शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

पर उपदेश कुशल बहुतेरे 

एक बाबाजी जँगल में कुटिया बना के रहते थे। समीप के गाँवों से भिक्षा अर्जन
करके पेट भर लेते थे। बाबाजी समीप के गाँवों में प्रसिद्ध थे। गाँव वालो के दुःख
दर्द सुनते और उचित उपचार और सलाह देते। उनकी कुटिया पर दिन भर कोई
ना कोई भक्त अपना दुःख दर्द लेकर आता रहता। कोई बच्चे के निरोगी होने की
कामना से,कोई पालतू जानवर के बीमार हो जाने पर,कोई बिगड़े काम को
सँवारने की आशा से।

एक दिन सुबह सवेरे बाबाजी गाँव की ओर गये और गाँव वालो को खुद की बीमार
गाय का हाल बताया और ठीक होने का उपाय पूछा। गाँव वालो ने दूसरे गाँव के
जानकार के पास भेजा ,दूसरे ने तीसरे गाँव वाले जानकार के पास। एक गाँव से
दूसरे गाँव घूमते-घूमते बाबाजी थक गए इतने में एक किसान उधर से गुजरा।
बाबाजी को प्रणाम कर उसकी भैंस को भभूत से ठीक कर देने के लिए आभार
जताया और बाबाजी को वहाँ होने का कारण पूछा।

बाबाजी ने अपनी बीमार गाय के बारे में सुबह से गाँव-गाँव बिमारी के बारे में
जानकारी रखने वाले की खोज में घूमने की बात कही। उनकी बात सुन किसान
बोला -बाबाजी,आपकी भभूत से मेरी भैंस ठीक हो गयी तो क्या आपकी गाय
ठीक नहीं हो सकती ?

बाबाजी बोले -वो तेरी भैंस थी बेटे,मगर यह मेरी गाय है।

हम अपनी पीड़ा के बोझ तले दब जाते हैं। दूसरे का दुःख छोटा और खुद का बड़ा
समझने की फितरत है इंसान में। आप कहेंगे यह तो हर कोई जानता है,इसमें
नया क्या ?दूसरों को उपदेश देना सहज,सरल है क्योंकि उसमें "मेरा"या "मेरापन"
नहीं है। जहाँ मेरापन झुड़ा हो,वहां क्या करे,कैसे करें ?

जब दुःख स्वयं से जुड़ जाता है तो उसको दूर करने के लिए हम निष्णात व्यक्ति
से,अपने हितेषी के निर्णय से और परमात्मा की न्याय व्यवस्था से जुड़ जाये।
खुद की बुद्धि का संकटकाल में अधिक उपयोग ना करेंक्योंकि चिंतित मन कभी
भी सही निर्णय समय पर नहीं करता है।       

गुरुवार, 23 अक्तूबर 2014

लक्ष्मी कृपा मन्त्र

लक्ष्मी कृपा मन्त्र 

कल की पोस्ट में एक मित्र ने कहा -यार ,यह तो काफी बड़ा मन्त्र समूह है
क्या आप ऐसा कोई मन्त्र बता सकते हैं जो छोटा हो और भरपूर धन दे सके
तथा ख़ुशी दे सके ?

वेदों में विभिन्न मन्त्र हैं जिससे मनोकामनाएँ पूरी होती है। लक्ष्मी कृपा का
छोटा मन्त्र है जिसे आप कसौटी पर कसे -

