नीति शास्त्र


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पतन का कारण 


हम सब सफलता चाहते हैं मगर फिर भी लक्ष्य दूर हो जाता है।लक्ष्य के दूर होने का
 कारण क्या है?

शास्त्र पतन के तीन कारण बताते हैं -1. लोभ  2. प्रमाद (आलस्य )3.विश्वास 

लोभ :- लोभ चाहे धन की प्राप्ति का हो,काम की प्राप्ति का हो या सम्पति की प्राप्ति का
     प्रारम्भ में आकर्षक लग सकता है मगर उसका अंत खराब ही रहता है।धन
    यदि बुध्धि से सात्विक प्रयत्न करके पुरुषार्थ से प्राप्त किया जाता है तो सफलता की
    पहचान होता है मगर प्राप्त धन का केवल संग्रह ही हो तो वह धन भी लोभ को बढ़ा
    देने में सक्षम हो जाता है और मन में असन्तुष्टि पैदा कर देता है।बहुत से चरित्रवान
    लोग सामाजिक,राजनैतिक या धार्मिक क्षेत्र में आते हैं और उन में से बड़ी संख्या में
   लोग उस क्षेत्र में आने का असल उद्धेश्य भूल जाते हैं और लालसा ,इच्छा ,लालच के
   चक्रव्यूह में फँस जाते हैं।लोभ जैसे ही उन पर बलवान होता है उनसे अनैतिक काम
   करवा लेता है परिणाम यह होता है कि वे मृत्यु तुल्य दू:ख भोगते हैं।
                   धन कमाना अच्छी बात है परन्तु उसका सदुपयोग करना उससे भी अच्छी
  बात है।धन के सदुपयोग का आडम्बर भी दू:ख देता है,मन को अशांत कर देता है।कीर्ति
  और वाहवाही का लोभ भी शान्ति नहीं देता चाहे क्षेत्र परमार्थिक भी क्यों न हो।

               काम का लोभ नाना प्रकार के बन्धनों में डाल देता हैऔर अपयश का कारण
   बनता है।काम का लोभ रावण की मौत का कारण बना,काम के वशीभूत होकर कामी
  दुराचार में रच जाता है और समाज में अशांति उत्पन्न कर खुद अपराधी का जीवन
  भोगता है

          जमीन,सम्पति का लोभ महाभारत के भयानक युद्ध का कारण बना।ताकत के बल
   पर,अन्याय के जोर पर,बाहुबल का भय पैदा कर सम्पति का अर्जन कभी भी सुखद
   भविष्य नहीं देता है


प्रमाद (आलस्य):-  हर काम में प्रमाद की आदत बना लेना पतन का मार्ग है।प्रमाद समय
    के मूल्य को नहीं पहचानता है और समय पुन: आता नहीं है। प्रमाद किसी भी उम्र में हो
    हानि ही पहुंचाता है।विद्यार्थी यदि प्रमाद करता है तो अकुशल रह जाता है,व्यापारी यदि
    प्रमाद करता है तो हानि सहता है,राजा यदि प्रमाद करता है तो सत्ता दुश्मन के हाथ चली
   जाती है, सेवक यदि प्रमाद करता है तो दण्ड का भागी बनता है।परिवर्तन का होते रहना
  एक सिद्धांत है और उसको रोकने की चेष्टा प्रमादी ही करता है जो कुचेष्टा के भयंकर
  परिणाम भी भोगता है।वेद चरेवेति -चरेवेति का मन्त्र देते हैं।विवेका नन्द उठो!जागो!का
  मन्त्र देते हैं।प्रमाद नहीं करने वाला सामान्य प्राणी है और सामान्य गति ही रख पाता है
तो भी देर सवेर लक्ष्य को पा लेता है।


विश्वास  :- विश्वास  एक विराट शब्द है और उसका सही अर्थ नहीं करने पर पतन का
     कारण बन जाता है। सम्यक विश्वास ,अति विश्वास ,अंध विश्वास या शंका का
     स्वभाव ; इन सब में विश्वास सम्यक होना चाहिए सजग होना चाहिए। विश्वास
    तराजू है ,किसी पर भी विश्वास करने से पहले उसे विश्लेषण पर रखना चाहिए,
    परखना चाहिए,तथ्यात्मक जाँच करनी चाहिए।अति विश्वास आत्मघाती होता
    है ,अंध विश्वास मृत्यु तुल्य परिणाम देता है और शंका का स्वभाव तुच्छ  बना
    देता है।


