रविवार, 10 अगस्त 2014

स्वाधीनता के मायने

स्वाधीनता के  मायने

हमारे पर मुगलों ने शासन किया ,अंग्रेजों ने किया ,लम्बे संघर्ष के बाद देश दासता से मुक्त
हुआ और हम वापिस मानसिकता से गुलाम कर दिये गये।
आजाद होने के बाद देश का नेतृत्व भारतीय नागरिको को भारतीयता की जगह धर्म के
आधार पर देखने का निर्णय किया और देश में विभिन्न धर्मावलम्बी देख एक नई विचार
धारा को रखा जिसे धर्म निरपेक्षता नाम दिया। धर्म निरपेक्षता ने भारतीयता को हासिये
पर धकेल दिया इसका दुष्परिणाम तुष्टिकरण के जहर के रूप में आया और अपने ही देश
में बहुसंख्यक हिन्दुओं को राजनेता सांप्रदायिक परोक्ष रूप में समझने लगे। देश का इतिहास
गलत प्रस्तुत किया गया और पढ़ाया जाने लगा। हम अपने बच्चों को मुग़ल शासनकाल को
महान बता कर पढ़ने को मजबूर करते रहे। क्या जिसने भी हिन्दुस्थान पर आक्रमण किया
वह समय हमारे लिए स्वर्णयुग हुआ ?फिर मुग़ल आक्रमणकारियों को महान पढ़ कर हम
देश का किस रूप में गौरव बढ़ा रहे हैं ,भविष्य में यह हाल रहा तो अंग्रेजों को भी महान
हमारी पीढ़ियों को पास होने के लिए पढ़ना पड़ेगा !!!


भारत को जबसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र माना गया है तबसे सबसे बड़ी क्षति देशप्रेम की भावना और
आपसी सौहार्द की हुई है इसका कारण थी तथाकथित धर्म निरपेक्ष राजनैतिक पार्टियाँ। भारत
की ताकत धर्मनिरपेक्षता ना कभी थी और ना कभी होगी। इस देश की असली ताकत वेद से
आई है जो सर्व धर्म समभाव  है। अब सवाल यह उठता है कि क्या संविधान से धर्म निरपेक्ष
भारत की जगह "सर्व धर्म समभाव "भारत लिखने का समय आ गया है ?यदि सर्व धर्म समभाव
आयेगा तब समान नागरिक अधिकार का उदय होगा और पक्षपात/तुष्टिकरण की राजनीती का
नाश होगा।
आज जब भी समान नागरिक अधिकार और कानून की बात आती है तो लोग धर्म के नाम पर
हायतौबा मचाने लगते हैं। क्या भारत के नागरिक एक ही जुर्म पर अलग अलग सजा पाएंगे ,
धर्म प्रधान है या राष्ट्र ?यह तय करने का समय आ गया है।
व्यंग -अंतरिक्ष में भारत से मानव भेजने की बात आई ,बात राजनेताओं तक पहुंची। राजनेताओं
ने सर्वदलीय मीटिंग रखी और सबने तय किया -अंतरिक्ष में चार हिन्दू,दो मुस्लिम ,एक दलित ,एक
ईसाई ,एक पारसी भेजा जाये जब वैज्ञानिकों के पास यह फैसला गया तो वे सर पकड़ कर रह
गए। 

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