सफलता कैसे ?

मौलिकता : एक अद्भुत गुण 

सफलता कोई एक गुण नहीं है बल्कि गुणों का समूह है .यदि हम अपने व्यक्तित्व को निरंतर
टटोलते रहे तो हम अपनी कमियों तथा गुणों को जान सकते हैं .जो व्यक्ति खुद के बारे में सच्ची
जानकारी रख सकता है और खुद को ही मुर्ख नहीं बनाता है वह निश्चित ही सफल जीवन जीता है .

मौलिक आदते जो जीवन बदल देती है .

1.मौलिकता - आप दुसरे जैसा बनने की कल्पना ही मत कीजिये .आप अपने को जीना सीख
जाइये .हर व्यक्ति में किसी खास काम को करने की विशेष योग्यता होती है मगर उस पर उसका
ध्यान नहीं जाता है क्योंकि वह दुसरे जैसा बनने की कोशिश लगातार करता रहता है .इस कोशिश
में वह स्वयं को खो देता है और दुसरे की कार्बन कॉपी बन जाता है जिसकी कोई विशेष अहमियत
नहीं होती है
          कोई व्यक्ति यदि वकील के परिवार से आता है तो वह अपने बच्चों में भी वकालात के गुण
देखना पसंद करता है या कोई डॉक्टर है तो वह अपने बच्चों को डॉक्टर ही देखना पसंद करता है
जबकि ऐसा संभव नहीं है उल्टा हम अपने बच्चों की मौलिकता को छिनकर उसके भविष्य पर
प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं .
         हम अपने आदर्श व्यक्ति के गुणों का अनुकरण कर सकते हैं मगर हुबहू उस जैसा दिखने
का प्रयास करके बहरूपिये से ज्यादा कीमती कदापि नहीं हो सकते हैं .आप राम या कृष्ण नहीं
बन सकते हैं न ही विवेकानंद या सुभाष .आप महापुरुषों के गुणों का अनुकरण करे मगर उनके
जैसा दिखने की हौड में मत पडिये .आप खुद को पहचानिए ,अपनी योग्यताओं को जानिये ,अच्छे
गुणों का खुद में विकास कीजिये मगर आप "आप" ही बने रहिये .
          सफल व्यक्ति मौलिक होता है ,यह एक सार्वभोम सिद्धांत है .विश्व के किसी भी सफल व्यक्ति
की जीवनी को पढिये तो आपको सहज ही मौलिकता के गुण का महत्व समझ में आ जाएगा .
इस विश्व में जो कुछ भी नया रचा जाता है उसका रचनाकार नकलची कभी नहीं हुआ है .जितने भी
आविष्कार इस दुनिया में आये हैं वह मौलिक सुझबुझ से ही आये हैं .किसी भी वैज्ञानिक ने जो
