मंगलवार, 23 सितंबर 2014

निराशा अपराध है

निराशा अपराध है 

हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारी इच्छा के अनुकूल हो। हमारी यही सोच हमारे
में निराशा उत्पन्न करती है और निराशा का परिणाम यह होता है कि हम विराट
होते हुए भी खुद को वामन बना लेते हैं।

हम बहुत कम समय में समय से ज्यादा पाना चाहते हैं,मूल्य से ज्यादा पाने की
प्रवृति हमें उतना भी नहीं दे पाती जितने के वास्तव में हम हक़दार थे। जब हम
इस हकीकत से रूबरू होते हैं तो हम कुंठा और निराशा में डूब जाते हैं।

हम अधकचरी जानकारी और अति आत्मदंभ के कारण बहुत सी जानकारियाँ
छोड़ देते हैं जिनकी वास्तव में जरूरत थी। आधी अधूरी जानकारी के बल पर
हम वो सफलता पाना चाहते हैं जिसके लिए उस विषय की पूर्ण जानकारी
आवश्यक थी ,नतीजन हम असफल होते हैं और निराशा में डूब जाते हैं।

हम दूसरों के गुणों और ज्ञान की प्रशंसा करने से कतराते हैं और अच्छे के
अनुकरण की जगह आलोचना में लग जाते हैं या आत्म प्रशंसा में लग
जाते हैं मगर दुनियाँ हमारा असली मोल तुरंत निकाल लेती है। दुनिया
जब आईना दिखाती है तो हम उस कड़वे सत्य को पचा नहीं पाते और अकेले
हो जाते हैं ,यह अकेलापन मानसिक रुग्णता देता है।

जो पा लिया है उसका उपयोग और उपभोग करने की जगह हम दूसरों पर
निगाह डालते हैं और जो पाया है उसे कमतर मानते हैं तथा दुसरो का अधिक।
यह आदत मन को संतुष्टि नहीं देकर ईर्ष्या की आग में जलाती है जिसका
नतीजा निराशा में बदल जाता है

निराशा के पाप को धोने का सरल उपाय है सोच को सकारात्मक और
व्यावहारिक बनाना। सफल व्यक्ति का पीछा करने की जगह सफलता के
कारण का पीछा करना।



  

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