शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

सच

सच 

जब मुझे थोड़ा सा ज्ञान हुआ तो मैं अपने को विद्वान समझ घमण्ड और अहँकार
में जीने लगा कुछ समय बाद जब मेने श्रेष्ठ लोगों की संगत में रहकर कुछ ज्ञान और
पाया तो मेरा घमण्ड और अहँकार ज्वर की तरह उतर गया और मुझे लगा कि
दुनियाँ से मुझे बहुत कुछ सीखना चाहिये ,बस फिर मैं शिक्षार्थी बन गया।

बहुत फरक पड़ता है जब बच्चा कहता है कि हम अपने माता -पिता के पास रहते हैं
और माता -पिता कहते हैं कि हम बच्चे के पास रहते हैं।

युवा बच्चे को उसके बूढ़े बाप के कारण जाना जाए तो बाप के मन में ख़ुशी नहीं छलकती
है मगर जब इसका उल्टा चरितार्थ होता है तो बाप की ख़ुशी अनपढ़ भी पढ़ लेता है।

जब मैं युवा था तब मुझे लगता था मेरे पिता को अपने आप में बहुत परिवर्तन करना
चाहिए आज जब मैं उनकी उम्र में हूँ तो महसूस करता हूँ वो सुलझे हुए और दूर की
सोच रखने वाले जबाबदार पिता थे। 

महापुरुषों के विचारों को सुनने की भीड़ दुनियाँ के हर कोने में लगती है क्योंकि लोग
उन्हें सुनना पसन्द करते हैं मगर उन विचारों से अभी तक परिवर्तन नहीं हुआ कारण
कि भीड़ उन्हें सिर्फ सुनने आती है। 

खुद को अजर अमर समझ कर अर्थ और ज्ञान का संग्रह करो और मृत्यु कभी भी आ
सकती है यह सोच कर धर्म का पालन करो मगर खुद को अमर समझ धर्म को बाद में
कर दिया और मृत्यु कभी भी आ सकती है ऐसा सोच भोग को आगे कर दिया।   

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