कुछ भी खोजा वह मौलिक था ,नक़ल नहीं थी .
        मौलिकता नविन और स्वतंत्र विचारो को जन्म देती है जबकि नक़ल हमेशा बासी ही होती है
नवीन सोच एक कदम आगे ही होती है क्योंकि वह सिर्फ आपके ही मस्तिष्क में है .आप यदि
अपनी सोच को सही दिशा प्रदान करने में मेहनत करने लग जाते हैं तो आप खुद में परिवर्तन
पायेंगे ,आपका बर्ताव परिपक्व होता जाएगा ,आप जबाबदार बनते जायेंगे ,आप समय के मूल्य
को समझते जायेंगे ,आप जोखिम उठाने का माद्दा रखने वाले व्यक्ति बन जायेंगे ,आप नवीनता
को अपनाने वाले बन जायेंगे ,आपका व्यक्त्तित्व निखरता चला जाएगा .
       नक़ल करके परीक्षा पास करने वाला विद्यार्थी जीवन में असफल ही रहता है क्योंकि उसके
पास उधार का ज्ञान था .परीक्षक उन बच्चो की उत्तर पुस्तिका को कम अंक देता है जो पुस्तक
के हुबहू लिखे होते हैं ,ऐसा क्यों होता है ? कारण यही है कि परीक्षक समझ जाता है कि इस छात्र
ने या तो नक़ल की है या फिर रट्टू तोता है।
       जरा सोचिये यदि अभिताभ बच्चन ने अपनी मौलिक कला को छोड़ कवि बनने की नक़ल की
होती तो क्या होता ?यदि विश्वनाथन आनन्द अपने मौलिक खेल को छोड़ किसी कि नकल की होती
तो क्या ग्रान्ड मास्टर बन पाता ? क्रिकेट खिलाड़ी युवराज यदि मौलिक खेल नहीं खेलते तो क्या
लगातार छ: बॉल पर छ:छक्के लगा पाते ?नारायण मूर्ति यदि प्रतियोगी की सोच के पीछे भागते तो
क्या इन्फोसिस का विकास हो पाता ?
       ईश्वर ने सब को समान रूप से बनाया है .सबको स्वतंत्र मस्तिष्क दिया है ,शरीर दिया है ,बुद्धि
दी है ,यदि किसी को जन्मजात कोई कमी भी दी है तो उसमे किसी काम को करने की विशेष
योग्यता भी दी है .
      यदि सफल होने  की प्रबलतम इच्छा आपमें है या जाग चुकी है तो सर्व प्रथम आप मौलिक
बन जाईये .मौलिक सोच ,मौलिक विचार ,मौलिक कार्यशैली.फिर देखिये आप अपने में कितना
बड़ा बदलाव पाते हैं इसलिए तो कहा है -
          लीक -लीक गाडी चले ,लीक चले कपूत .
          लीक छोड़ तीनों चले ,शायर,सिंह,सपूत .



