बुधवार, 20 अगस्त 2014

शायरी

शायरी

....  नन्हीं सी कोशिश आपकी खिदमत में शायरी सजाने की 


दिल की बैचेनी का इल्जाम क्यों गैरो पर थोपें 
कमबख्त की झलक से ही धड़कनें बढ़ जाती है

दास्तान ए परवाने बेखुबी समझ रहा हूँ
शमा के जलने से क्यों जान जाती है तेरी

हुश्न के समंदर में कब के डूब चुके थे हम
वो हमें जिन्दा समझते हैं,अजीब वाकया है

जिंदगी उलझती गई उड़ती रेशमी जुल्फों में
छोड़ दी हमने भी जिद्द उलझी को सुलझाने की

ऐ वक्त ,जरा इंतजार कर,यूँ आगे ना बढ़ 
जी भर के जीने दे मोहब्बत के हसीँ लम्हे को 

लज़ीज पकवान भी बेस्वाद क्यों लगता है
क्या किसी रसीले फल का स्वाद चख लिया है

सुलगते हुश्न ने बढ़ा दी सर्द मौसम में तल्खी
लबों से रोक पाने की यह आखिरी कोशिश है

गीत गुनगुनाने के लिए सुखद अहसास चाहिए 
राग की नही जरुरत बस दिल की आवाज चाहिए 

उल्फत के पल को जी भर कर जी लो  
सुना है ,वक्त की रफ़्तार बड़ी तेज होती है 






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