कथा - सागर

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सौभाग्य है कि आप इस पछतावे से दूर हैं 

वे गाँव के बुजुर्ग थे शायद अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख पाते हैं। आज की
वर्तमान टेक्नोलॉजी की बिलकुल जानकारी नहीं रखते हैं। उनके पास बैठा मैं
बतिया रहा था। बातों ही बातों में मैने उनसे पूछा -बाबा,क्या आपको अब तक
जी हुयी जिंदगी से संतुष्टि है ?
बाबा बोले -बेटे ,हर मनुष्य भूलों का पुतला है। मैनें भी एक भूल की जिसका
पछतावा है ?
मैनें पूछा-क्या वह बात मुझे बता सकते हैं ?
बाबा बोले -क्यों नहीं,वह बात बताने से मेरा मन भी पश्चाताप करके हल्का हो
जायेगा और कोई उससे सीख भी लेगा।
थोड़ी देर बाद उन्होंने कुछ याद करते हुए कहना शुरू किया -बेटा ,जब मैं दौ
साल का था और ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता था तब मेरे पिता जवान थे
उन्होंने मुझे खड़ा होना सिखाया और जब मैं लड़खड़ाते हुए डग भरना सीखता
था तो उनके मजबूत बात मेरी पीठ की तरफ सुरक्षा कवच बन कर तैयार
रहते थे। उनके कारण मैं दौड़ना सीख गया। वो मुझे जब भी मन्दिर ले जाते
थे तब मैं भगवान के दर्शन नहीं कर पता था तब वे अपने कन्धे पर बैठा कर
दर्शन करवा देते थे। जब मैं उनके साथ मेले में जाता था कुछ कदम चल कर
भीड़ देख घबरा जाता था तो वे बिना झिझक के मुझे पुरे मेले में कंधे पर या
गोदी में सवारी कराते थे। मेरे पिता कभी कभार कमीज पहनते थे ,प्राय :
बनियान ही पहनते थे कारण उनके पास आमदनी काम थी मगर मेरे लिए
३-४ कमीज हर साल लाते थे। जब मैं किशोर आयु का हुआ तो उनका प्रयास
रहता था कि मैं अच्छा पढ़ लिख जाऊँ मगर मैं पढता नहीं था केवल स्कुल
जाने का ढोंग रचता था,मेरी असफलता के समय वो मेरा हौसला बढ़ाते और
पढ़ने को प्रोत्साहित करते मगर मैं उन्हें धोखा दे देता। मेरी स्कुल बंद हो
गयी और मैं उनके साथ खेत पर जाने लगा। कुछ साल बाद मेरी शादी कर
दी ,उस समय उन्होंने जितनी पूँजी जमा की थी सब मेरी शादी में खर्च कर दी।

कुछ साल बाद मेरे बच्चे हो गए और मेरे पिता बूढ़े हो गये। अब वो खेत का
काम नहीं कर पाते थे तब मुझे लगता कि सारा काम का भार मुझ पर डाल
अब ये आराम फ़रमाते हैं। उन्हें बैठे देख बहुत बार मैं उन्हें झिड़क देता वो
मेरी कठोरता से उदास हो जाते और कभी कभी शुन्य में ताकने लगते। मेरी
पत्नी को वे अप्रिय लगते थे क्योंकि वे दिन भर खाँसते रहते या उसके गैर-
बर्ताव पर चिल्ला उठते। पत्नी जब उनकी शिकायत मुझसे करती तो मैं उन्हें
खूब भली बुरी सुनाता  .... कहते हुये बुजुर्ग का गला भराने लगा। बूढी आँखों
में आँसू आ गए थे। मैं उनकी ओर ताक रहा था। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद
वो बोले -कुछ साल बाद मेर पिता को आँखों से दिखना बंद हो गया ,मुझे
लगा अब आफत गले पड गयी है। उनको पाखाने लेकर जाना ,नहलाना
जैसे काम बढ़ गए थे। मेरी पत्नी उनके मरने की राह देखने लगी। उन्हें
दौ समय खाना भी रुखा सुखा दिया जाने लगा मगर वो कभी शिकायत नहीं
करते थे। कुछ महीने बीमार रह कर वो स्वर्ग सिधार गए उस समय मैं
50 साल का हो चूका था। मुझे उनकी मौत पर बहुत कम अफ़सोस और मन
में सुकून ज्यादा था। अब मैं अपनी गृहस्थी में लग गया। मेरे बच्चे पढ़ लिख
गए थे और देखते ही देखते मेरे बाल सफेद हो गए ,हाथ पैर जबाब देने लगे
अब मेरे साथ भी वही होने लगा जो मेने अपने पिता के साथ किया था।
एकाद बार बच्चो और बहु से अच्छा व्यवहार करने को कहा तो लड़के ने जबाब
दिया -आपने कौनसा सेवा का काम अपने बाप के लिए किया। बस तब से
मुझे पछतावा होता है कि काश!मेने माँ -बाप की सेवा और इज्जत की होती
मगर…… अब समय चला गया हाथ से।  

