शनिवार, 27 सितंबर 2014

पाकिस्तान का रोना

पाकिस्तान का रोना 

पाकिस्तान को रोने की आदत हो चुकी है क्योंकि नासमझ बच्चा जब भी रोता
है तो समझदार लोग उसके हाथ में लॉलीपॉप थमा देते हैं,तब बच्चा समझता
है रो कर के मेने कुछ पाया और समझदार जानते हैं कि उसका लॉलीपॉप चूसना
ही बेहतर है ताकि वे लोग महत्वपूर्ण काम कर सके।

जब समझदार लोग अपने महत्वपूर्ण काम पुरे कर लेते हैं और बच्चा फिर रोने
लगता है तब उसे चाँटा मारकर चुप करा दिया जाता है या फिर गला फाड़ कर
रोने दिया जाता है और बच्चा दोनों ही परिस्थिति में अपनी औकात समझ मुँह
बंद कर लेता है।

पाकिस्तान का सँयुक्त राष्ट में जाकर कश्मीर पर रोना !! कोई ज़माना था जब
इस मातम मनाने के तरीके पर उसे समझदार पुचकारा करते थे मगर अब
उसके रोने हश्र उस हठीले बच्चे जैसा होगा जो चाँटा खा कर चुप होता है या
गला फाड़ कर रोने से गला दर्द करने लगता है और वह मौका पाकर स्वत: ही
रोना बंद कर देता है।

पाकिस्तान का कश्मीर पर रोने का हश्र क्या होगा ?आज विश्व को ताकतवर
भारत के सहयोग की आवश्यकता है खण्डहर हो चुके पाकिस्तान का सहारा
लेकर कोई भी भारत से रिश्ता खट्टा नहीं करेगा।

विश्व जानता है कि भारत अपना मसला खुद सुलझाने का माद्दा रखता है और
इस मसले पर टाँग फँसा कर कौन आफत मोल लेगा,इसलिए अब वो होने वाला
है जो भारत चाहता है। यह है शक्तिशाली भारत की नयी पहचान।   
   

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

निराशा अपराध है

निराशा अपराध है 

हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारी इच्छा के अनुकूल हो। हमारी यही सोच हमारे
में निराशा उत्पन्न करती है और निराशा का परिणाम यह होता है कि हम विराट
होते हुए भी खुद को वामन बना लेते हैं।

हम बहुत कम समय में समय से ज्यादा पाना चाहते हैं,मूल्य से ज्यादा पाने की
प्रवृति हमें उतना भी नहीं दे पाती जितने के वास्तव में हम हक़दार थे। जब हम
इस हकीकत से रूबरू होते हैं तो हम कुंठा और निराशा में डूब जाते हैं।

हम अधकचरी जानकारी और अति आत्मदंभ के कारण बहुत सी जानकारियाँ
छोड़ देते हैं जिनकी वास्तव में जरूरत थी। आधी अधूरी जानकारी के बल पर
हम वो सफलता पाना चाहते हैं जिसके लिए उस विषय की पूर्ण जानकारी
आवश्यक थी ,नतीजन हम असफल होते हैं और निराशा में डूब जाते हैं।

हम दूसरों के गुणों और ज्ञान की प्रशंसा करने से कतराते हैं और अच्छे के
अनुकरण की जगह आलोचना में लग जाते हैं या आत्म प्रशंसा में लग
जाते हैं मगर दुनियाँ हमारा असली मोल तुरंत निकाल लेती है। दुनिया
जब आईना दिखाती है तो हम उस कड़वे सत्य को पचा नहीं पाते और अकेले
हो जाते हैं ,यह अकेलापन मानसिक रुग्णता देता है।

जो पा लिया है उसका उपयोग और उपभोग करने की जगह हम दूसरों पर
निगाह डालते हैं और जो पाया है उसे कमतर मानते हैं तथा दुसरो का अधिक।
यह आदत मन को संतुष्टि नहीं देकर ईर्ष्या की आग में जलाती है जिसका
नतीजा निराशा में बदल जाता है

निराशा के पाप को धोने का सरल उपाय है सोच को सकारात्मक और
व्यावहारिक बनाना। सफल व्यक्ति का पीछा करने की जगह सफलता के
कारण का पीछा करना।



  

दौलत

दौलत 

एक आदमी निराश हताश अवस्था में एक संत के पास पहुँचा और बोला- महात्मा ,
मेरे पर कृपा कीजिये ताकि मैं भी सुखी हो जाऊँ ?

