शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

चिंता की बात ………

चिंता की बात   ………

 
बहुसंख्या के बल से नेतागिरी शुरू होती है और बहुसंख्या की ताकत से सत्ता भी चलती है ,इस बात 
की ख़ुशी कम हो जाती है क्योंकि नेता बन जाने के बाद हर अदना सा आदमी इसी प्रजातंत्र में 
बहुसंख्यक लोगों के हित में कुछ भी करना अपना धर्म नहीं समझता है सब अल्पसंख्या के दल -
दल में फंसने का जुगाड़ बिठाने में उम्र गंवाते रहते हैं। 

चिंता इस बात की नहीं है कि किस धर्म के अनुयायियों की जनसँख्या बढ़ रही है मगर चिंता की 
यह बात जरूर है कि बहुसंख्यक का खून पानी बन रहा है ,कान बहरे हो रहे हैं ,जबान गूँगी हो 
रही है , आँखों से देखना नहीं चाहता है ,दिल कमजोर हो रहा है।

चिंता धर्मान्तरण की नहीं है मगर धर्मान्तरण का दोगलापन चिंता बना हुआ है। हिन्दू धर्म को 
त्याग कर कोई धर्मान्तरण करता है तो किसी के कान में जूँ नहीं रेंगती मगर कोई हिन्दू बनता 
है तो मक्कार दिलों को नागवार गुजरता है। 

चिंता की बात आतंक नहीं है क्योंकि इसका माकूल ईलाज  है ,दवा है। चिंता की बात यह 
है कि आतंक को पैदा करने वाले और पोषण करने वाले जिन्दा है। 

चिंता की बात गरीबी और भुखमरी नहीं है मगर चिंता की बात यह जरूर है कि गरीबी और 
भुखमरी को मिटाने की दवा पर ताकतवर लोग बेजा हक जमाये बैठे हैं। 

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