अनुशासन :अनमोल गुण 

अनुशासन समय को क्रमबद्ध रूप से विभाजित करके उसके हर पल को जीने की पद्धति है .नियंता
ने समय के चक्र को ब्रह्मांड के केंद्र में रखा है और सभी ग्रह क्रमबद्ध रूप से समय के घेरे में परिभ्रमण
करते हैं तो भला हम इससे विलग कैसे रह सकते हैं .
      अनुशासन का अर्थ स्व-प्रबंधन है .खुद के द्वारा खुद का प्रबन्धन .किसी का थोपा हुआ अनुशासन
कुछ समय तक सही दिशा निर्देशन कर सकता है मगर लम्बे समय तक थोपा हुआ अनुशासन मन
को कुंठित कर देता है,अनुशासनकर्ता के प्रति बागी बना देता है ,डरपोक और कायर बना देता है,हताश
और निराश बना देता है .
    हम प्राय:देखते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों पर अनुशासन के नाम पर कठोर नियम लादने की
कोशिश करते रहते हैं ,शिक्षक अपने शिष्यों के प्रति अपनाए गए कठोर आदेशो को अनुशासन के
नाम पर खपाते रहते हैं ,बड़ी-बड़ी कम्पनियों के निदेशक कड़े नियमो में कर्मचारियों को बांध कर रख
देते हैं .क्या ये सभी मनचाहा प्रतिफल पाते हैं? मेरे विचार से उत्तर है नहीं ...बिलकुल नहीं .कठोरता
ही यदि अनुशासन होती तो इस दुनिया में हम सब डंडे पकडे खड़े होते ,ना स्नेह की जरूरत होती और
ना ही मानवीय संवेदनाओं की .
   अनुशासन का अर्थ दूसरो का पथ प्रदर्शन करना है जिसका कारगार तरीका कठोर उपाय नहीं हो
सकते हैं।अनुशासन की अविरल धारा के लिये स्नेह,संवेदना,प्रेम,समर्पण और क्रमबद्ध रूप से काम के
निष्पादन को मिला देना चाहिए .
  सार्थक अनुशासन के लिए हमें अपने बच्चो का ,शिष्यों का ,कर्मचारियों का स्नेहशील पथ प्रदर्शक
बनना चाहिए .राडार जिस तरह से मार्गदर्शन करता है उसी तरह से हम भी क्या गलत है और क्या
सही  इस तथ्य को अनुगामी लोगों को बता सकते हैं मगर जबरदस्ती थोप नहीं सकते .क्योंकि
नाविक यदि राडार की दिशा के विरुद्ध चल कर गंतव्य पर पहुंचना चाहेगा तो क्या ऐसा संभव होगा?
यदि नाविक राडार के विरुद्ध चल भी देता है तो क्या राडार दिशा बताना बंद कर देता है ?नहीं ,राडार
का काम सही दिशा बताना है ,नाविक की गलती के बाद भी वह सही निर्देशन ही करता है इसी तरह
हमें भी अनुगामी वर्ग पर कुछ भी थोपना नहीं है ,योग्य दिशा निर्देशन करते रहना है .
   जब हम योग्य मार्गदर्शक की भूमिका में आ जाते हैं तो अनुगामी स्वत:ही खुद को क्रमबद्धता के
साथ जोड़ने लग जाता है .खुद की इच्छा से जब अनुगामी क्रमबद्धता के साथ जुड़ता है तो उसके मन
में सकारात्मक ऊर्जा का  विकास होता है और वह कुछ कर गुजरने के लिए तैयार हो जाता है और
यही से स्व-अनुशासन का उदय होता है .
      कठोर नियम लादना या कठोर नियमो के तहत जीना अनुशासन नहीं है .अनुशासन है जीवन
शैली में क्रमबद्धता का विकास होना और इसके लिए हमें निरंतर कुछ अच्छा करने की भावना को
पोषित करते रहना है .
    अनुशासन के लिए हमें अपने आलसी स्वभाव को त्यागना है ,टालमटोल करने वाले स्वभाव को
त्यागना है ,तन्द्रा को दूर करना है तथा इसकी जगह कार्य निष्पादन में तत्परता रखना है ,उत्साही
बनना है,चरणबद्ध रूप से काम को पूरा ही करना है .
  यदि हम अपने अनुगामी का या अपना खुद का विकास चाहते हैं तो हमें कठोर नहीं बनना है सिर्फ
समय का योग्य विभाजन करके उत्तरदायित्व को तय सीमा में क्रमबद्ध रूप से पूरा करना है .आपका
यही गुण सच्चे रूप से आपमें आत्म अनुशासन की भरपूर ऊर्जा पैदा कर देगा और आप सामर्थ्यशाली
बन जाओगे .