यदि हम सफल होना चाहते हैं तो इन पर सतत निगाह रखनी चाहिये।              


17/9/2012
सार्थक  प्रयत्न 

दौ मित्र जंगल से निकल रहे थे।थोड़ी देर चलने के बाद एक सरोवर से पहले उन्होंने दौ पेड़ देखे।
एक पेड़ सूख कर ठूँठ में बदल चूका था और दूसरा पेड़ अभी नव पल्लवित था।ठूँठ को देख कर
पहला मित्र बोला - देखो,यह पेड़ भयंकर ताप और पानी नहीं मिलने के कारण सूख चुका है।हमें
प्रयत्न पूर्वक इस पेड़ की सेवा करनी चाहिए ताकि यह फिर से हरा-भरा हो सके।
  दुसरा बोला- मित्र, यह पेड़ पूर्णतय सूख चुका है इसलिए इसका हरा-भरा होना अब नामुमकिन
है। हमें छोटे नवपल्लवित पेड़ की देखरेख करनी चाहिए ताकि यह सघन छायादार पेड़ बन सके।
  पहला बोला-नहीं, इस पेड़ का बिता हुआ काल निश्चित रूप से बढ़िया रहा होगा।यह पेड़ ना जाने
कितने पथिकों को ठंडी हवा दे चुका होगा,इसकी देखरेख ठीक रहेगी।
   दुसरा बोला- तुम्हारी बात सही हो सकती हैमगर अब इसमें जीवन का कोई चिन्ह दिखाई नहीं
देता इसलिए इसे काट कर जलाने या लकड़ी के सामान बनाने के काम में लेना चाहिये।
  पहला मित्र बोला- तुम स्वार्थ भरे नजरिये से इसे देख रहे हो।मैं कोशिश करूँगा कि यह ठूँठ पहले
की तरह हरा-भरा हो जाए ,मैं इसे रोज जल और समय पर खाद दूँगा।
   दुसरा मित्र बोला- मैं इस नवपल्लवित हो रहे पेड़ की सुरक्षा के लिए बाड़ लगाऊंगा और समय-
समय पर जल और खाद दूँगा।
     दोनों मित्र अपने-अपने श्रम से ठूँठ और नए पेड़ की सेवा में लग गये। कालान्तर में सुरक्षा और
समय पर जल तथा खाद पाकर नया पेड़ फलने-फूलने लगा और ठूँठ खाद और पानी पाकर भी वैसा
ही बना रहा।
   दुसरे मित्र के पेड़ को फलता-फूलता देख कर पहला मित्र निराश हो गया।वे दोनों एक नीतिज्ञ के
पास गये और सारी बात बता दी।
  नीतिज्ञ ने कहा -आप दोनों ने पूर्ण प्रयत्न किया है मगर एक को उचित सफलता मिली और एक को
कर्म करने के बाद भी असफलता हाथ लगी।सफल होने वाले मित्र ने भविष्य की ओर देखा और प्रयत्न
किया जबकि असफल होने वाले मित्र ने भावावेश में निर्णय लिया और अच्छे भूतकाल से बंधा रहा।
इसलिए भूतकाल की जगह सफल होने के लिए भविष्य पर नजर रखो क्योंकि समय परिवर्तन शील
है और उसके साथ चलने में ही बुद्धिमत्ता है,लकीर के फकीर बने रहने से कुछ हासिल नहीं किया जा
सकता है।

नीति - कार्यनुरूप: प्रयत्न: 

सार-   प्रयत्न कार्य के अनुरूप होने पर ही सफलता मिलती है।   
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15/9/2012
शत्रु का उपकार वाला व्यवहार भी विषकुम्भ 

