब देश के ओछे राजनीतिज्ञ
इन शास्त्रों के ज्ञान को केवल हिन्दुओं से जोड़कर देखने लगे जबकि ज्ञान तो
सबका कल्याण करता है पर स्वार्थियों और मूढ़ों को क्या कहे।

संसार का हर मनुष्य सफल होना चाहता है और वह प्रयासरत भी रहता है
परन्तु फिर भी असफल हो जाता है ,क्यों ? इसी प्रश्न का उत्तर श्री कृष्ण गीता
के माध्यम से दे चुके हैं।

कार्य को कैसे शुरू करे 

हम जब भी कोई काम करते हैं तो उसका लक्ष्य जरूर बनाते हैं और उसे प्राप्त
करने का प्रयास भी शुरू करते हैं मगर कुछ दिनों के बाद जब वांछित फल
दिखाई नहीं देता है तो हम विषाद और निराश हो जाते हैं और काम को करने
की गति को कम कर देते है या रोक देते हैं या ध्येय बदल लेते हैं या अन्य लोगों
का अनुसरण करने की कोशिश करते हैं इनका सबका परिणाम शुभ नहीं आता
और अंत में हम पराजय को स्वीकार कर लेते हैं।

  श्री कृष्ण कहते हैं कि हम इस पद्धति को बदल डाले। मनुष्य को अपना लक्ष्य
बहुत सोच समझ कर तय करना चाहिए ,उसका रोडमेप तैयार करे,संभावित
बाधाओं को रेखांकित करे,आवश्यक ज्ञान और उपयोगी सामग्री एकत्रित करे
और उस लक्ष्य को स्थापित कर दें ,लक्ष्य बनाने के बाद लक्ष्य को बदलना
पराजय को वरण करना है या मन में लक्ष्य को पाने में खुद को छोटा समझना
खुद को अयोग्य समझना भी पराजय को स्वीकार करना कहा जायेगा।

हमें लक्ष्य तय करने के बाद अपने मन में संकल्प को मजबूत करना होगा ,यदि
हमारा संकल्प मजबूत होगा ,शंका रहित होगा ,स्पष्ट होगा तो हमारा आत्म विश्वास
मजबुत होता जायेगा। अब हमें लक्ष्य की ओर चलना है और इस मार्ग पर ढेरो
बाधाएं रहेगी। बाधाओं से लड़ने के लिए धीरज चाहिए ,सकारात्मक नजरिया
चाहिये,कर्तव्य को पूरा करने की तत्परता चाहिए अगर हम लक्ष्य की उपेक्षा
कठिनाइयों को देख कर करेंगे तो पराजय और अपयश निश्चित है। श्री कृष्ण
का सन्देश है कि सफलता के मार्ग पर आप हानि और लाभ,जय या पराजय
के बोझ को सिर से उतार कर केवल प्रयास रत रहे ,थोड़ा -थोड़ा ही मगर आगे
बढ़ते जाये ,यहाँ पर आत्महीनता या कुशंका मन में ना लाये। ओलम्पिक दौड़
में सभी मैडल नहीं पाते हैं मगर दौड़ते तो सभी हैं और लक्ष्य को किसी ना किसी
समय में छूते जरूर हैं। अंतिम दौड़वीर को भी हारा हुआ नहीं माने क्योंकि उसने
भी कुछ ज्यादा समय भले ही लिया हो मगर लक्ष्य को छुआ तो है। हमे सफलता
अन्य लोगों के मुकाबले देरी से मिल रही है यह सोच के निराश ना हो बस दौड़
चालू रखे,बंद ना करे ,यह सफलता के लिए पर्याप्त है।

हम प्राय: दौड़ पूरी करके वांछित फल ना पाकर उदास हो जाते हैं और नई दौड़
में भय के कारण भाग नहीं लेते ,यह उदासी ही अकर्म है ,अकर्तव्य है। श्री कृष्ण
यही कहते हैं कि काम को काम की भावना से करो उसको असफलता या सफलता
से तत्काल मत जोड़ो। किसी भी परीक्षा में जब हम असफल हो जाते हैं इसका अर्थ
यह नहीं कि हम अयोग्य हैं ,इसका मतलब यह भी है कि उस परीक्षा के लिए और
अधिक ज्ञान बढाने या मेहनत करने की समय द्वारा माँग है जिसे हमें एकाग्र मन
बुद्धि से पूरा करना है। मन की एकाग्रता ही कार्य कौशल है।कर्म को सावधानी
पूर्वक निरंतर करते रहने से सफलता आती ही है ,शंका का कोई स्थान नहीं है।

