बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

देखादेखी

देखादेखी 

व्यक्ति जब लक्ष्य को भूलकर अपने को बड़ा बताने के चक्कर में ऐसे अटपटे, बहूद्दे
और गैर-जरुरी फैसले लेता है जिनके लेने से नुकसान होता है ,जग हँसाई होती है 
और मन में प्रतिशोध सुलगता है तो निश्चित मानिये वह व्यक्ति मूर्ख और मूढ़ है। 

कोई व्यक्ति बणिये की दुकान से घी खरीदने के लिए जाता है और पैसे वाले पड़ोसी 
को एक सेर मूँगफली खरीदते देख उन पैसो से घी की जगह काजू खरीद लेता है। 
इस घटना का प्रभाव या दुष्प्रभाव सामने वाले पर पड़ा या नहीं पड़ा यह पक्का नहीं 
है परन्तु यह जरूर पक्का है कि काजु खरीदने का निर्णय मूर्खता और मूढ़ता है। 

        हम झूठे आडम्बर में क्यों जीना चाहते हैं जिससे संतोष की जगह ईर्ष्या,डाह 
और कुंठा मिलती है। अपने आप को पैसे के अभाव में शूद्र समझना या झूठा दिखावा 
करके खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश करना दोनों सोच संकीर्ण है,केवल पैसे को बड़ा 
नहीं माना जाता है क्योंकि मैने फकीरों और संतों के आगे बड़े बड़े राष्ट्राध्यक्षों को झुकते 
देखा है। 

      देखादेखी करने का मतलब यह है कि आज हम जिस जगह पर खड़े हैं वह हमें पसंद 
नहीं है ,हम उससे ऊपर के पायदान पर खुद को देखना चाहते हैं। यह बढ़िया सोच है ,सुन्दर 
सपना है इसको पूरा करने के लिए झूठे दिखावे या खुद को भ्रम में डालने की आवश्यकता 
नहीं है। जब भी हम इस सच्चाई को जान जाते हैं कि दुनियाँ ,साथी या कुटुंब के लोग 
आगे बढ़ गए हैं और मैं पीछे रह गया हूँ तो कुण्ठित और डाह में पड़ने की जरूरत नहीं 
है.हम जहाँ हैं ,जैसे हैं उसे उसी रूप में स्वीकार कर के ऊँचे पायदान की ओर बढ़ने का मार्ग 
ढूंढने में लग जाये और उस मार्ग पर चलना शुरू कर दे। देखादेखी नहीं,पसीना बहाने और 
पुरुषार्थ करने का ध्येय बना ले ,इससे ही रास्ता निकलेगा। इसके सिवा बाकि के रस्ते 
भटकाव की अंधेरी गली में ले जाते हैं जहाँ सम्मान भी नहीं मिलता और चरित्र भी 
बिखर जाता है।       

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