एक किसान के खेत में एक साँप रहता था।उस साँप से किसान और उसका परिवार हमेशा
भयभीत रहता था। किसान बहुत से उपाय कर चुका मगर वह साँप को पकड़ नहीं सका।
किसान जब भी उस साँप को पकड़ने के लिये दोड़ता साँप फुफकार करके उसे भयभीत कर
देता और तेजी से रेंगकर अपनी बाम्बी में घुस जाता।
          एक दिन एक सपेरा किसान के खेत के पास से गुजरा। किसान ने खेत में साँप रहने
की बात उस सपेरे को बतायी और साँप से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। किसान की प्रार्थना
सुन सपेरे ने कहा -मुझे साँप की बाम्बी दिखा दो ,मैं साँप के भय से तुम्हें मुक्त कर दूंगा।
          किसान उस सपेरे को साँप की बाम्बी के पास ले गया तथा सांप की बाम्बी को खोदने
के औजार भी ले आया। सपेरे ने किसान से पूछा -तुम ये सब औजार किस लिए लाये हो ?
   किसान बोला- इन औजारों का उपयोग करके आप आसानी से साँप को पकड़ सकते हैं।
सपेरा बोला- साँप की बाम्बी खोदने से वह पकड़ा जाएगा ,यह सम्भव नही है। मैं साँप का
जन्मजात दुश्मन हूँ और मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि दुश्मन के साथ कब,कैसा व्यवहार
करना चाहिये।
        सपेरे की बात सुनकर किसान चुप हो गया। सपेरे ने किसान को कहा -तुम इस बाम्बी
के पास में पानी का छिडकाव कर दो और कटोरा भरकर दूध ले आओ।किसान ने बाम्बी के
पास जल छिडकाव कर दिया और दूध भी रख दिया।
      वातावरण में ठंडक देख कर साँप प्रसन्न हुआ।बाम्बी के अन्दर दूध की महक भी पहुंच
रही थी। साँप का मन बाम्बी से बाहर निकलने का हो रहा था लेकिन वह आशंकाग्रस्त हो
गया कि जी किसान रोज उसके पीछे भागता है वह कोई चाल तो नहीं चल रहा है ?
     थोड़ी देर बाद सपेरे ने किसान से कहा - तुम अब यहाँ से हट जाओ ,क्योंकि साँप तुम्हारी
गंध के कारण बाहर नहीं आयेगा।किसान के वहां से हट जाने के बाद सपेरे ने अपने झोले से
पुंगी निकाली और मधुर तान छेड़ दी।
     साँप पहले से ही वातावरण में ठंडक और दूध की खुशबु से बाहर निकलना चाहता था
मगर किसान के शरीर की गंध की वजह से नही आ रहा था।अब किसान भी वहां से चला
गया था इसलिए उसका मन बाहर निकलने को हो रहा था। सपेरे की पुंगी से निकलने वाली
मादक तान से सांप मस्त हो गया।
      साँप असमय में प्राप्त हो रही ठण्डक ,दूध पिने के लोभ और कर्णप्रिय धुन पर नाचने के
मौह के वशीभूत होकर बाम्बी से बाहर निकल कर सपेरे की पुंगी की धुन पर थिरकने लगा।
सपेरे ने देखा कि साँप पूरी तरह पुंगी की धुन में मस्त हो गया है तो फुर्ती से सांप की फण को
पकड लिया। साँप सपेरे की मजबूत पकड में छटपटा रहा था।

नीति - अप्रिये कृतं प्रियमपि द्वेष्यं भवति
           शत्रु के मीठे दीखने वाले बर्ताव को विष्कुम्भ के समान अनर्थकारी ही मानना चाहिये।                    


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जो पुत्र अपने पिता का कार्य बिना आज्ञा के रूचि देखकर ही प्रसन्नता पूर्वक करने लगता है 
वह "उत्तम"माना जाता है .जो पिता के आदेश को मानकर कार्य करने वाला पुत्र "मध्यम"
माना जाता है .जो पिता के कहने पर भी कार्य नहीं करता उससे दूर रहता है वह "अधम"
माना जाता है .