श्री कृष्ण कहते हैं कि लक्ष्य के मार्ग पर बढ़ते समय आलस्य ना करे ,स्वामित्व के
दावे के बिना काम करे ,लाभ हानि के पचड़े को छोड़कर काम करें। प्राय:जब भी हम
कोई काम करते हैं तब अहँकार के प्रभाव में आ जाते हैं यह अति आत्म विश्वास
भयावह है ,इससे बचे। सफलता के लिए तीन बातों को छोड़ देना है १. फल की
आसक्ति 2. भय या निराशा 3. क्रोध। इस रोडमेप पर चलकर हम सफल हो सकते
हैं ,बाधाओं से झुंझना सीख सकते हैं ,जीवन रूपी नौका को सहजता से लक्ष्य
तक पहुँचाना सीख सकते हैं।

 
         

शनिवार, 16 अगस्त 2014

सौभाग्य है कि आप इस पछतावे से दूर हैं

सौभाग्य है कि आप इस पछतावे से दूर हैं 

वे गाँव के बुजुर्ग थे शायद अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख पाते हैं। आज की
वर्तमान टेक्नोलॉजी की बिलकुल जानकारी नहीं रखते हैं। उनके पास बैठा मैं
बतिया रहा था। बातों ही बातों में मैने उनसे पूछा -बाबा,क्या आपको अब तक
जी हुयी जिंदगी से संतुष्टि है ?
बाबा बोले -बेटे ,हर मनुष्य भूलों का पुतला है। मैनें भी एक भूल की जिसका
पछतावा है ?
मैनें पूछा-क्या वह बात मुझे बता सकते हैं ?
बाबा बोले -क्यों नहीं,वह बात बताने से मेरा मन भी पश्चाताप करके हल्का हो
जायेगा और कोई उससे सीख भी लेगा।
थोड़ी देर बाद उन्होंने कुछ याद करते हुए कहना शुरू किया -बेटा ,जब मैं दौ
साल का था और ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता था तब मेरे पिता जवान थे
उन्होंने मुझे खड़ा होना सिखाया और जब मैं लड़खड़ाते हुए डग भरना सीखता
था तो उनके मजबूत हाथ मेरी पीठ की तरफ सुरक्षा कवच बन कर तैयार
रहते थे। उनके कारण मैं दौड़ना सीख गया। वो मुझे जब भी मन्दिर ले जाते
थे तब मैं भगवान के दर्शन नहीं कर पता था तब वे अपने कन्धे पर बैठा कर
दर्शन करवा देते थे। जब मैं उनके साथ मेले में जाता था कुछ कदम चल कर
भीड़ देख घबरा जाता था तो वे बिना झिझक के मुझे पुरे मेले में कंधे पर या
गोदी में सवारी कराते थे। मेरे पिता कभी कभार कमीज पहनते थे ,प्राय :
बनियान ही पहनते थे कारण उनके पास आमदनी कम थी मगर मेरे लिए
३-४ कमीज हर साल लाते थे। जब मैं किशोर आयु का हुआ तो उनका प्रयास
रहता था कि मैं अच्छा पढ़ लिख जाऊँ मगर मैं पढता नहीं था केवल स्कुल
जाने का ढोंग रचता था,मेरी असफलता के समय वो मेरा हौसला बढ़ाते और
पढ़ने को प्रोत्साहित करते मगर मैं उन्हें धोखा दे देता। मेरी स्कुल बंद हो
गयी और मैं उनके साथ खेत पर जाने लगा। कुछ साल बाद मेरी शादी कर
दी ,उस समय उन्होंने जितनी पूँजी जमा की थी सब मेरी शादी में खर्च कर दी।