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संवेदना 

सेठजी अपने आलिशान ऑफिस में बैठे अपने व्यवस्थापकों से राय मशवरा कर रहे थे।
चर्चा का विषय था कि उनकी प्रतिस्पर्धी कम्पनियों को किस तरह तहस नहस कर उनके
बाजार पर कब्जा जमाया जाये।सभी सलाहकार अपनी -अपनी योजनाये बता रहे थे।

आखिर में सर्वसम्मति से ये निर्णय लिया गया की सबसे पहले छोटी कम्पनियों को रास्ते
से हटाना है और जब तक वे तहस -नहस नहीं हो जाती तब तक माल की बिक्री लागत से
कम दाम पर करते जाना है और उनके हटने के बाद उनके व्यापार को हड़प कर लेना है।

सेठजी फुल प्रूफ योजना बना कर काफी संतुष्ट नजर आ रहे थे क्योंकि भविष्य में उनकी
कम्पनी छोटी कम्पनियों को रोंद कर आगे बढ़ने वाली है।

शाम को जब खुश मन से घर लौटे तो पत्नी को उदास पाया।उन्होंने पत्नी से तनाव का
कारण पूछा तो पत्नी ने बताया कि घर पर कपडे धोने वाली नौकरानी बीमार है और उसके
स्वस्थ होकर आने में काफी समय लगने वाला है।

सेठजी बोले -तो इसमें तनाव की क्या बात है,कपडे धोने का काम किसी और नई नौकरानी
को दे दो ,हमे तो पैसा देकर किसी से भी काम करवाना है।

सेठानी बोली -मेने भी यही सोचा था और दूसरी काम करने वाली नौकरानियों से बात भी
की थी मगर वो सब कहती है कि उसका काम हम कैसे ले ? वह विधवा है और उसके छोटे
बच्चे हैं अगर उसका काम हमने ले लिया तो वह अपना और बच्चों का पेट कैसे भरेगी?

सेठजी बोले -इन छोटे लोगों में बुद्धि कम होती है इसलिए ये गरीब ही रह जाते हैं तुम एक
दौ दिन में नयी कामवाली रख लो।उस दिन बात आई गयी हो गई और अगले दिन सेठजी
जब ऑफिस से शाम को घर लौटे तो पत्नी के चेहरे पर प्रसन्नता पायी।उसे प्रसन्न देख
कर उन्होंने पूछा -क्या नयी नौकरानी मिल गयी ?

उत्तर में सेठानी ने कहा -नयी तो नहीं मिली पर आस पास के घरों में काम करने वाली
नौकरानियों ने हल खोज लिया जिससे पुरानी नौकरानी का काम भी बना रहेगा और वह
नहीं आती है तब तक अपना काम भी हो जाएगा ?

सेठजी ने पूछा -वो कैसे होगा ?

सेठानी ने कहा -बाकी काम वालियों ने तय किया कि जब तक बीमार काम वाली स्वस्थ
होकर नहीं आ जाती तब तक उसका काम वे सब बारी बारी से करती रहेगी और उसके
काम की तनख्वाह भी उसे दे देगी ताकि उसके घर का चूल्हा जलता रहे।

सेठजी ये सुन कर भोंचक्के रह गए !        
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दिवाली पर बेटा घर ले चलेगा ....!!

