सोमवार, 5 जनवरी 2015

पंछी

पंछी


भोर की किरण में जब चहचहाता हुँ मैं,

सुबह होने का ख्याल दे जाता हुँ मैं । 

जब सुबह भरता हुँ उडान चुग्गे के खातिर,

तब ज्ञान कर्म का तुम्हें भी सुनाता हुँ मैं । 

साँझ ढले लौटा जब नीड़ की ओर,

तुम्हे भी घर लौट आने का कह

आता हुँ मैं । 

तेरी खुशीयों में सदा तेरे साथ रहा

तेरे आँगन में फुदकता नाचता रहा

मेरे गगन में उड़ने का न्योता दिया

मगर तुमने उसका मुझे क्या सिला दिया!!

मेरे आसमां में क्यों सजायी काँच लिपटी ये डोर,

समझा प्यार का धागा और दौड़ा उस ओर । 

कटे पर,लथपथ आ धरती पर घिरा

जाऊ छोड़ ये जगत पर मेरा दोष बता,

सजा ए मौत का फरमान तुने क्युं मुझको भेजा?


(पक्षियों की आवा जाही गगन में सुबह 6 -8 और शाम 5-7 बजे ज्यादा रहती है उस समय पतंगबाजी बन्द करके पक्षियों की जान बचायी जा सकती है)

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