आपके दायें हाथ में पुरुषार्थ है तो बायें हाथ में विजय निश्चित है। 

ख़ुशी और प्रसन्नता प्राप्ति के लिए मन्त्र -

सैंकड़ों हाथों से धन अर्जित करो और हजारों हाथों से बाँटो। 

दीपावली की हार्दिक मंगल कामना। 

बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

धन लाभ का शुभ योग

धन लाभ का शुभ योग 

धन लाभ और लक्ष्मी प्राप्ति की इच्छा रखने वाले हर व्यक्ति को अपनी आदतों में
निचे लिखी आदतें भी जोड़ लेनी होती है।
क्या आप वास्तव में धनी बनना चाहते हैं या दिखावा कर रहे हैं ?
यदि आप दिखावा नहीं कर रहे हैं तो धन योग का शुभ अवसर आपके हाथों की
पहुँच में है ,मुठ्ठी में है।
आपको इसके लिए कुछ खर्च नहीं करना है ,बस कुछ मन्त्र हैं जिनका जाप तो
आपने सुना होगा मगर अब आपको इन मंत्रो का जाप नहीं करना है। अब
आपको इन मंत्रो के परीक्षण के लिए तैयार होना है। आप खुद इन मंत्रो को
अपनी कसौटी पर कस कर देखें ,उचित और अनुकूल प्रतिफल मिले तो इन्हें
प्रतिदिन कसौटी पर कसे और धन लाभ अर्जित करते रहें।

मन्त्र समूह -

अटूट लक्ष्य 

स्वयं में आस्था और विश्वास

ह्रदय में लक्ष्य तक पहुँचने की धधक 

आलस्य का त्याग 

हाथ में लिए काम को समय पर पूरा करना 

अपने व्यवसाय का गहन अध्ययन और चिंतन 

समय का सदुपयोग 

बात का धनी होना

विपरीत परिस्थितियों में धैर्य 

अनुकूल परिस्थितियों में अदम्य साहस और पहल 

नयी आवश्यकताओं और संभावनाओं की खोज 

जुए और सट्टे से दुरी 

प्रसन्न और खुश मिजाज बने 

लोगों की प्रशंसा करना सीखें 

परमात्मा के प्रति कृतज्ञ भाव रखें 

रविवार, 5 अक्तूबर 2014

मैं पीछे रह गया,क्योंकि

मैं पीछे रह गया,क्योंकि 

मेरा पूरा ध्यान लोगों के क्रियाकलापों का सूक्ष्म अध्ययन करने में ही बीत गया ,मैं 
जानकार बन गया। लोगों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यही बताता रहा 
मगर प्राप्त जानकारियों से मेरे क्या कर्त्तव्य थे उसे स्वयं से भी छिपाता रहा। 

किसके कहने का क्या गूढ़ार्थ था यह विषय मेरी पहली पसन्द बन गया था। लोगों 
की सफलता या असफलता दोनों में नुक्ताचीनी निकालने में महारत हासिल करता 
गया। 

कैसे तैरा जा सकता है इस विषय पर मेरी थ्योरी सटीक थी ,घुटने तक के पानी से 
मनुष्य को कैसे गहरे पानी में डुबकी मारनी चाहिये यह सूत्र मेने कईयों को सिखाया 
मगर मैं खुद पानी से डरता रहा और किनारे पर बैठा रहा। 

मैं जीतने वाले धावक के सम्मान में तालियाँ बजाता रहा मगर दौड़ने से साँस फुलने 
और पसीना बहाने जैसे कष्टों से खुद को बचाता रहा। 

मेने चलने गिरने और उठने की प्रक्रिया को तब तक ही उचित समझा जब तक मेने  
चलना सीखा वह मेरा बचपन था ,लेकिन जब मैं युवा हुआ तो मुझे चलने की प्रक्रिया 
में गिरने,पड़ने और फिर से उठने का काम जोखिम भरा लगा और बैठे रहने को 
सुरक्षित समझा। 

गहन अँधेरे से लड़ने के लिए एक तीली काफी है,यह पाठ मुझे पक्का याद था मगर 
मैं हर बार तीली जलाने में जलने का खतरा देख तीली जलाने से बचता रहा। 

मैं दैव पर आस्थावान था और उसकी कृपा पाने के लिए उसकी चापलूसी और स्तुति 
में लगा रहा मगर देव बड़ा निष्ठुर था वह उसी का साथ दे रहा था जो पसीना बहा रहे थे।     

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

सच

सच 

जब मुझे थोड़ा सा ज्ञान हुआ तो मैं अपने को विद्वान समझ घमण्ड और अहँकार
में जीने लगा कुछ समय बाद जब मेने श्रेष्ठ लोगों की संगत में रहकर कुछ ज्ञान और
पाया तो मेरा घमण्ड और अहँकार ज्वर की तरह उतर गया और मुझे लगा कि
दुनियाँ से मुझे बहुत कुछ सीखना चाहिये ,बस फिर मैं शिक्षार्थी बन गया।