 एक दिन बाद ही दिवाली है ,आज वृद्धाश्रम में बूढ़े चेहरों पर ख़ुशी है,अपने घर को देखने
की उत्कंठा है। कुछ वृद्ध माताओं ने अपनी गठरियाँ भी तैयार कर ली है।साल भर में जिस
भी दान दाता ने उपयोगी चीज दान की थी उसको उन्होंने साल भर तक सहेज के रखा था,
आज वे सब सामान गठरियों में बाँध लिए हैं।कुछ अच्छी साड़ियाँ बहु के काम आ सकती
है कुछ गृह उपयोगी सामान घर में काम आयेंगे,अपने घर को देखने की तमन्ना ......कितने
ख़्वाब पले हैं बूढ़े मन में ................

            जिस घर को अपनी मेहनत से बसाया था,खुद अभावों में जी कर बच्चो को पाला
पोसा,योग्य बनाया ताकि बच्चे अभावों में नहीं जीये।उनकी मेहनत रंग लायी और पुत्र
योग्य बन गए,सरकारी नौकरी लग गयी।माँ -बाप खुश हो गए की अब उनके संघर्ष के
दिन खत्म हो चुके हैं ,पुत्र काम पर लग गया है ,शीघ्र शादी तय कर देंगे ,घर में काम
करने के लिए बहु आ जायेगी ,बेटे का घर बस जाएगा और उनका बुढापा सँवर जाएगा।

        बेटे के लिए रिश्ता भी अच्छा आया ,लडकी पढ़ी-लिखी थी और स्कुल में अध्यापिका
थी।बेटे की स्वीकृति के बाद शादी तय कर दी।शादी के एक सप्ताह के बाद ही समय ने
करवट बदलनी शुरू कर दी।बहु सुबह स्कुल चली जाती और बेटा दफ्तर ,उनके लिए
खाने पीने की जबाबदारी बुढ़ी माँ पर।दिन गुजरते गये और एक दिन बुढा चल बसा,अब
बुढिया अकेली रह गयी।काम भी घर का ठीक से कर नही पा रही थी।बेटे और बहु की
दिनचर्या माँ की खराब सेहत के कारण बिगड़ने लगी। बहु और बेटे ने उपाय निकाला
और माँ  से कहा- माँ ,आपकी तबियत ठीक नहीं रहती है और हम दोनों आपको समय
भी नहीं दे पा रहे हैं।

 माँ ने कहा -आप लोगो ने सही कहा है।मेरा ख्याल है बेटे ,कि अब बहु को नौकरी छोड़
घर सम्भाल लेना चाहिए ताकि मेरी सेवा भी कर लेगी और घर भी संभाल लेगी।

बेटे ने कहा- माँ ,ऐसा संभव नहीं है,इसकी कमाई से घर चल जाता है और मेरी कमाई से
बचत हो जाती है।इसके घर बैठ जाने से मेरी बचत खर्च हो जायेगी इसलिए हमने सोचा
है कि आपके रहने का प्रबन्ध शहर के वृद्धाश्रम में कर देवे,वहां खाने-पीने का मामूली
चार्ज है जो हम भर देंगे।आप वहां आराम से रहेंगी।

   माँ ने अनमने मन से घर छोड़ा और नए घर में पहुँच गई।अब बेटा साल में एक बार
दिवाली के एक दिन पहले आता है और दिवाली के दुसरे दिन माँ को फिर से वृद्धाश्रम
छोड़ देता है।काफी सालों से ऐसा चल रहा है।

        माँ साल में एक दिन अपना घर देख कर खुश हो जाती है और जब बेटा उसे दिवाली
के दुसरे दिन वापिस छोड़ने आता है तो अश्रु भरे नेत्र से इतना जरुर पूछ लेती है -अगली
बार भी दिवाली पर मुझे एक दिन के लिए लेने आओगे ना पुत्र !

          घटना पूर्ण रूप से सत्य है,नाम और स्थान की जानकारी की जरूरत नही लग
रही थी ,मगर एक प्रश्न मन में उठता रहता है-क्या वर्तमान युग में पुत्र  के कर्तव्य इतने
असंवेदनशील ही बन जायेंगे,आखिर ये आपाधापी हमें कहाँ ले जायेगी ......!!!         


