गुरुवार, 11 सितंबर 2014

सहनशीलता

सहनशीलता 

ठूँठ (सूखी लकड़ी का मोटा तना) पर लकड़हारे ने पहले कुल्हाड़ी से वार किये और
उसके हर अँग के टुकड़े कर दिये ,अभी उसका दर्द खत्म ही नहीं हुआ था कि वह
सुथार के हाथों में पहुँच गया। सुथार ने उसकी छाल को अलग करना शुरू किया
तो वह चिल्लाया और सुथार से बोला -तुम मेरी खाल क्यों उधेड़ रहे हो,मैं तो पहले
से किस्मत का मारा हूँ अभी कुछ समय पहले कुल्हाड़ी से घाव खा कर आया हूँ और
अब तुम रहम करने की जगह मेरे दर्द को बढ़ा रहे हो ?
सुथार बोला -ठूँठ ,घबराओ नहीं ,तुम मेरे योग्य हाथों से सुरक्षित रहोगे यदि किसी
अनाड़ी के हाथों में पड़ गए होते तो कभी के राख बन गए होते।
ठूँठ चुपचाप दर्द सहता हुआ सुथार के हाथों से अपनी छाल उतरवाता रहा। छाल
उतारने के बाद सुथार उस पर रन्दा चलाने लगा। ठूँठ दर्द से बिलबिला उठा और
सुथार से बोला -तुम बहुत निष्ठुर हो पहले मेरी छाल उधेड़ दी और अब रन्दे से
चमड़ी घिस रहे हो ?
सुथार बोला -मैं तुझे निखारना चाहता हूँ। पहले तुम खुरदरे,बेडोल और
कोरे थे कुछ भी गुण नहीं था थोड़ा कष्ट सहना सीखो क्योंकि हर गुणी व्यक्ति और
वस्तु कष्ट सह कर ही विराट बनता है।
ठूँठ चुप हो गया और सुथार उस पर रन्दा चलाता रहा। जब वह काष्ठ चिकना और
सपाट हो गया तब सुथार उसे अलग -अलग प्रकार के औजारों से काट छाँट करके
मूर्ति की शक्ल में बदलने लगा। मूर्ति जब बन के तैयार हो गयी तो उस पर रंग
रोगन किया जाने लगा। मूर्ति खूबसूरत बन गई थी। ठूँठ अपने रूपांतरण को देख
प्रसन्न हो रहा था। मूर्तिबने चुके ठूँठ ने सुथार से पूछा -दुनियाँ अब मुझे किस रूप
में पहचानेगी ?
सुथार ने कहा -दुनियाँ में वस्तु का मुल्य उसकी उपयोगिता से आँका जाता है,अच्छी
सँगत,दुःख और कठिनाइयों को सहने के गुण से ही सर्जन होता है। अयोग्य हाथों में
पड़ने से व्यक्ति अनुपयोगी रह जाते हैं। मेरा काम तरासना था और तेरा कर्तव्य था
दुःख दर्द को सहना। दुनियाँ स्वत:ही मोल लगा देती है और नाम दे देती है।

तभी एक नगर सेठ आया और बोला -भैया इस जगन्नाथ की मूर्ति का क्या मूल्य है?
इसे मुझे दे दो मैं इसे मंदिर में लगवाऊंगा। ठूँठ बनी मूर्ति कृतज्ञता से सुथार को
निहार रही थी।             

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