महात्मा ने पूछा -तेरे पास किस चीज की कमी है जिसे पाकर तुम खुश हो सकते हो ?

वह आदमी बोला -महात्मन ,मेरे पास दौलत नहीं है और यही मेरे दुःख का कारण है।

महात्मा ने कहा -तुम झूठ बोल रहे हो। मुझे तो तुम ऐश्वर्यवान और सम्पन्न लग
रहे हो ?

वह आदमी बोला -महाराज यदि मैं सम्पन्न होता तो इस दयनीय हाल में नहीं रहता।

महात्मा बोले -तेरे दयनीय हाल में जीने का कारण या तो तेरी अज्ञानता है या फिर
तेरा हताश मन। अब बता तेरे को कितना धन चाहिए ?

वह बोला -महात्मन ,दौ से बीस लाख तक।

महात्मा बोले -तेरे पास दौ आँखे हैं इसमें से एक आँख दौ लाख में दे दे ?

वह बोला -यह कैसी माँग है एक आँख रहने पर मैं काणा हो जाऊँगा,आँख के बदले
दौ लाख़ नहीं चाहिये।

महात्मा बोले -चल आँख मत दे पर पाँच लाख लेकर दाहिना हाथ दे दे ?

वह बोला -बिना हाथ के मैं अपाहिज हो जाऊँगा और दाहिना हाथ क्या मैं पाँच
लाख के लिए तो अँगुली भी नहीं दूँगा।

महात्मा बोले -ऐसा कर ,दस लाख मैं एक गुर्दा दे दे तू एक गुर्दे से भी जी सकता है।

वह व्यक्ति बोला -एक गुर्दा दस लाख में देकर मैं अधमरा होकर नहीं जीना चाहता।

महात्मा बोले - तू तेरे हर अंग की कीमत बढ़ चढ़ के समझ रहा है फिर मेरे पास
दौलत के लिए क्यों आया ?क्या मेरे झोले में तेरे को दौलत नजर आती है ?

वह व्यक्ति बोला -फिर आप मस्तमौला बन के कैसे जीते हैं ?

महात्मा बोले -मैं अपनी कद्र खुद करता हूँ ,दिन भर के किये कर्तव्य से खुश हूँ और
जो कुछ मिला उसका आनन्द से उपभोग करता हुआ भगवान का कृतज्ञ भाव से
गुणगान करता हूँ। मेरे पास यही दौलत है जो जितनी मात्र में चाहता है मेरे से लेता
जाए।    

सोमवार, 22 सितंबर 2014

कामयाबी

कामयाबी 

तेरी राह में कितने ही रोड़े बिछा ले, ऐ! कामयाबी 
हम वो मुसाफिर हैं जो रोड़े से सीढ़ी बनाना जानते हैं 

नाकामयाबी पे नाकामयाबी सफ़र में मिलती गयी 
कह दिया मेने भी उनसे दिल कामयाबी के हवाले है 

चल हट, यूँ ना डराने की कोशिश कर मायूसी मुझे
मेरे बढ़ते हर कदम से बुलंद इरादों के दीप जलते हैं  

हवाओँ बहती रहो पुरे दमखम से विपरीत दिशा से 
तेरी छाती को चीर कर दौड़ने का मेरा भी इरादा है 

बस आखिरी नाकामयाबी है यह सोच के लड़ता गया 
इस सोच से हौसला मिला और हौसले से कामयाबी 

  



    

रविवार, 14 सितंबर 2014

अपनी भाषा अपनी माटी

अपनी भाषा अपनी माटी

 (हिंदी दिवस पर )

