शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

आजादी तो 1947 के पहले ही मिल जाती (सुभाष बोस पर विशेष )

आजादी तो 1947 के पहले ही मिल जाती (सुभाष बोस पर विशेष )


"स्वतंत्रता खून मांगती है 'शीश फूल मांगती है। तुम मुझे खून दो ,मैं तुम्हे आजादी दूँगा "-जयहिंद 
यह वाक्य नहीं है यह एक मन्त्र है जिसकी ताकत से आजाद हुआ हिंदुस्तान 
किस तरह सुभाष देश में पंप रहे कायरता पूर्ण विचारों से लड़ते रहे। गांधी की गलतियों पर सुभाष 
नाराज थे। गांधी मौत के बिना युद्ध जीतना चाहते थे और सुभाष जानते थे कि युद्ध हमेशा शस्त्रों से 
लड़े और जीते जाते हैं
  क्यों स्थगित किया गांधी ने असहयोग आंदोलन  ?
उसका भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर क्या असर पड़ा ?    
असहयोग आन्दोलन के स्थगन पर मोतीलाल नेहरू ने कहा कि, "यदि कन्याकुमारी के एक गाँव ने 
अहिंसा का पालन नहीं किया, तो इसकी सज़ा हिमालय के एक गाँव को क्यों मिलनी चाहिए।" 
अपनी प्रतिक्रिया में सुभाषचन्द्र बोसने कहा, "ठीक इस समय, जबकि जनता का उत्साह चरमोत्कर्ष 
पर था, वापस लौटने का आदेश देना राष्ट्रीय दुर्भाग्य से कम नहीं"। आन्दोलन के स्थगित करने का 
प्रभाव गांधी जी की लोकप्रियता पर ख़राब पड़ा।
क्या था गांधी इरविन समझोता ?
गाँधी-इरविन समझौता 5 मार्च1931 ई. को हुआ था। महात्मा गाँधी और लॉर्ड इरविन के मध्य 
हुए इस समझौते को 'दिल्ली पैक्ट' के नाम से भी जाना जाता है। गाँधी जी ने इस समझौते को 
बहुत महत्त्व दिया था, जबकि पंडित जवाहर लाल नेहरू और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने इसकी
 कड़ी आलोचना की। कांग्रेसी भी इस समझौते से पूरी तरह असंतुष्ट थे, क्योंकि गाँधी जी भारत
 के युवा क्रांतिकारियों भगत सिंहराजगुरु और सुखदेव को फाँसी के फंदे से बचा नहीं पाए थे।