--------------------------- ये कैसा फर्ज 

माँ -बाप के प्रति श्रद्धा मेरे देश में कम होना मन को ठेस पहुँचाता है।पुत्र की कामना के
लिए भगवान् की चोखट पर मन्नत मांगने वाले माँ -बाप जब पुत्र पा जाते हैं और उसमे
अपने सुखद बुढ़ापे के सपने देखते हैं तो उन्हें सुकून मिलता है।बच्चों के लिए अपनी
हर सुविधा को न्योछावर कर जब वे बूढ़े हो जाते हैं। यदि  उनका जवान बेटा उनके सपनों
को निर्ममता से तहस -नहस कर देता है तो उनके दिल पर क्या गुजरती होगी ,इस बात
को महसूस करने के लिए  एक छोटा सा वृत्तांत दे रहा हूँ जो सत्य है-

               बात करीब दस साल पुरानी है।मेरे एक परिचित मुलत: राजस्थान के रहने
वाले हैं।उनके पिताजी ने इकलोते बेटे के लिए जीवन भर पुरुषार्थ कर पाई-पाई जोड़ी
और बेटे को सुरत में कपड़े की थोक व्यापार की दूकान करवा दी। बाप के द्वारा मिले
धन से बेटा सुरत में सेट हो गया और अपने व्यापार को काफी फैला लिया।

              एक दिन मैं उनकी दूकान पर बैठा था तब उनके गाँव से उनके पिताजी की
चिट्ठी आई।उन्होंने चिट्ठी पढ़ी और मुझे बताया कि उनके पिताजी की तबियत ठीक
नहीं है और उन्हें मिलने के लिए गाँव बुलाया है।

            मेने कहा-आपको गाँव पड़ेगा ,क्योंकि आप उनके इकलोते बेटे हैं?

उन्होंने कहा- बात तुम्हारी सही है परन्तु इस समय सीजन चल रही है।शादी ब्याह का
समय है।इस समय कपड़े में काफी बिक्री रहेगी और गाँव चला गया तो 15-20दिन लग
सकते हैं ऐसे में उन्हें संभावित बिक्री से होने वाले फायदे से वंचित रहना पडेगा।

मेने कहा- लेकिन आपके पास कोई विकल्प भी नहीं हैं ?

वो बोले- एक विकल्प है ,मैं उन्हें 20000/- का ड्राफ्ट भेज देता हूँ,शायद उनके पास पैसे
नहीं होंगे इसीलिए बुला रहे होंगे।पैसे मिल जाने से वे अपना इलाज करा लेंगे।

  बात यहीं पर हम दोनों के बीच उस दिन आई गई हो गयी और अगले दिन उन्होंने
20000/- का बैंक ड्राफ्ट बना कर गाँव भेज दिया।

       8-10के बाद उनके पास गाँव से रजिस्टर्ड पोस्ट से एक लिफाफा आया जो उनके
पिताजी ने भेजा था उन्होंने उस पत्र को पढ़ा और मुझसे कहा- मेरे पिताजी एकदम
बचकाना हरकत कर रहे हैं।मैने उनको 20000/-भेजे, उन्होंने वापिस लौटा दिए हैं।

मेने पूछा- ......वापिस क्यों लौटा दिए ?कुछ लिखा होगा ?

वो बोले- हाँ ,लिखा है ....और उन्होंने वह पत्र मुझे दे दिया। मेने उस पत्र को पढ़ा।
उसमे लिखा " बेटे,तुम्हारा जबाब मिला और साथ में ड्राफ्ट भी।मेने अपनी तबियत
अस्वस्थ थी इसलिए तुझे गाँव आने का लिखा था।तूने जो रूपये भेजे हैं वो तो मेरे ही
दिए हुए थे उसका कोई तकाजा मेने नहीं किया इसलिए ये रूपये वापिस भेज रहा हूँ।
मेने तो अपने बेटे को बुलाया था जो इस अवस्था में मुझे सहारा दे सकता था लेकिन
पैसे कमाने की चिंता मेरे स्वास्थ्य से बढ़कर है तेरे लिए,यह जानकार मुझे दु:ख हुआ।
तुम वहां सुखी रहो ,मेरी चिंता मत करना।मैं जैसे तैसे अपनी गाडी चला लूंगा।

    मेने वह पत्र अपने परिचित मित्र को वापिस दे दिया।कुछ दिनों बाद मालुम चला
कि मेरे परिचित व्यापारी के पिता का देहांत गाँव में हो चूका है और उनका इकलोता
बेटा  सुरत से सपरिवार अंतिम संस्कार के लिए गया है।

     यह घटना मुझे झकजोर गयी थी।मेरे भारत की यह तस्वीर कैसे बन गयी क्योंकि
मेरी संस्कृति सिखाती है-मातृ देवो भव: पितृ देवो भव: ....कहाँ खो गयी वो भावनाएँ ......                 