जब तक हम अपनी भाषा और माटी पर गर्व करना नहीं सीखेंगे तब तक बदलाव
कागज के फूल से मिलने वाली खुशबु की तरह झूठा है। जब देश स्वतन्त्र नहीं था
तब इस देश के लोग हिंदी या मातृभाषा का उपयोग करते थे और स्वतंत्रता के बाद
हम फिरंगी भाषा के गुलाम होते गये,आज गाँव से महानगर तक हर कोई अंग्रेजी
का आशिक होता जा रहा है ,आज कहीं भी किसी को अपनी भाषा को छोड़ने का
मलाल नहीं है और जानबूझ कर अनावश्यक होते हुए भी विदेशी भाषा बोलने पर
शर्म नहीं है। हिन्दी की समस्या वह पढ़ा लिखा समाज है जो अंग्रेजी की जी हजुरी
करता रहा है।

पिछले 65 वर्षों में हमारी सरकार ने हिंदी भाषा को कुछ नारे के अलावा क्या दिया।
इस देश के संत्री से मंत्री टूटी फूटी अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस करते हैं जबकि
सहज रूप से सभी को समझ में आने वाली हिंदी बोलने से भी कतराते हैं। देश के
भूतपूर्व प्रधान मंत्री जब सँसद में बोलते थे जो यदा कदा हिंदी में बोलते थे ,कुछ
राजनेता तो वोट लेने के खातिर हिंदी बोलने का दिखावा करते हैं ऐसे में हिंदी का
विकास कैसे हो ?

अंग्रेजी का हिंदी अनुवाद क्लिष्ट हिंदी में जानबूझ कर किया जाने लगा ?सिर्फ
यह जताने के लिए कि अंग्रेजी सरल भाषा है। सरकारी काम काज में अंग्रेजी का
उपयोग हिंदी भाषा की दुर्दशा करता रहा है। आज विश्व में कितने जापानी,चीनी
अमेरिकी हिन्दी भाषा पर प्रभुत्व रखते हैं ?और कितने भारतीय अंग्रेजी भाषा
पर प्रभुत्व रखते हैं ? हर बार देशी अंग्रेजी पंडित फिजूल का तर्क रखते हैं कि
अंग्रेजी के बिना विश्व स्तर पर तरक्की करना असंभव है जबकि चीन जापान
अपनी भाषा में काम करके विश्व को उनके देश की भाषा सीखने की स्थिति बना
चुके हैं। एक अंग्रेज यात्री जब भारत आता है तो हिंदी के काफी शब्द सीख कर
आता है और वह जब किसी  हिन्दुस्तानी से "नमस्कार" के प्रत्युत्तर में "good
morning "सुनता है तो भौंचक्का रह जाता है।

हिंदी के गौरव के लिए देश के साँसद सँसद में हिंदी में अनिवार्य रूप से बोले,
हर साँसद को अपनी मातृभाषा के साथ सहज हिंदी में बोलने का अभ्यास
करना चाहिए,अंग्रेजी बोल कर काम निकालने का रास्ता बंद करना चाहिए।
हमें विश्व की भाषाएँ सीख कर ज्ञान की वृद्धि करनी है परन्तु अपनी भाषा का
अपमान नहीं करना चाहिए। किसी भी विदेशी के साथ उसकी भाषा में बात
करना अच्छी बात है पर अपने ही देश में एक दूसरे से अन्य देश की भाषा में
बात करना एक ओछी हरकत के अलावा विशेष कुछ नहीं है।

हिंदी सप्ताह नहीं ,हिंदी पखवाड़ा नहीं ,365 दिन हिंदी में काम यह लक्ष्य होना
चाहिये। हिन्दुस्थान को समझना है तो हिंदी जानना और उपयोग में लाना
जरुरी है।         

शनिवार, 13 सितंबर 2014

क्या धर्मनिरपेक्षता अब हिंदुत्व की परिभाषा समझ पायेगी ?

क्या धर्मनिरपेक्षता अब हिंदुत्व की परिभाषा समझ पायेगी ?