कुछ साल बाद मेरे बच्चे हो गए और मेरे पिता बूढ़े हो गये। अब वो खेत का
काम नहीं कर पाते थे तब मुझे लगता कि सारा काम का भार मुझ पर डाल
अब ये आराम फ़रमाते हैं। उन्हें बैठे देख बहुत बार मैं उन्हें झिड़क देता वो
मेरी कठोरता से उदास हो जाते और कभी कभी शुन्य में ताकने लगते। मेरी
पत्नी को वे अप्रिय लगते थे क्योंकि वे दिन भर खाँसते रहते या उसके गैर-
बर्ताव पर चिल्ला उठते। पत्नी जब उनकी शिकायत मुझसे करती तो मैं उन्हें
खूब भली बुरी सुनाता  .... कहते हुये बुजुर्ग का गला भराने लगा। बूढी आँखों
में आँसू आ गए थे। मैं उनकी ओर ताक रहा था। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद
वो बोले -कुछ साल बाद मेर पिता को आँखों से दिखना बंद हो गया ,मुझे
लगा अब आफत गले पड  गयी है। उनको पाखाने लेकर जाना ,नहलाना
जैसे काम बढ़ गए थे। मेरी पत्नी उनके मरने की राह देखने लगी। उन्हें
दौ समय खाना भी रुखा सुखा दिया जाने लगा मगर वो कभी शिकायत नहीं
करते थे। कुछ महीने बीमार रह कर वो स्वर्ग सिधार गए उस समय मैं
50 साल का हो चूका था। मुझे उनकी मौत पर बहुत कम अफ़सोस और मन
में सुकून ज्यादा था। अब मैं अपनी गृहस्थी में लग गया। मेरे बच्चे पढ़ लिख
गए थे और देखते ही देखते मेरे बाल सफेद हो गए ,हाथ पैर जबाब देने लगे
अब मेरे साथ भी वही होने लगा जो मेने अपने पिता के साथ किया था।
एकाद बार बच्चो और बहु से अच्छा व्यवहार करने को कहा तो लड़के ने जबाब
दिया -आपने कौनसा सेवा का काम अपने बाप के लिए किया। बस तब से
मुझे पछतावा होता है कि काश!मेने माँ -बाप की सेवा और इज्जत की होती
मगर…… अब समय चला गया हाथ से।     

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

हम और हमारा देश

हम और हमारा देश 

हम शिकायत कर्ता बनें ,यह जरूरी भी है परन्तु शिकायत करने से पहले हम अपने
गिरेबान में झाँक कर देखें कि कहीँ सिस्टम की समस्या का एक कारण हम स्वयं
तो नहीं बने हुए हैं।

मतदान करके सरकार चुन कर हम अपने कर्तव्यों से फ़ारिग होते रहे हैं। हम यही
सोचते हैं कि अब सारी समस्याओं पर बैठे -बैठे निराकरण पाना है। घर का एक
मुखिया परिवार को ठीक से चलाने के लिए सब सदस्यों की जरुरत महसूस करता
है वरना घर चलाने में खुद को असहाय महसूस करता है  और हम 125 करोड़ लोगों
का परिवार 550 से कम प्रतिनिधियों पर छोड़ कर अच्छे दिन का सपना पूरा होते
देखना चाहते हैं।

इस गरीब देश के नागरिक गरीब होते हुए भी दान देने में जुटे रहते हैं,यह एक श्रेष्ठ
बात है मगर वह दान सृष्टि कर्ता के नाम पर देने के बाद अनुपयोगी रह जाता है।
जब एक सरकार अपने नागरिकों से कर के रूप में दान माँगती है तब उसे अनुपयोगी
कृत्य समझ हम दूर हट जाते हैं। साल में पचास -सौ रूपये भी हर नागरिक सरकार
को सहर्ष कर्तव्य समझ कर देता है तो छोटे-छोटे समाधान रास्ता बनाते जायेंगे।

विदेशी भाषा सीखना उत्तम बात है क्योंकि उस भाषा के माध्यम से हम सृष्टि के
उस भाग में रहने वाले लोगों के विचार समझते हैं लेकिन हद तो तब होती है जब
यह सब हम राष्ट्र भाषा का मूल्य चूका कर करते हैं,जिस भाषा को देश के ९०%
लोग पूरी तरह से समझते भी नहीं है उनके सामने उस भाषा का प्रयोग हमें कैसे
समृद्ध करेगा ?लेकिन हम विदेशी भाषा को कन्धे पर लाद कर अच्छे समय की
आशा करते हैं।