01.08.2012
संगत का असर 

एक वाटिका में कुछ गमलों में काफी पौधे लगे थे .एक श्रद्धालु महिला नियम पूर्वक उस
वाटिका में आती और तुलसी के गमले में लगी तुलसी की रोली  अक्षत से पूजा करती .
एक बच्चा नियमित रूप से उस महिला को पूजा करते देखता था .एक दिन उसने उस
महिला से पूछा -आंटी ,आप रोज किसकी पूजा करने आती है ?
महिला ने जबाब दिया-तुलसी की .
बच्चा बोला - आंटी, आप तुलसी की पूजा करती हैं या उसके बिलकुल पास में लगे ग्वार भाटे
के पौधे की ....
महिला ने देखा वह प्रतिदिन जिस गमले में लगी तुलसी की रोज पूजा करती है उस गमले के
पास में ग्वार भाटे का गमला रखा है ,जब वह तुलसी के रोली और अक्षत चढ़ाती है तब पास
के गमले में लगे ग्वार भाटे के पौधे पर भी रोली के छींटे लग जाते थे और अक्षत भी उस पर
गिर जाते थे .उस महिला ने बच्चे को अपने पास बुलाया और कहा -बेटा,मैं पूजा तो तुलसी की
ही प्रतिदिन करती हूँ परन्तु पास के गमले पर रोली और अक्षत अनजाने में ही लग जाते हैं ,
तुम इससे एक बात सीख सकते हो ?
बच्चा बोला- मैं क्या बात सीख सकता हूँ ?
महिला बोली- अच्छे लोगो की संगत करना .ये ग्वार भाटे का कंटीला पौधा तुलसी की संगती में
रहने के कारण अकारण ही पूजा जाने लगा ,यदि मनुष्य सिर्फ अपनी संगती सुधार ले और
सज्जन और विद्धवानो की संगती में रहने लग जाए तो संसार में पूजा जा सकता है .