वर्तमान में कश्मीर को जब प्रकृति का प्रकोप झेलना पड़ा तब विश्व भर के इस्लाम 
और अन्य धर्मों ने ,पुरे भारत में फैली धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक पार्टियों ने ,धर्म के 
नाम पर पक्षपाती खबरे चलाने वाले निकृष्ट पत्रकारों ने हिंदुत्व और राष्ट्रवादी हिंदु
दर्शन की हजारों सालों से चली आ रही जीवन पद्धति को बहुत दिनों तक साँसे 
थामे देखा होगा। "हिन्दू सांप्रदायिक होता है !" यह बात हिन्दू जाती में जन्म 
लेने वाले निकृष्ट टुच्चे नेता और कुछ टको पर खुद को बेच देने वाले निकृष्ट पत्रकार
पिछले कई वर्षो से करते रहे हैं ,काश हिन्दू का हर बेटा सांप्रदायिक होता तो इन  
कपटी दुरात्माओं को मालूम पड़ता कि कश्मीर में कितने लाख लोग पानी में डूब 
कर खत्म हो गये होते,मगर सत्य हमेशा सनातन होता है और कठोर भी। कटु सत्य 
विश्व ने देखा कि हजारों हिन्दू युवा अपनी जान की बाजी लगाकर गैर हिन्दुओं के 
जीवन दीप को बुझने नहीं दे रहे थे,उन्हें जीवन दान दे रहे थे। यह विश्व बंधुत्व का 
भाव केवल हिन्दू धर्म में ही संभव है ,विश्व में एक ओर एक ही धर्म के लोग आपस 
में मर कट रहे हो, उसी विश्व में  हिन्दुस्थान के मस्तिष्क कश्मीर में हिन्दू युवा 
अन्य धर्मावलम्बियों के जीवन को सहेज रहे थे,सुरक्षित बना रहे थे। 

   देश के वर्तमान प्रधान मंत्री को आतँकवाद के घोर विरोधी की जगह उनके विरोधी 
कोमवादी कहते रहे हैं ,उन पर वर्षों से झूठे आरोप विरोधियों ने लगाये मगर हिन्दू 
जीवन ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर विश्वास रखता है। समय ने पलटा खाया और 
झूठे धर्मनिरपेक्ष दल हिन्दुस्थान की राज व्यवस्था से दूर हो गये ,बड़ी हाय तौबा तो 
इन सब झूठे नेताओं ने और पक्षपाती खबर बेचने वालों ने मचायी और देश में भय 
फैलाने की कोशिश की मगर प्रकृति को यह मंजूर कहाँ था ,राष्ट्रवादी हिन्दू के कमान 
सँभालते ही कश्मीर की पीढ़ियों ने नहीं देखी ऐसी विनाशलीला हुयी मगर राष्ट्रवादी 
ने पूरी ताकत से संघर्ष किया और जो उसके नाम से खौफ खाते थे उसके वहम को 
हिंदुत्व के बंधुत्व भाव से खत्म किया। क्या अब भी विश्व इस नेता को सांप्रदायिक 
कहेगा? ओबामा भी हिंदुत्व को फिर से देख ले यह वही हिंदुत्व है जो शिकागो विश्व 
धर्म सम्मेलन में था,वही विश्व बंधुत्व का भाव ,वही मानवता का भाव। 

आज जब हिंदुत्व की बात देश में होती है तो प्रपंची मीडिया के कुछ शातिर कलमुँहे 
इसे सिर्फ जन्म और जाती से जोड़ कर विवाद फैलाते रहते हैं और अन्य मत के लोगों 
को डराने का खोटा प्रयास करते हैं। आज हिन्दुस्थान का हिंदुत्व ही कश्मीर घाटी 
में प्राकृतिक आपदा से लोहा ले रहा है,उनके जीवन का रक्षण कर रहा है और हिंदुत्व 
के कारण ही घाटी पुन: स्वर्ग के समान सुंदर बनेगी क्योंकि हिंदुत्व जाती नहीं जीवन 
पद्धति और सभ्यता का पर्याय है।           