बड़ा आश्चर्य होता है जब हमारा मीडिया बे सिर पैर के विश्लेषण कर देश के लोगों
का समय नष्ट करता है या मूल्यहीन खबरें दिखाता है। इनका तो धन्धा है यह
समझा जा सकता है मगर इस देश के नेता,विद्धवान और शिक्षित लोग जब इस
प्रकार के घटिया मूल्यहीन,वास्तविकता से परे विश्लेषणों और बहस में भाग लेते
समय नष्ट करते हैं तब आम नागरिक माथा पीटता है।       

आजादी

आजादी 










निरी अहिँसा के बुते तो सपना बन जाती आजादी  
दुश्मन के सर कलम किये उसका नतीजा आजादी 

निशस्त्र खड़े होते रण में तो सपना रहती आजादी
लावा बनके बही जवानी उसका नतीजा आजादी 

भूखे रह कर तप करने से किसने किसको दी आजादी
वीर शहीदों ने जब खेली होली उसका नतीजा आजादी 

आग्रह अनशन करने भर से कभी ना मिलती आजादी
चुन चुन कर दुश्मन को मारा उसका नतीजा आजादी 

शांति मन्त्र जपते रहने से सपना बन जाती आजादी 
इन्कलाब और जय-हिन्द जिसका नतीजा आजादी 

     

रविवार, 10 अगस्त 2014

स्वाधीनता के मायने

स्वाधीनता के  मायने

हमारे पर मुगलों ने शासन किया ,अंग्रेजों ने किया ,लम्बे संघर्ष के बाद देश दासता से मुक्त
हुआ और हम वापिस मानसिकता से गुलाम कर दिये गये।
आजाद होने के बाद देश का नेतृत्व भारतीय नागरिको को भारतीयता की जगह धर्म के
आधार पर देखने का निर्णय किया और देश में विभिन्न धर्मावलम्बी देख एक नई विचार
धारा को रखा जिसे धर्म निरपेक्षता नाम दिया। धर्म निरपेक्षता ने भारतीयता को हासिये
पर धकेल दिया इसका दुष्परिणाम तुष्टिकरण के जहर के रूप में आया और अपने ही देश
में बहुसंख्यक हिन्दुओं को राजनेता सांप्रदायिक परोक्ष रूप में समझने लगे। देश का इतिहास
गलत प्रस्तुत किया गया और पढ़ाया जाने लगा। हम अपने बच्चों को मुग़ल शासनकाल को
महान बता कर पढ़ने को मजबूर करते रहे। क्या जिसने भी हिन्दुस्थान पर आक्रमण किया
वह समय हमारे लिए स्वर्णयुग हुआ ?फिर मुग़ल आक्रमणकारियों को महान पढ़ कर हम
देश का किस रूप में गौरव बढ़ा रहे हैं ,भविष्य में यह हाल रहा तो अंग्रेजों को भी महान
हमारी पीढ़ियों को पास होने के लिए पढ़ना पड़ेगा !!!


भारत को जबसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र माना गया है तबसे सबसे बड़ी क्षति देशप्रेम की भावना और
आपसी सौहार्द की हुई है इसका कारण थी तथाकथित धर्म निरपेक्ष राजनैतिक पार्टियाँ। भारत
की ताकत धर्मनिरपेक्षता ना कभी थी और ना कभी होगी। इस देश की असली ताकत वेद से
आई है जो सर्व धर्म समभाव  है। अब सवाल यह उठता है कि क्या संविधान से धर्म निरपेक्ष
भारत की जगह "सर्व धर्म समभाव "भारत लिखने का समय आ गया है ?यदि सर्व धर्म समभाव
आयेगा तब समान नागरिक अधिकार का उदय होगा और पक्षपात/तुष्टिकरण की राजनीती का
नाश होगा।
आज जब भी समान नागरिक अधिकार और कानून की बात आती है तो लोग धर्म के नाम पर
हायतौबा मचाने लगते हैं। क्या भारत के नागरिक एक ही जुर्म पर अलग अलग सजा पाएंगे ,
धर्म प्रधान है या राष्ट्र ?यह तय करने का समय आ गया है।
व्यंग -अंतरिक्ष में भारत से मानव भेजने की बात आई ,बात राजनेताओं तक पहुंची। राजनेताओं
ने सर्वदलीय मीटिंग रखी और सबने तय किया -अंतरिक्ष में चार हिन्दू,दो मुस्लिम ,एक दलित ,एक
ईसाई ,एक पारसी भेजा जाये जब वैज्ञानिकों के पास यह फैसला गया तो वे सर पकड़ कर रह
गए।