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चरित्र परिक्षण 

एक छोटी सी घटना का वर्णन आपके सामने करना चाहूंगा .मेरे मार्केट परिसर में मेरे भतीजे की
जेब से पर्स गिर गया था उसमे पाँच हजार रूपये थे .कुछ समय बाद मेरे भतीजे को जब अहसास
हुआ कि उसका मार्केट परिसर में पर्स गिर गया है तो उसने मार्केट सिक्युरिटी को जानकारी दी
मगर कुछ पता नहीं चला और बात एक -दौ दिन में आई गयी हो गयी .
          अब इस छोटी सी बात के मूल तत्व पर आता हूँ .मार्केट परिसर में गुम हुआ पर्स एक हमाली
करके पेट पालने वाले गरीब युवा को मिल गया ,उसने उस पर्स को खोलकर देखा पर्स में पुरे पाँच
हजार रूपये थे .वह हमाल युवक उस पर्स को लेकर असमंजस में फँस गया .पांच हजार रूपये उसकी
मासिक मजदूरी से ज्यादा ही थे इन रुपयों को वह रख सकता था मगर उसकी आत्मा ने यह बात
स्वीकार नहीं की .वह हमाल चाहता था कि ये रूपये उसके असली मालिक के पास पहुँच जाए ,मगर
असली मालिक की खोज वह कैसे करे ?यह बात उसकी समझ में नहीं आयी .थोड़ी देर चिंतन मनन
कर के वह मार्केट के पूर्व कार्यकारिणी मेंबर जो कि उसी मार्केट के प्रतिष्ठित व्यापारी भी थे ,उनके
पास गया और सारा वृत्तांत कह सुनाया .
         पूरा वृत्तांत सुनकर उस  पैसेवाले  प्रतिष्ठित व्यापारी ने हमाल से पूछा -तुम क्या चाहते हो ?
हमाल ने उनसे कहा -सा'ब ,जिनका पैसा गिर गया है उसे ढूंढने में आप मेरी सहायता करे .आप
मार्केट ऑफिस में जाकर घोषणा करवा दे कि किसी भी भाई का पर्स खो गया हो तो वह पर्स में
रखे सामान और पैसों की गिनती बता कर आपकी दूकान से ले जाए .
        उस प्रतिष्ठित व्यापारी ने हमाल से कहा-ऐसा ही होगा ,मैं मार्केट में घोषणा करवा दूंगा .वह
हमाल आत्म संतुष्टि के भाव से उस व्यापारी का धन्यवाद अदा किया और अपने रोजमर्रा के काम
में लग गया .
          अब शुरू होती है चरित्र परिक्षण की बात .उस व्यापारी ने सोचा -हमाल के किस्मत में लक्ष्मी
कहाँ ?गधे को  पैसे से भरा पर्स मिल भी गया तो मालिक को खोजने चला आया .मार्केट में घोषणा
क्यों करू? क्यों नहीं ये पैसे मैं खुद ही रख लूँ .यह सोचकर उस पैसेवाले व्यापारी ने मार्केट ऑफिस
से माईक पर घोषणा करवानी उचित नहीं समझी और पैसे खुद के पास रख लिये.
           एक -दौ दिन बाद वह हमाल हमारी दूकान पर कपडे की गाँठ बाँधने आया तो मेरे भतीजे
ने बात -बात में  उससे भी पर्स गुम हो जाने की बात बता दी .उस हमाल ने पूछा -सा,ब उस पर्स
में कितने रूपये थे और पर्स का कलर क्या था ? मेरे भतीजे ने तथ्य सहित सब बात बता दी .
जब हमाल को विश्वास  हो गया कि यह पर्स इन्ही का है तो उसने बताया कि आपका पर्स मुझे
अमुक जगह पर मिला था और मेने अपने ही मार्केट के व्यापारी को यह कहकर सम्भला दिया कि
आप मार्केट के माईक पर घोषणा करवा दीजिये ताकि सही मालिक को उसकी अमानत वापिस
की जा सके ,उन्होंने घोषणा करवाने का भरोसा दिया तो मैं वह पर्स उन्हें देकर अपने काम में
लग गया .मगर सा'ब मुझे अफसोस हुआ कि उन्होंने इस बात की घोषणा नहीं करवाई और रूपये
खुद ही रख लिये ,आप मेरे साथ चलिए ताकि आपके पैसे वापिस आपको मिल जाए.
        मेरा भतीजा उस हमाल के साथ उस प्रतिष्ठित व्यापारी की दूकान पर गया और पर्स के खोने
की बात बतायी और उस पर्स में रखी सही रकम बतायी.उस व्यापारी ने गल्ले से रूपये तो निकाल
कर दे दिए और पर्स के बारे में बोला की वह पर्स पुराना था इसलिए मेने फ़ेंक दिया .मेरा भतीजा
रूपये लेकर उस हमाल के साथ लौट आया और आकर सारा वाकया बताया .
          मैं उस गरीब हमाल के सचरित्र और प्रतिष्ठित व्यापारी के बद चरित्र पर सोचता रह गया .
एक तरफ चरित्र पाने के लिए अभावो में जीना मंजूर है एक गरीब को मगर दूसरी तरफ पैसे के लिए
जमीर बेचना भी मंजूर है पैसेवाले लोभी हेवान को।    
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दौ चित्र                          (26.06.12)

बहुत ही अमीर  घर का एक लड़का,पैसे की बाप के पास कोई कमी नहीं ,घुमने के लिए बाईक ,अच्छी 
पाकेट मनी मगर वह भी उसके लिए कम पड़ती थी .जब बाप ने देखा कि बच्चे की संगत बिगड़ रही 
है तो कुछ लगाम लगाने की कोशिश की गयी मगर कुसंग होता ही ऐसा है कि आदमी उसके आकर्षण 
में खिंचता चला जाता है और बाद में दलदल में फँस सिर्फ छटपटाता है .उसके बाप ने देखा कि उसे 
दी गई ज्यादा छुट उसके भविष्य के लिए नुकसान कारक है तो उसकी पाकेट मनी घटा दी गयी ,उस 
लड़के के पहले ही मौज-शौक़ के खर्चे ज्यादा थे अब नयी बंदिस से वह तिलमिला गया .जब घर से 
पैसे मिलने कम हो गए तो आवारागर्दी के खर्चे को कैसे पूरा किया जाए उसके सामने यह प्रश्न था .
उस लड़के ने पैसे पाने के लिए के लिए एक तरीका ढूढ़ निकाला .   वह अपने ही शहर की गलियों में 
जहाँ भीड़ कम रहती थी ,में टोह लेता रहता था ,जब भी कोई अकेली महिला गली से गुजरती तब वह 
बाईक से उसका पीछा करता और मौका मिलते ही उसके गले में पहनी चेन झपट लेता और उसे बेच 
कर आवारागर्दी में पैसे उड़ा देता . मगर उस दिन जैसे ही वह चेन झपट के बाईक भगाने की ताक में था
कि बाईक फिसल गयी और पकड़ा गया .उसके पकडे जाने पर लोगो ने देखा की एक रईस बाप की 
बिगडैल ओलाद निकृष्ट काम भी कर सकती है .

