गुरुवार, 21 अगस्त 2014

सफल होना कहाँ मना है

सफल होना कहाँ मना है 


टू -व्हीलर के प्लग पर थोड़ा सा कार्बन आ जाने पर उसके बाकी सभी पार्ट ठीक
होने पर भी स्टार्ट नहीं होता है ठीक इसी तरह से मनुष्य पूर्ण स्वस्थ होने पर भी,
विषय का आवश्यक ज्ञान होने पर भी,जरुरी संसाधन उपलब्ध होने पर भी बहुत
बार असफल हो जाता है? उसकी असफलता का कारण उसके मन पर कार्बन की
हल्की सी परत जम जाना है और वह परत है नकारात्मक सोच  .... नकारात्मक
सोच हमें सफल होने से रोक देती है क्योंकि इसका पहला कुप्रभाव हमारे हौसले
पर पड़ता है। हौसला टूटने से हमारा उत्साह खत्म हो जाता है। उत्साह खत्म होने
से हमारा लक्ष्य बिखर जाता है और लक्ष्य धुँधला होते ही हम असफल हो जाते हैं।

नीची उड़ान भरने वाले पंछी अक्सर मौके की तलाश में घूमते रहते हैं मगर अवसर
उनकी पकड़ से प्राय:दूर ही रहता है जबकि बाज बहुत ऊँचाई पर उड़ता है और अवसर
को मजबूती से दबोच लेता है। यह अंतर है सामान्य और बड़ी सोच में। हम किनारो
पर बैठकर मोती पाना चाहते हैं यानि हम पर्याप्त पुरुषार्थ के बिना वो हासिल करना
चाहते हैं जिसे हासिल करने के लिए ऊँची उड़ान,अवसर की टोह ,सटीक निर्णय क्षमता
और कड़ी मेहनत की जरुरत होती है। लक्ष्य अगर छोटा है तो भी असफलता और बहुत
बड़ा है तो भी असफलता। हमें उतनी ऊँचाई पर उड़ना चाहिए कि वहाँ से लक्ष्य स्पष्ट
दीखता रहे और मौका बनते ही बिना देरी किये दबोचा जा सके।

मजदुर कड़ी मेहनत करता है फिर भी कितना कमाता है सिर्फ पेट भर पाता है और
एक सेठ कम मेहनत करके भी बहुत अर्जन कर लेता है। इस कटु सत्य को लोग
किस्मत या भाग्य कहते हैं जबकि हकीकत में यह सोच,नजरिया या लक्ष्य का
फर्क है। लक्ष्य बहुत छोटा होगा तो कड़ी मेहनत भी सार्थक परिणाम नहीं दे पायेगी
नजरिया यदि संकीर्ण होगा तो बड़ी सोच पनप ही नहीं पायेगी और सोच  केवल
पेट भरने के जुगाड़ तक की होगी तो इससे ज्यादा मिलेगा क्यों ? सोच सकारात्मक
रखिये ,नजरिया स्पष्ट रखिये और लक्ष्य ठीक नाक के सामने रखिये  तब आप
जान जायेंगे की पुरुषार्थ का दूसरा नाम ही किस्मत है  …।

मेंढक और कछुवे में एक समानता यह है कि दोनों जल के जीव हैं मगर इनके स्वभाव
में जो भिन्नता है उनमें भी जीवन सूत्र छिपा है। थोड़ा सा सुहाना मौसम और बारिस
का पानी देख मेंढक जोर -जोर से टर्राने लग जाते हैं और उछलने लगते हैं जबकि कछुआ
गहरे पानी के बीच भी शान्त रहता है इसी प्रकार का स्वभाव मनुष्य का होता है ,जब
थोड़ी सी सफलता प्राप्त कर लेते हैं या थोड़ा सा अनुकूल समय आता है तो खुद को अहँकार
से भर लेते हैं या आडम्बर को पकड़ लेते हैं या अपने को महत्वपूर्ण और दूसरों को हिन
समझने का दिखावा करते हैं और विपरीत परिस्थिति आते ही गुमनामी में खो जाते हैं।
कछुआ पर्याप्त जल में रहकर भी धीर गंभीर बना रहता है और आपत्ति काल में अपनी
समस्त इन्द्रियों को वश में कर आत्म चिंतन करता है और अनुकूल समय ना आने तक
धीरज रखता है।   …। index of happiness . 

किसी भी घटना को तटस्थ भाव से समझना और महसूस करना भी योग या ध्यान का
एक प्रकार है। हम अपनी गलतियों को प्राय :पकड़ नहीं पाते हैं या उनको जैसी है वैसी
देखने का साहस नहीं कर पाते हैं। मनुष्य की आदत है की वह जब भी वह कोई गलती
करता है तब उसे देखने के लिए जिस रंग का काँच (लैंस )उसे पसंद है उसी से देखता है
जिस कारण से उसे अपनी भूल और गलती भी उचित लगती है और जब उसे अन्य की
गलती देखनी हो तो वह अपनी आँखों पर पारदर्शी काँच (लैंस)लगा कर सूक्ष्मता से
अवलोकन करता है। यदि हम इसका उल्टा करके जीने की कला सीख जाये तो सफलता
को शीघ्र पा सकते हैं औरयदि हम तटस्थ भाव से विषय वस्तु या घटना को देखते हैं और
गलत और सही की पहचान कर गलत की वास्तविक आलोचना और सही का सहयोग
करते हैं तो समाज,देश और मानवता का भला कर सकते हैं।  



  

कोई टिप्पणी नहीं: