शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

हिन्दू नव वर्ष

हिन्दू नव वर्ष

हिन्दू नव वर्ष को संवत्सर कहा जाता है जो ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की उत्पति का प्रथम दिन है। यह दिन हिन्दू
माह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है।
संवत्सर काल को मापने की ऋषियों द्वारा खोजी गयी वैज्ञानिक विधि है जिसे सौर ,चन्द्र और नक्षत्र सावन
और अधिमास के आधार पर परखा गया है
सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा 365 दिन में पूरी करता है और चन्द्र 355 दिन में। तीन साल में यह अंतर 30 दिन का
होता है इसलिए अधिक मास की गणना की गई है.
रात्री के अँधेरे में नए दिन की शरुआत हिन्दू कलेंडर में नहीं होती है। हिन्दू कैलेंडर में दिन सूर्योदय से अगले
सूर्योदय तक माना जाता है।
हिन्दू त्यौहार चन्द्र कलेंडर के आधार पर मनाये जाते हैं। तिथियों का क्षय और बढ़ना चन्द्र की गति के आधार
पर है और चन्द्र की गति असमान है।
नव संवत्सर का प्रारम्भ यानि विक्रम संवत की स्थापना राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने ईसा पूर्व 57  साल में की
थी।
राजा विक्रमादित्य ने विदेशी राजाओं शक और हुण की दासता से भारत को मुक्त कराया था।
राजा विक्रमादित्य ने अखंड भारत के  नागरिकों के कर्ज को अपने राजकोष से चुका कर नव वर्ष की स्थापना
की थी।
राजा विक्रमादित्य चक्रवती सम्राट होने के बाद भी ऐश्वर्य का त्याग कर भूमी पर शयन करते थे और अपने
सुख के लिए राजकोष से धन नहीं लेते थे।
राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों में धन्वन्तरि (वैद्य )वराहमिहिर (ज्योतिषाचार्य )कालिदास ( साहित्यकार )शामिल
थे।
श्री राम ,कृष्ण ,बुद्ध ,महावीर ,नानकदेव की जयंती हिन्दू कलेंडर के आधार पर मनाई जाती है।
जवाहरलाल नेहरू ने २२ मार्च 1957 को ग्रेगेरियन कलेंडर को सरकारी कामकाज के लिए उपयुक्त समझ
इसे राष्ट्रिय कलेंडर घोषित किया !!और हम भारतवासी उसके बाद से हिन्दू नव वर्ष को छोड़ते चले गए
और 1 जनवरी को नया साल समझने और मनाने लग गये।
 नया वर्ष का ईसा के जन्म से भी संबंध नहीं है और ना ईसा की मृत्यु से , फिर भी जनवरी को नया वर्ष मानना
सिर्फ अवैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
हिन्दू नव वर्ष को विश्व के कौन -कौन धर्मावलम्बी मनाते हैं ? कोई भी नहीं ,फिर हम किसी और के धर्म का
गुणगान क्यों करने लग जाते हैं और खुद के गौरव को छोड़ देते हैं ?







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