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

सहनशीलता

सहनशीलता 

ठूँठ (सूखी लकड़ी का मोटा तना) पर लकड़हारे ने पहले कुल्हाड़ी से वार किये और
उसके हर अँग के टुकड़े कर दिये ,अभी उसका दर्द खत्म ही नहीं हुआ था कि वह
सुथार के हाथों में पहुँच गया। सुथार ने उसकी छाल को अलग करना शुरू किया
तो वह चिल्लाया और सुथार से बोला -तुम मेरी खाल क्यों उधेड़ रहे हो,मैं तो पहले
से किस्मत का मारा हूँ अभी कुछ समय पहले कुल्हाड़ी से घाव खा कर आया हूँ और
अब तुम रहम करने की जगह मेरे दर्द को बढ़ा रहे हो ?
सुथार बोला -ठूँठ ,घबराओ नहीं ,तुम मेरे योग्य हाथों से सुरक्षित रहोगे यदि किसी
अनाड़ी के हाथों में पड़ गए होते तो कभी के राख बन गए होते।
ठूँठ चुपचाप दर्द सहता हुआ सुथार के हाथों से अपनी छाल उतरवाता रहा। छाल
उतारने के बाद सुथार उस पर रन्दा चलाने लगा। ठूँठ दर्द से बिलबिला उठा और
सुथार से बोला -तुम बहुत निष्ठुर हो पहले मेरी छाल उधेड़ दी और अब रन्दे से
चमड़ी घिस रहे हो ?
सुथार बोला -मैं तुझे निखारना चाहता हूँ। पहले तुम खुरदरे,बेडोल और
कोरे थे कुछ भी गुण नहीं था थोड़ा कष्ट सहना सीखो क्योंकि हर गुणी व्यक्ति और
वस्तु कष्ट सह कर ही विराट बनता है।
ठूँठ चुप हो गया और सुथार उस पर रन्दा चलाता रहा। जब वह काष्ठ चिकना और
सपाट हो गया तब सुथार उसे अलग -अलग प्रकार के औजारों से काट छाँट करके
मूर्ति की शक्ल में बदलने लगा। मूर्ति जब बन के तैयार हो गयी तो उस पर रंग
रोगन किया जाने लगा। मूर्ति खूबसूरत बन गई थी। ठूँठ अपने रूपांतरण को देख
प्रसन्न हो रहा था। मूर्तिबने चुके ठूँठ ने सुथार से पूछा -दुनियाँ अब मुझे किस रूप
में पहचानेगी ?
सुथार ने कहा -दुनियाँ में वस्तु का मुल्य उसकी उपयोगिता से आँका जाता है,अच्छी
सँगत,दुःख और कठिनाइयों को सहने के गुण से ही सर्जन होता है। अयोग्य हाथों में
पड़ने से व्यक्ति अनुपयोगी रह जाते हैं। मेरा काम तरासना था और तेरा कर्तव्य था
दुःख दर्द को सहना। दुनियाँ स्वत:ही मोल लगा देती है और नाम दे देती है।

तभी एक नगर सेठ आया और बोला -भैया इस जगन्नाथ की मूर्ति का क्या मूल्य है?
इसे मुझे दे दो मैं इसे मंदिर में लगवाऊंगा। ठूँठ बनी मूर्ति कृतज्ञता से सुथार को
निहार रही थी।             

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

अलगाववादी क्या अब भी सेना को कहेंगे GO BACK ?

अलगाववादी क्या अब भी सेना को कहेंगे GO BACK ?

हमारे कश्मीर पर आई विपदा से आज सेना झुंझ रही है और इस विपदा में अपने प्राण
न्योछावर करके भी कश्मीरी भाई बहनों का जीवन बचा रही है। कश्मीर की अलगाववादी
ताकतें की जबान से अभी सेना के प्रति GO BACK के शब्द नहीं निकल रहे हैं और
पाकिस्तान फिरस्त ये अलगाववादी ताकते भारत के कश्मीर और पाकिस्तान के हिस्से
के कश्मीर के राहत काम को देख भी रही है। आज पूरा भारत अपने कश्मीर के लिए
तन मन धन से सहयोग कर रहा है ,आज भारतीयों के मन में जातिवाद का जहर
नहीं है सबके मन में बची है तो विपदिग्रस्त भारतीयों की जिंदगी को पटरी पर लाने की
आशा। जो लोग धारा 370 का विरोध करते हैं क्या वो अब भी यही कहेंगे कि कश्मीर को
उसके हाल में मरने दो,नहीं ना। कश्मीर हमारा है और कश्मीरी भी हमारे हैं यह भाव
देश की सरकार में ह्रदय से बह रहा है,मोदी को सांप्रदायिक कहने वाली कांग्रेस और मिडिया
जमात और धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले वोट बैंक वाले नेता चुप हैं। क्या देश के
अल्पसंख्यक इस बात को समझेंगे की कौन पार्टियाँ देश में धर्म के नाम पर सत्ता का सुख
भोगना चाहती है ? क्या हिन्दुओं को सांप्रदायिक कहने वाले चैनल आज सच्चे धार्मिक समभाव
को देख कर अपने पिछले कुकर्मों पर अफ़सोस जाहिर करेंगे कि वे भी जाने अनजाने में
जाती और धर्म के आधार पर मक्कार नेताओं की बातों में आकर भारतीयों को अलग करने
के खेल में शामिल थे।