समझौते की शर्तें

इस समझौते की शर्तें निम्नलिखित थीं-
  1. कांग्रेस व उसके कार्यकर्ताओं की जब्त की गई सम्पत्ति वापस की जाये।
  2. सरकार द्वारा सभी अध्यादेशों एवं अपूर्ण अभियागों के मामले को वापस लिया जाये।
  3. हिंसात्मक कार्यों में लिप्त अभियुक्तों के अतिरिक्त सभी राजनीतिक क़ैदियों को मुक्त किया जाये।
  4. अफीम, शराब एवं विदेशी वस्त्र की दुकानों पर शांतिपूर्ण ढंग से धरने की अनुमति दी जाये।
  5. समुद्र के किनारे बसने वाले लोगों को नमक बनाने व उसे एकत्रित करने की छूट दी जाये।
  • महात्मा गाँधी ने कांग्रेस की ओर से निम्न शर्तें स्वीकार कीं-
  1. 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' स्थगति कर दिया गया जायेगा।
  2. 'द्वितीय गोलमेज सम्मेलन' में कांग्रेस के प्रतिनिधि भी भाग लेंगे।
  3. पुलिस की ज्यादतियों के ख़िलाफ़ निष्पक्ष न्यायिक जाँच की मांग वापस ले ली जायेगी।
  4. नमक क़ानून उन्मूलन की मांग एवं बहिष्कार की मांग को वापस ले लिया जायेगा।
मनाया जाना था 26 जनवरी १९३० को पहला स्वतंत्रता दिवस - बोस  चाहते थे कि अंग्रेजों को 
बातों से नहीं मौत के घाट उतार करके ही मकसद पाया जा सकता है। उनकी पूरी तैयारी थी पर 
कायर अहिंसा के विषाद पूर्ण वचनो ने सब गुड गोबर कर दिया  
कड़वा  सच 
26 जनवरी 1931 को कोलकाता में राष्ट्र ध्वज फहराकर सुभाष एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व कर
 रहे थे तभी पुलिस ने उन पर लाठी चलायी और उन्हें घायल कर जेल भेज दिया। जब सुभाष जेल 
में थे तब गान्धीजी ने अंग्रेज सरकार से समझौता किया और सब कैदियों को रिहा करवा दिया।
 लेकिन अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियों को रिहा करने से साफ इन्कार कर दिया।
 भगत सिंह की फाँसी माफ कराने के लिये गान्धी ने सरकार से बात तो की परन्तु नरमी के साथ।
 सुभाष चाहते थे कि इस विषय पर गान्धीजी अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड़ दें।
 लेकिन गान्धी अपनी ओर से दिया गया वचन तोड़ने को राजी नहीं थे। अंग्रेज सरकार अपने
 स्थान पर अड़ी रही और भगत सिंह व उनके साथियों को फाँसी दे दी गयी। भगत सिंह को न बचा
 पाने पर सुभाष गान्धी और कांग्रेस के तरीकों से बहुत नाराज हो गये।
कांग्रेस अध्यक्ष -सुभाष बोस की व्यूह रचना और गांधी का भीरूपन 
1938 में गान्धीजी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाष को चुना तो था मगर उन्हें सुभाष की
 कार्यपद्धति पसन्द नहीं आयी। इसी दौरान यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छा गए थे।
 सुभाष चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर भारत का स्वतन्त्रता संग्राम 
अधिक तीव्र किया जाये। उन्होंने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में इस ओर कदम उठाना भी शुरू
 कर दिया था परन्तु गान्धीजी इससे सहमत नहीं थे।
1939 में जब नया कांग्रेस अध्यक्ष चुनने का वक्त आया तब सुभाष चाहते थे कि कोई ऐसा
 व्यक्ति अध्यक्ष बनाया जाये जो इस मामले में किसी दबाव के आगे बिल्कुल न झुके। ऐसा
 किसी दूसरे व्यक्ति के सामने न आने पर सुभाष ने स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष बने रहना चाहा।
 लेकिन गान्धी उन्हें अध्यक्ष पद से हटाना चाहते थे। गान्धी ने अध्यक्ष पद के लिये पट्टाभि 
सीतारमैया को चुना। कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने गान्धी को खत लिखकर सुभाष को ही 
अध्यक्ष बनाने की विनती की। प्रफुल्लचन्द्र राय और मेघनाद साहा जैसे वैज्ञानिक भी सुभाष
 को ही फिर से अध्यक्ष के रूप में देखना चाहतें थे। लेकिन गान्धीजी ने इस मामले में किसी की
 बात नहीं मानी। कोई समझौता न हो पाने पर बहुत बरसों बाद कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद के 
लिये चुनाव हुआ।
सब समझते थे कि जब महात्मा गान्धी ने पट्टाभि सीतारमैय्या का साथ दिया हैं तब वे चुनाव 
आसानी से जीत जायेंगे। लेकिन वास्तव में सुभाष को चुनाव में 1580 मत और सीतारमैय्या 
को 1377 मत मिले। गान्धीजी के विरोध के बावजूद सुभाषबाबू 203 मतों से चुनाव जीत गये।
 मगर चुनाव के नतीजे के साथ बात खत्म नहीं हुई। गान्धीजी ने पट्टाभि सीतारमैय्या की हार 
को अपनी हार बताकर अपने साथियों से कह दिया कि अगर वें सुभाष के तरीकों से सहमत 
नहीं हैं तो वें कांग्रेस से हट सकतें हैं। इसके बाद कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने
 इस्तीफा दे दिया। जवाहरलाल नेहरू तटस्थ बने रहे और अकेले शरदबाबू सुभाष के साथ रहे।
1939 का वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन त्रिपुरी में हुआ। इस अधिवेशन के समय सुभाषबाबू तेज 
बुखार से इतने बीमार हो गये थे कि उन्हें स्ट्रेचर पर लिटाकर अधिवेशन में लाना पड़ा।
 गान्धीजी स्वयं भी इस अधिवेशन में उपस्थित नहीं रहे और उनके साथियों ने भी सुभाष 
को कोई सहयोग नहीं दिया। अधिवेशन के बाद सुभाष ने समझौते के लिए बहुत कोशिश की
 लेकिन गान्धीजी और उनके साथियों ने उनकी एक न मानी। परिस्थिति ऐसी बन गयी कि
 सुभाष कुछ काम ही न कर पाये। आखिर में तंग आकर 29 अप्रैल 1939 को सुभाष ने 
कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
आजाद हिन्द फौज की स्थापना 
आजाद हिन्द फौज ने किस तरह फिरंगियों की कमर तोड़ी इसे पूरा विश्व जनता है। . भारत के सपूत सुभाष 
और गांधी दोनों में से मेरा माथा सुभाष बोस के लिये झुक जाता है।  

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