भावार्थ - शास्त्रों में पिता के प्रति पुत्र के कर्तव्य के बारे में आज्ञाकारी होने को मध्यम और पिता की
रूचि देखकर कार्य करने वाले को उत्तम मन गया है .आज के इस पश्चिमी सभ्यता के अन्धानुकरण
से पिता उत्तम और मध्यम पुत्र भी खोते जा रहे हैं.माता-पिता की आज्ञा की अवहेलना करते पुत्र
ज्यादा हो गए हैं .दादा -पिता को पौत्र और बेटे के जन्म पर ख़ुशी होती है ,उनकी ख़ुशी जायज भी है
क्योंकि पुत्री धन को दुसरे परिवार में ब्याह देने के कारण उसे उन्ही गुणों और सिद्धांतो से तालमेल
करके जीना होता है मगर पुत्र को एक पिता अपने कुल के अनुसार आचरण करता देखना चाहताहै,
उसको आदर्श सिद्धांतो के तले गढ़ कर सँवारना चाहता है .पुत्र पिता के वंश को आगे बढाता है।
पिता या दादा के इहलोक में नहीं रहने पर भी अप्रत्यक्ष रूप से उनके नाम को जीवित रखता है .
यह एक बड़ा कारण है कि पुत्र रूपी धन हर पिता को पुत्री धन से भी प्यारा होता है
          पुत्र के सुखद भविष्य के लिए हर पिता जीवन भर कार्य करता रहता है .जब पुत्र छोटा होता
है तब से लेकर उसके युवा होने तक पिता अध्यव्यवसाय करता रहता है .पुत्र को अच्छी शिक्षा
मिले उसको खाने पीने की असुविधा ना हो ,उसे एनी सुविधाए भी उपलब्ध कराने की एक पिता
भरपूर कोशिश करता है ,अपने सुख साधनों की परवाह  न करके पिता पुत्र के लिए साधन जुटाने
में अविरत लगा रहता है .यह हमारे सामाजिक ढांचे में हर जगह देखा जा सकता है .
          पुत्र जब युवा होता है तब उसके लिए यह संसार नवीनता लिए होता है ,उसे सबकुछ अपने
अनुकूल कार्य ही पसंद आते हैं .वह स्वच्छंद विचरना चाहता है और इस दुनियाँ को खुद के हिसाब
से परखना चाहता है .एक पिता को तब लगता है कि पुत्र सही मार्ग पर नहीं है तब वह उसे
अनुशासित करना चाहता है ,युवा पुत्र को पिता की टोकाटोकी अनुचित अड़चन लगती है .वह उनको
पुराने ख्यालात का व्यक्ति मान कर उनकी अवहेलना कर देता है .यही से पिता-पुत्र में संघर्ष की
उत्त्पति होती है .पिता चाहता है उसका पुत्र उसके अनुभवों का लाभ उठाता हुआ सही गलत की
पहचान सीख ले,उन्ही कर्मों में सलग्न हो जिसमे परिवार का गौरव बढे और पुत्र की जग में सराहना
भी हो .
   पुत्र उनके भावो को समझने में जब असफल हो जाता है और अपनी मनमर्जी पर उतारू हो जाता है
तब पिता पुत्र के संबंधो में ओपचारिकता आ जाती है .पुत्र की अवहेलना को झेलने वाला बाप
अवसादग्रस्त जीता है ,ऐसे पुत्रो का शास्त्र में अधम कहा गया है .

     युवा  कैसे बन सकते हैं उत्तम पुत्र  
 उत्तम पुत्र बनने के लिए युवा को यह समझना पडेगा कि उसके पिता ने उसको योग्य 
बनाने के लिए कितना परिश्रम किया है,कितनी तकलीफे सहन की है ,किस तरह से 
अपनी सुख सुविधाओं को कम करके उसे प्रदान की है .यदि हर पुत्र इस बात पर विचार 
करने लग जाए तो पिता के त्याग को आसानी से समझ सकता है और उनकी रूचि के 
अनुसार उनके अनुभवों का लाभ लेते हुए अच्छी जिन्दगी जी सकता है .


   जो पुत्र पिता की रूचि को समझने में असमर्थ रहे तो उसे प्रेम पूर्वक पिता के कहे 

वचनों का पालन करना चाहिए ,यदि युग परिवर्तन समस्या बन रहा हो तो पुत्र को 
चाहिए की अपने पिता के सामने नम्रतापूर्वक नए युग के विचार भी रख दे ताकि पिता
 भी विस्तृत नजरिये से बात को समझ सके और पुत्र को सन्मार्ग दिखा सके .


  पिता को ,माता को,दुःख पहुचाने वाला पुत्र क्या सुखी रह सकता है?क्या उसकी संतान

 उसके साथ जैसा पिता ने अपने पिता के साथ किया वैसा ही व्यवहार नहीं करेगी? पुत्र 
अपने माता पिता को अपनी सुख सुविधाओं में बाधा समझ कर वृद्धाश्रम में छोड़ देंगे तो 
क्या आने वाली पीढ़ी उनको घर से बाहर का रास्ता नहीं दिखाएगी ?फिर हम अपना पतन 
क्यों चाहते हैं?
यदि पुत्र गलतीवश  माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार कर चूका है तो भी अपने माता-पिता
 के सामने प्रायश्चित  कर ले तो अपना और परिवार का जीवन संवार सकता है.    
  



























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