कश्मीर की जनता आज जो कुछ महसूस कर रही है वह सकारात्मक दृष्टिकोण लम्बे
समय तक बनाये रखें। ये भारतीय जवान आज अपने प्राणों का मोह त्यागकर आपकी
जिन्दगी को बचा रहे हैं ,क्यों ?क्योंकि आप भारतीय हैं। 125 करोड़ भारतीय अपने
कश्मीर को तबाह होते नहीं देखेंगे उसे स्वर्ग बने रहने देंगे और इसके लिए प्रयास भी
करेंगे। क्या कश्मीरी भाई बहन भी भारतीय फौजी भाई की सलामती के लिए भविष्य
में कुछ करेंगे ?हमारे फौजी जवानों का भी परिवार है वे भी किसी के भाई हैं ,पिता हैं ,
पुत्र हैं ,जब पाकिस्तानी आतंकी घाटी में घूम कर उन पर हमला करते हैं तो कश्मीरियों
का फर्ज बनता है उस समय उन आतंकियों को पनाह ना दे.पाकिस्तान जिंदाबाद के
नारे मत लगाये,हिन्दुस्तानी तिरंगे का अपमान ना करे और ना होने दे। अपने देश की
फौज का साथ दे ,उन्हें सही सुचना से अवगत कराते रहे।

कभी कभी विपत्तियाँ भी सौगात लेकर आती है। इस विपति में जो धन हानि हुयी है
उसकी भरपाई हो जायेगी ,यह समय चिंता का नहीं है ,आज सभी भारतीय और विशेष
कर वो अल्पसंख्यक समुदाय जो गुमराह में है प्रण करे कि हम भी भारतीय हैं,भारत
की रक्षा के लिए काम करेंगे, बहुसंख्यक की भावनाओं का आदर करेंगे उनकी बहु -
बेटियों की इज्जत करेंगे।

मोदीजी आपने गुजरात को हर प्राकृतिक आपदा से बचाया और खड़ा किया ,आज
धर्म का तकाजा है आप कश्मीर का नवसृजन करेंगे,आपके पास आज प्रकृति भी
भारतीय एकता की सौगात देने के लिए विपदा के रूप में आई है आप मुकाबला कर
रहे हैं ,जब तक विपति हार नहीं जाती तब तक लड़िये और कश्मीरियों की हर संभव
सहायता कीजिये,शायद नियति आपसे बहुत कुछ करवाना चाहती है जो भारत के
हित में है।          

तेज धार

तेज धार

हम में से अधिकांश व्यक्ति काफी मेहनत करते हैं और मेहनत के अनुपात में कम
फल प्राप्त करते हैं इसका मतलब यह नहीं होता है कि मेहनत करने से ऊर्जा ज्यादा
खत्म होती है और फल थोड़ी मात्रा में मिलता है और हम में से कुछ व्यक्ति कम
मेहनत करते दिखाई देते हैं तो ज्यादा फल की प्राप्ति होती है। जब भी इस विषय पर
वाद प्रतिवाद होता है तो लोग "किस्मत" कह कर मन को तसल्ली दे देते हैं। क्या
आप भी इस बात को किस्मत में खपाना चाहते हैं ? या फिर आगे की कहानी पढ़
कर तय करना चाहेंगे !!

