रविवार, 5 अक्तूबर 2014

मैं पीछे रह गया,क्योंकि

मैं पीछे रह गया,क्योंकि 

मेरा पूरा ध्यान लोगों के क्रियाकलापों का सूक्ष्म अध्ययन करने में ही बीत गया ,मैं 
जानकार बन गया। लोगों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यही बताता रहा 
मगर प्राप्त जानकारियों से मेरे क्या कर्त्तव्य थे उसे स्वयं से भी छिपाता रहा। 

किसके कहने का क्या गूढ़ार्थ था यह विषय मेरी पहली पसन्द बन गया था। लोगों 
की सफलता या असफलता दोनों में नुक्ताचीनी निकालने में महारत हासिल करता 
गया। 

कैसे तैरा जा सकता है इस विषय पर मेरी थ्योरी सटीक थी ,घुटने तक के पानी से 
मनुष्य को कैसे गहरे पानी में डुबकी मारनी चाहिये यह सूत्र मेने कईयों को सिखाया 
मगर मैं खुद पानी से डरता रहा और किनारे पर बैठा रहा। 

मैं जीतने वाले धावक के सम्मान में तालियाँ बजाता रहा मगर दौड़ने से साँस फुलने 
और पसीना बहाने जैसे कष्टों से खुद को बचाता रहा। 

मेने चलने गिरने और उठने की प्रक्रिया को तब तक ही उचित समझा जब तक मेने  
चलना सीखा वह मेरा बचपन था ,लेकिन जब मैं युवा हुआ तो मुझे चलने की प्रक्रिया 
में गिरने,पड़ने और फिर से उठने का काम जोखिम भरा लगा और बैठे रहने को 
सुरक्षित समझा। 

गहन अँधेरे से लड़ने के लिए एक तीली काफी है,यह पाठ मुझे पक्का याद था मगर 
मैं हर बार तीली जलाने में जलने का खतरा देख तीली जलाने से बचता रहा। 

मैं दैव पर आस्थावान था और उसकी कृपा पाने के लिए उसकी चापलूसी और स्तुति 
में लगा रहा मगर देव बड़ा निष्ठुर था वह उसी का साथ दे रहा था जो पसीना बहा रहे थे।     

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