बहुत फरक पड़ता है जब बच्चा कहता है कि हम अपने माता -पिता के पास रहते हैं
और माता -पिता कहते हैं कि हम बच्चे के पास रहते हैं।

युवा बच्चे को उसके बूढ़े बाप के कारण जाना जाए तो बाप के मन में ख़ुशी नहीं छलकती
है मगर जब इसका उल्टा चरितार्थ होता है तो बाप की ख़ुशी अनपढ़ भी पढ़ लेता है।

जब मैं युवा था तब मुझे लगता था मेरे पिता को अपने आप में बहुत परिवर्तन करना
चाहिए आज जब मैं उनकी उम्र में हूँ तो महसूस करता हूँ वो सुलझे हुए और दूर की
सोच रखने वाले जबाबदार पिता थे। 

महापुरुषों के विचारों को सुनने की भीड़ दुनियाँ के हर कोने में लगती है क्योंकि लोग
उन्हें सुनना पसन्द करते हैं मगर उन विचारों से अभी तक परिवर्तन नहीं हुआ कारण
कि भीड़ उन्हें सिर्फ सुनने आती है। 

खुद को अजर अमर समझ कर अर्थ और ज्ञान का संग्रह करो और मृत्यु कभी भी आ
सकती है यह सोच कर धर्म का पालन करो मगर खुद को अमर समझ धर्म को बाद में
कर दिया और मृत्यु कभी भी आ सकती है ऐसा सोच भोग को आगे कर दिया।   

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

स्वच्छता से पवित्रता की ओर

स्वच्छता से पवित्रता की ओर 

मानव या पशु हर कोई स्वच्छता पसन्द होता है भले ही पवित्रता पसन्द ना भी
करता हो। यह सत्य सार्वभौमिक है। फिर क्या कारण रहा कि जो आर्य पवित्रता
का संदेशवाहक था वह पवित्रता तो भुला ही मगर स्वच्छता भी भूलता चला गया।
आज हम लापरवाह और बेजबाबदार हो चुके हैं हमारी स्वच्छता खुद के शरीर तक
खुद के कमरे या मकान तक सिमित हो गयी है ,सार्वजनिक स्थान की हर जबाबदारी
चाहे वह रखरखाव की हो या स्वच्छता की,हम उसमे अपना कर्तव्य नहीं देखते ;
उसको प्रशासन का कर्त्तव्य मानते हैं।
    हम अपने घर का कूड़ा कचरा बाहर सड़क पर इसलिए भी बेहिचक फैंक
देते हैं कि सफाई कर्मचारी को काम मिलता रहे !!हमारी इस सोच के कारण सफाई
कर्मचारी भी कुण्ठित हो अपने काम के प्रति उदासीन हो जाता है क्योंकि वह जानता
है हर दिन ऐसे ही होना है।
    हम हवा,जल और पृथ्वी तीनों ही सम्पदा का दुरूपयोग करने में लगे हैं। बड़े पैसे
वाले जमकर प्रदुषण करते हैं जिसका कुफल निचे से मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा
पड़ता है और हमारा पर्यावरण विभाग कुम्भकर्ण की नींद में रहता है या कभी कभार
खानापूर्ति करके चुप हो जाता है या अपनी जेब में सिक्के का वजन देख अनदेखी
करता रहता है।
    हम वर्षो से स्वच्छता पर राष्ट्र के धन को खर्च करके भी आज तक शून्य ही हासिल
कर पाये हैं ,क्यों ? यह प्रशासनिक अव्यवस्था है जो कटु सत्य है इसे मानकर दुरस्त
करने के लिए हमें जबाबदेही तय करनी पड़ेगी,कार्य के प्रति प्रतिबद्धता रखनी पड़ेगी।
    सड़को को टॉयलेट आम आदमी क्या चाह करके बनाता है ?नहीं ना। इसके पीछे
का कारण है सार्वजनिक जगहों पर टॉयलेट का अभाव। यह काम किसको करना था ?
क्या उस आम आदमी को जिसके पास पेट भरने तक का साधन नहीं है ?हम फैलती
जा रही गन्दगी के लिए उसे तब तक जिम्मेदार नहीं मान सकते जब तक हम हर
नागरिक की पहुँच तक टॉयलेट ना बनवा दे।
    हमारे पास कूड़ा निष्पादन की आधुनिक तकनीक का अभाव है। प्रशासन शहर का
कूड़ा या तो शहर की सीमा पर या समीप के गाँव के पास ढेर लगा देता है। क्या इसे
समाधान कहा जा सकता है ?
    स्वच्छता के लिए जरुरी है पवित्रता। पवित्रता मानसिक और आत्मिक विचारों में
भी झलकनी चाहिए और बाहर वातावरण में भी दिखनी चाहिये। कूड़ा -कचरा बाहर
फैलाने या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने से पहले हमें खुद से प्रश्न करना चाहिए कि
क्या मुझे ऐसा करना चाहिये ? जब हम इस प्रक्रिया को शुरू करेंगे तो परिणाम भी
पायेंगे। आइये- हम केवल स्वच्छ ही नहीं पवित्र भारत के निर्माण के लिए स्वयं की
गन्दी आदतों को अभी से बदले और राष्ट्र निर्माण में सहयोगी बनें।         

बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

देखादेखी

देखादेखी 

व्यक्ति जब लक्ष्य को भूलकर अपने को बड़ा बताने के चक्कर में ऐसे अटपटे, बहूद्दे
और गैर-जरुरी फैसले लेता है जिनके लेने से नुकसान होता है ,जग हँसाई होती है 
और मन में प्रतिशोध सुलगता है तो निश्चित मानिये वह व्यक्ति मूर्ख और मूढ़ है। 

कोई व्यक्ति बणिये की दुकान से घी खरीदने के लिए जाता है और पैसे वाले पड़ोसी 
को एक सेर मूँगफली खरीदते देख उन पैसो से घी की जगह काजू खरीद लेता है। 
इस घटना का प्रभाव या दुष्प्रभाव सामने वाले पर पड़ा या नहीं पड़ा यह पक्का नहीं 
है परन्तु यह जरूर पक्का है कि काजु खरीदने का निर्णय मूर्खता और मूढ़ता है। 

        हम झूठे आडम्बर में क्यों जीना चाहते हैं जिससे संतोष की जगह ईर्ष्या,डाह 
और कुंठा मिलती है। अपने आप को पैसे के अभाव में शूद्र समझना या झूठा दिखावा 
करके खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश करना दोनों सोच संकीर्ण है,केवल पैसे को बड़ा 
नहीं माना जाता है क्योंकि मैने फकीरों और संतों के आगे बड़े बड़े राष्ट्राध्यक्षों को झुकते 
देखा है। 

      देखादेखी करने का मतलब यह है कि आज हम जिस जगह पर खड़े हैं वह हमें पसंद 
नहीं है ,हम उससे ऊपर के पायदान पर खुद को देखना चाहते हैं। यह बढ़िया सोच है ,सुन्दर 
सपना है इसको पूरा करने के लिए झूठे दिखावे या खुद को भ्रम में डालने की आवश्यकता 
नहीं है। जब भी हम इस सच्चाई को जान जाते हैं कि दुनियाँ ,साथी या कुटुंब के लोग 
आगे बढ़ गए हैं और मैं पीछे रह गया हूँ तो कुण्ठित और डाह में पड़ने की जरूरत नहीं 
है.हम जहाँ हैं ,जैसे हैं उसे उसी रूप में स्वीकार कर के ऊँचे पायदान की ओर बढ़ने का मार्ग 
ढूंढने में लग जाये और उस मार्ग पर चलना शुरू कर दे। देखादेखी नहीं,पसीना बहाने और 
पुरुषार्थ करने का ध्येय बना ले ,इससे ही रास्ता निकलेगा। इसके सिवा बाकि के रस्ते 
भटकाव की अंधेरी गली में ले जाते हैं जहाँ सम्मान भी नहीं मिलता और चरित्र भी 
बिखर जाता है।