एक दिन एक बूढ़े लकड़हारे ने अपने जवान पुत्र को कुल्हाड़ी देकर जँगल में लकड़ी
काटने को भेजा। युवक कुल्हाड़ी लेकर जंगल में गया और एक मोटे तने के सूखे पेड़
को काटने में लग गया। लड़का कुल्हाड़ी चलाते -चलाते थक गया मगर वह तना
उससे कटा नहीं। अत्यधिक श्रम करने के कारण पूरा शरीर थक कर चूर हो गया था
मगर लकड़ी बटोर नही पाया। आखिर थक हार कर बैठ गया और पिता के आने का
इन्तजार करने लगा। कुछ समय बाद बूढ़ा लकड़हारा जँगल में आया ,उसने देखा
उसका पुत्र थक कर विश्राम कर रहा है।

लकड़हारे ने पूछा -पुत्र,काफी थके हुए लग रहे हो ,लगता है बड़ा परिश्रम किया है।

युवक बोला - मेने परिश्रम तो बहुत किया है ,मोटे तने के ठूँठ को काटने में पूरी
ताकत झोंक दी मगर वह कट नहीं पाया।

लकड़हारे ने कहा -पुत्र,तू कुछ समय तक विश्राम कर ले बाद में काट लेना,तब तक
मैं उस तने को काटने की कोशिश करता हूँ ।

 पुत्र विश्राम करने लगा और बूढ़ा लकड़हारा उस दरमियान कुल्हाड़ी को पत्थर पर
घिसता रहा। कुल्हाड़ी की धार चमकने लगी और काफी तेज हो गयी। लकड़हारे का
पुत्र विश्राम करके पेड़ के पास में आया तो देखा उसके पिता ने अभी तक पेड़ काटने
का प्रयास तक नहीं किया है इतने समय तक बैठे बैठे कुल्हाड़ी को पत्थर पर घिसते
जा रहे हैं।
युवक ने पिता को उलहाना देते कहा -आपने तो मेरी मदद करने की बात कही थी
मगर आपने तो कुछ काम किया ही नहीं। इतना कहकर उस युवक ने पिता के हाथ
से कुल्हाड़ी ले ली और पूरी ताकत से तने पर वार करने लगा,कुछ ही देर में तना
कट गया।

लकड़हारा अपने पुत्र के पास आया और बोला -पुत्र, अब समझ में आ गया होगा कि
मैं तेरे विश्राम के समय खाली नहीं बैठा था,तेरे काम में मदद कर रहा था। केवल
परिश्रम से ही काम नहीं बनता है अपनी धार को तेज बना कर काम हाथ में लेने से
व्यक्ति सफल बनता है।

हम विषय की उचित जानकारी लिए बिना ही काम करने में लग जाते हैं तब आंशिक
सफलता ही प्राप्त होती है या नहीं भी होती है,विषय वस्तु की सम्पूर्ण जानकारी से
सफलता सहज ही मिल जाती है।             

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

आचार्य और टीचर

आचार्य और टीचर

पण्डित विष्णु शर्मा और आचार्य चाणक्य को शिक्षक दिवस पर हिन्दुस्थान नमन
करता है। इनकी बात आज इसलिए क्योंकि हिन्दुस्थान में इनके जैसा शिक्षक
नहीं हुआ। बिना भारी भरकम किताबों के बोझ के इन्होने सम्राट बनाये। विष्णु
शर्मा की पंचतन्त्र की कहानियाँ मुर्ख राजकुमारों को बुद्धिमान और चतुर राजकुमार
बना देती है तो आचार्य चाणक्य की नीति साधारण बच्चे को सम्राट बना देती है। उस
समय भारतीय शिक्षा और शिक्षकों में ऐसा कौनसा गुण था जो नीडर ,साहसी ,देशभक्त
नीतिज्ञ,धर्मात्मा और पुरुषार्थी नागरिक देता था और आज की शिक्षा प्रणाली में कौनसे
ऐसे दोष पनप गए हैं कि राष्ट्र ऐसे नागरिकों के लिए तरस रहा है। आज के अंग्रेजी पढ़े
लिखे युवाओं से जब मैं सवाल करता हूँ कि "तुम आगे क्या करना चाहते हो "?इसका
90 %उत्तर मिलता है -अच्छी नौकरी। पहले हमारे देश के शिक्षक राजा बनाते थे और
आज के शिक्षक नौकरी करने वाले युवा तैयार कर रहे हैं। फिर भी हम गर्व करते हैं कि
हम पढ़ लिख गए हैं ! शिक्षा सर्वांगीण विकास के लिए दी जाती थी और अब मेकाले
आधारित शिक्षा पद्धति पेट भरने का झुगाड़ सिखाती है। शिक्षा जब व्यवसाय बन जाती
है तब शिक्षार्थी शिक्षक का आदर क्योंकर करेगा और शिक्षक को समय पर वेतन मिल
रहा है तो वह छात्रों की चिन्ता क्यों करेगा। शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चों को अनुभव पथ
पर चलना सीखा कर मंजिल तक पहुँचाना होना चाहिये और हमारी सरकार बच्चों को
केवल रट्टा तोता बना कर कर्तव्य पूरा कर रही है। आजाद भारत के युवकों को
स्वावलम्बी शिक्षा चाहिये वह कब मिलेगी   … क्या पता !!!   