 जिस गली में वह रहता था उस गली में चार-पाँच सब्जी बेचने वाले भी सब्जी की रेहड़ी लगाकर अपना 
गुजारा चलाते थे .ये सभी रेहड़ीवाले झुग्गी बस्तियों से आते थे .लम्बे अरसे से इसी गली में सब्जी 
बेचने के कारण गली के लोगो से भी घुलमिल गए थे .हर सुबह उस गली में सब्जी लेने के लिए महिलाओं 
की भीड़ लगी रहती थी .एक महिला टमाटर की रेहड़ी से टमाटर लेने आई और टमाटर लेकर चली भी 
गयी .वह रेहड़ी वाला भी आने वाले ग्राहकों को टमाटर देने में व्यस्त रहा ,जब भीड़ छंटी तो वह रेहड़ी में 
टमाटर जो इधर उधर ग्राहकों ने छटनी करके बिखेर दिए थे ,को वापिस ढेरी बनाकर सजाने लगा ,तभी 
उसकी नजर टमाटर की ढेरी में सोने की चेन पर पड़ी .उसने वह चेन उठाकर अपने पास रख ली .उसे 
आभास हो गया था कि किसी महिला ग्राहक की चेन टमाटर बीनते समय गिर पड़ी है मगर किसकी हो 
सकती है यह उसे भी पता नहीं था .उसकी अंतरआत्मा ने फेसला किया कि यह चेन जिसकी है उसे लौटा 
देनी चाहिए .सही चेन मालिक खोयी हुई चेन  वापिस ढूढता हुआ आयेगा और उसके आने का वह इन्तजार करने लगा .थोड़ी देर बाद एक महिला आई जो  सब रेहड़ी वाले से कुछ पूछते-पूछते आ रही थी .जब 
वह टमाटर वाले के पास आई तो उससे भी खोयी चेन के बारे में पुछा .रेहड़ीवाले ने चेन की डिजाइन के 
बारे में उनसे जानकारी चाही .जब उस महिला ने  उचित जानकारी दे दी तो उस रेहड़ी वाले ने सोने की 
चेन उस महिला को लौटा दी .वह महिला आश्चर्यचकित रह गयी .उसने सोचा ही नहीं था कि उसे उसकी 
चेन वापिस मिलेगी मगर उसकी चेन एक गरीब रेहड़ी वाला वाला सहर्ष वापिस दे देगा यह तो उसके लिए 
आश्चर्य ही था .उस महिला ने रेहड़ीवाले से पूछा -क्या तुम नहीं जानते कि इस चेन की कीमत एक लाख 
रूपये के करीब है?
रेहड़ी वाले ने कहा- जानता था बहिनजी .
उस महिला ने फिर से सवाल किया -ये चेन तुम रख सकते थे फिर रखी क्यों नहीं?
रेहड़ी वाले ने जबाब दिया -इन लाख रुपयों से मेरी गरीबी तो दूर नहीं हो सकती थी .आपकी जगह यदि
 मेरी चेन होती तो मेरी क्या हालत होती इस बात पर विचार करके मेने यह चेन उसके मालिक को देने 
की ठान ली .आपकी प्रसन्नता देख मुझे संतुष्टि है ,ख़ुशी है .

ये दोनों वाकये एक ही दिन के न्यूज पेपर में पढ़ कर मेने गरीब में भगवान् और धनी व्यक्ति में 
राक्षसत्व को एक ही समय में देखा

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