सोमवार, 26 जनवरी 2015

भारतीय गणतंत्र और हिंदुत्व का विकास -

भारतीय गणतंत्र और हिंदुत्व का विकास -(विशेष -२६ जनवरी पर )

जब भारत का संविधान लिखा गया था तब भारत धर्म निरपेक्ष नहीं था। उस समय
हिंदुस्तान विभिन्न धर्मों का सरंक्षण करने वाला देश था। बाबा आंबेडकर ने इसलिए
संविधान में लिखा था कि सभी भारतीय नागरिक अपनी अपनी आस्था के अनुसार
स्वतंत्रता से अपने अपने धर्म का पालन कर सकता है यह हर भारतीय का मौलिक
नागरिक अधिकार है

1950 के समय हिन्दुओं में साक्षरता का अभाव था,बड़ी संख्या में हिन्दू निरक्षर थे.
वे उसी बात को सच मान लेते थे जो उसके नेता कहते थे। शास्त्री जी के काल में 
कुछ हद तक ठीक चला ( जवाहरलाल नेहरू के शासन काल को छोड़ते हुए )उसके
बाद इंदिरा गांधी का शासन आया और उन्होंने सत्ता को चलाने के लिए हिन्दू
समाज को तोडना चालू किया। हिन्दू धर्म को बातों से भ्रमित किया गया,उसकी
कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करके हिन्दुओं की जन्म आधारित
जाति व्यवस्था को अपनाया।

उस समय अस्पर्शनीय मानी जाने वाली जातियों को कानून बनाकर जन्म के
आधार पर दलित मान लिया गया और उन्हें विकास के लालच का झुनझुना
थमा दिया,नतीजा यह हुआ कि हिंदुत्व कमजोर हुआ और उसका फायदा इंदिरा
गाँधी को मिला।काश !उस समय दलित आयोग की जगह निर्धन आयोग बनता।

उसके बाद सत्ता पाने की खातिर अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति ,आदिवासी ,
अन्य जनजाति आदि जन्म आधारित व्यवस्था विकसित होती गयी. हिन्दुओ के
दिमाग को वॉश किया जाता रहा. हिन्दू अपने ही जाति के नेताओं से शोषित होता
रहा. हिन्दुओं से सिक्खों को,बौद्ध को और जैन जाति को तोडा जाता रहा.

दलित को आरक्षण का झुनझुना थमा कर हिन्दुओं की जन्म आधारित ऊँची जातियों
से द्वेष और भेद बढ़ाया जाता रहा. परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस की हिन्दुओं में
फूट डालो और राज करो की नीति सफल हो गयी और शासन पर काँग्रेस का
एकाधिकार हो गया

कांग्रेस का अधिकार टूटे नहीं और वंश परम्परा से भारत का शासन चलता रहे
इसके लिए धर्म निरपेक्ष राष्ट्र का अध्यादेश लाया गया.. धर्म निरपेक्ष का अर्थ
संविधान में यह बताया गया कि हर धर्म के प्रति तटस्थता।हिन्दुओं को फिर
मुर्ख बनाया गया और उसे मानवतावाद की घुट्टी पिलाई।जो हिन्दू कांग्रेस में
थे वे भी सत्ता सुख के लिए आम निरक्षर भारतीय को बेवकुफ बनाते गये।

उसके बाद काँग्रेस ने सत्ता को हाथ से निकलते देख धर्म निरपेक्षता को शुद्ध
मुस्लिम तुष्टिकरण में बदल दिया। संविधान को बहुमत चाहिए था और
बहुमत के लिए एक मजबूत फॉर्मूला बनाया गया - दलित हिन्दू ,अन्य दलित
वर्ग ,अनुसूचित जनजाति ,आदिवासी और मुस्लिम गठजोड़ के साथ जाती में
बँटकर वोट करने वाला सवर्ण हिन्दू। इसे आप समाजवाद भी कह सकते हैं.

काँग्रेस,समाजवादी,कम्युनिस्ट के लोग हिन्दू के जाग्रत होने पर सत्ता से दूर
होने लगा तो ये सब हिन्दुओं के बड़े वर्ग की उपेक्षा कर साँसद विधायक चुनने
के बाद सत्ता के लिए गठजोड़ करने लगे. इसका नतीजा यह हुआ कि देश के
धन को लूटा और दुरपयोग किया जाने लगा ,देश रसातल में डूबता गया.

देश को अब जागना होगा।बहुत टूट चुके अपने ही देश के नेताओं द्वारा।
हिन्दुस्थान के विकास के लिए हिंदुत्व का विकास जरुरी है. हिन्दू समाज को
जन्म आधारित व्यवस्था से बाहर निकल कर कर्म आधारित व्यवस्था लानी
होगी।अब उन्हें शूद्र करार दिया जाये जो सवर्ण जाति में जन्म लेकर भी कर्म
से सेकुलर ,पक्षपातवादी ,ढोंगी और स्वार्थी हो चुके हैं.

मेरा हिन्दुत्व एक जाति नहीं है बल्कि एक जीवन पद्धति है जो सर्वधर्म समभाव
में आस्था रखता है,परोपकार ,मानवता,करुणा दया,विकारहीनता,निडरता में
आस्था है.उसे ना तो  ईसा से द्वेष है,ना पैगम्बर से.. हिन्दू धर्म तो अच्छाइयों
का सागर है जो सब धर्मों के गुणों को समाहित कर लेता है                             





  
                 

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