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

भारत और जापान

भारत और जापान 

हिन्दुस्थान और जापान में पिछले साठ वर्ष में एक बड़ा अंतर आया है। भारत में पिछली
सरकारों ने भारतीयों के देश प्रेम की धधकती ज्वाला पर ठण्डा पानी डाला है या देश भक्ति
के अँगारे पर राख की मोटी परत जमने दी। पिछली सरकारों ने देश के गौरवपूर्ण इतिहास
को झूठी धर्मनिरपेक्षता की घास को उगाने के लिए तोड़ मरोड़ दिया,देश को विदेशी भाषा के
नागफाँस में झकड दिया ,देश की भाषा और संस्कृति को तहस नहस किया,भारत के वेद
पुराण और शास्त्रों से भारतीयों को अन्धविश्वास कह कर अलग कर दिया। इसका दुष्परिणाम
यह हुआ कि भारतीयों को अपना गौरव पूर्ण इतिहास बासी लगने लगा ,हमारे रामायण ,गीता
से ग्रन्थ काल्पनिक कहानी लगने लगे ,हमारी देवीशक्तियाँ देवत्व खो कर तामसिक बनने
लगी। हमारे देव पुरुष पौरुषहीन होते चले गये जबकि जापान पर अणुबम्ब गिरा कर रीढ़
हीन करने का प्रयास हुआ मगर जापान अपने इतिहास,अपनी भाषा ,अपनी संस्कृति पर
गर्व और विश्वास करके कर्म पथ पर चलता रहा ,लाखों बार प्राकृतिक आपदाएँ आयी मगर
जापान सिर उठा के चलता रहा। देश भक्ति का जज्बा भारतीयों में जो स्वतंत्रता से पहले
था वो ना जाने कहाँ दफन हो जाने दिया जबकि जापानियों में आज भी देश भक्ति का जज्बा
जगमगा रहा है। हम अपने ही देशवासियों के धन को लोकतंत्र की दुहाई देकर खुद ही लूटते
रहे और भ्रष्टाचार के विषधर को पोषण देते रहे और जापानी लोग देश का पैसा देश का समझ
सबका विकास करते गए।
  आज कितने काँग्रेसी नेता ऐसे बचे हैं जो देश के सामने यह कहने की हिम्मत रखते हैं कि
मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है ,अपने हिंदुत्व पर गर्व है ,श्री राम और कृष्ण जैसे महापुरुषों
की संतान होने पर गर्व है ?कोई नहीं ना ,यही कारण है देश की दुर्गति होने का ,क्योंकि हम
करोडो देशवासी वर्षों तक अपने पर गर्व महसूस ना कर सके,खुद को भूलकर जिन्दा लाश
की तरह घसीटते रहे। 
 इस देश को अब भी जापान के समकक्ष बनाया जा सकता है,यह काम हम हिंदुस्थानी लोगों
को ही करना है चाहे आज करे या कल। हमें अपने धर्म के महापुरुषों से जुड़ना होगा जिनके
एक हाथ में पुष्प है तो एक में चक्र भी है। एक हाथ से शांति की अपील है तो दूसरे हाथ में
धनुष भी है। जिनके एक हाथ में ज्ञान का शास्त्र है तो दूसरे हाथ में शस्त्र भी है। हमारे महा
पुरुष हमें सद्भाव और शक्ति का तालमेल सीखाते हैं।
हम देश भक्त बनने से पहले परिवार भक्त बने,अपने परिवार को सभ्य,सुसंस्कृत ,शिक्षित,
नीडर और धर्म का अनुसरण करने वाला बनाये यदि हम तीन चार साल लगातार इस काम
पर डटे रहे तो देश को जापान से बढ़कर बनने में देर नहीं लगेगी