समय प्रबन्धन 

समय प्रबन्धन एक विलक्षण गुण है .प्रकृति ने सभी को समान रूप से एक दिन में चोबीस घंटे दिए हैं
किसी के लिए भेदभाव नहीं है ,मगर समय का प्रबन्धन नहीं करने से काल ही सफलता को चट कर
जाता है .
    हम एक दिन में कितने घंटे काम करते हैं ?क्या हमने इसका सही लेखा-जोखा रखा है .हम में से
अधिकतर ने इसे आवश्यक ही नहीं समझा होगा .हम एक रूटीन में जीते हैं -सुबह उठे -नास्ता लिया ,
काम पर गए ,काम को जैसे -तैसे पूरा किया ,शाम होने का इन्तजार किया ,घर लौट आये ,रात का
खाना लिया,कुछ गपशप की और सोने चले गए। क्या ये सही प्रबधन है जिससे हम सफलता के मार्ग
पर विशेष गति से आगे बढ़ सके।
   हमें सुबह उठते ही तीन बातो पर अवश्य विचार करना चाहिए -कल के जो काम पुरे नहीं हुए हैं दूसरा
आज के महत्वपूर्ण काम क्या है तीसरा कल के संभावित कार्य क्या हो सकते हैं .यदि हम इन तीन
बिन्दुओ पर विचार करते हैं तो हमें अपने आज के समय प्रबन्धन में सहूलियत रहेगी .
        जब हमें यह ज्ञात हो जाए की हमें मोटे रूप से आज क्या करना है तब हमें उसी समय आज के
समय प्रबन्धन को निश्चित कर लेना चाहिए कि किस समय किस काम को कैसे किया जाए.यह
महत्वपूर्ण है इससे हमें अपनी कार्यसूची बनाने में आसानी रहेगी .हम अपने प्राथमिक कार्य को पूरा
समय दे पायेंगे और अनावश्यक समय भी बर्बाद नहीं होगा .हर प्राथमिक कार्य का एक समय निश्चित
कर देना चाहिये ताकि किसी काम में ज्यादा समय ना लग जाये .यह काम का शेड्यूल कम से कम
आठ से नौ घंटे का होना चाहिये .बाकी के सोलह घंटे अपने परिवार के आवश्यक कामो को पूरा करने
और दैनिक दिनचर्या को पूरा करने के लिए होना चाहिए .
      यदि हम एक दिन में आठ घंटे से ज्यादा काम करेंगे तो पहली बात हम पुरे मनोयोग से काम नहीं
कर पायेंगे हमारी काम करने की क्षमता कम हो जायेगी ,हमारा ध्यान केन्द्रित नहीं रह पायेगा और
अशुद्धियाँ करेंगे ,शरीर काम के बोझ के कारण से थक जाएगा और हमारा उत्साह काम के प्रति कम हो
जाएगा और अगले दिन हम अनियमित हो जायेंगे .
      समय प्रबंधन में स्थान परिस्थिति और व्यक्ति का भी बड़ा महत्व है .कभी -कभी हम जैसा अनुकूल
फैसला चाहते हैं वह स्थान परिस्थिति या व्यक्ति के कारण मुश्किल भी हो सकता है .तय समय पर काम
होना चाहिए मगर अन्य  फेक्टर उपस्थित हो जाने के कारण समय पर काम नहीं भी हो यह भी संभव है
ऐसे  में हम अपने काम को प्राथमिक सूची  से हटाकर अनुकूल समय में पूरा कर सकते हैं।
                


सम्यक  नजरिया 
   
  हम दौ प्रकार से किसी काम को देखते हैं (1) सकारात्मक नजरिये के साथ और दूसरा नकारात्मक
नजरिये के साथ .मगर तीसरा भी एक प्रकार है जिसको हम प्राय: ही काम में लेते हैं और वह है
परिस्थिति को सामने वाले के नजरिये से समझना .
     सिर्फ सकारात्मक चिंतन ही सफलता के लिए काफी नहीं होता है .हम किसी भी काम को करने से
पहले उस पर सिर्फ सकारात्मक चिंतन ही करते हैं तो हमारा चिंतन अधूरा रह जाता है और हम
असफल हो जाते हैं या फिर हम किसी काम को हाथ में लेने से पहले अपने नजरिये को नकारात्मक
बना लेते हैं तो भी असफल हो जाते हैं क्योंकि उस परिस्थिति में हम कुछ करना ही नहीं चाहते हैं और
काम को मूर्त रूप देने से पहले ही हार जाते हैं .सवाल है कि फिर हम क्या करे? हमें काम को अगले
मुकाम तक पहुंचाने के लिए न्यूट्रल होकर सोचना पडेगा की काम को कैसे पूरा किया जाना चाहिए .
काम को पूरा करने के लिया हमें उस काम का पूरा विश्लेष्ण करना चाहिए कि उस काम को पूरा करने
पर क्या लाभ और हानियाँ है.कम के बारे में हमारा अनुभव कितना है ,उस काम को पूरा करने के लिए
कौन-कौन संभावित सहयोगी हैं .
  सबसे पहले यह सोचे की इस काम को यदि तीसरा व्यक्ति पूरा करता तो आप उसे क्या सलाह देते ?
उसके बाद काम से उत्पन्न हो सकने वाली संभावित हानियों पर दृष्टिपात करे और जब आपको लगे कि
आप सम्भावित हानियों से पार पाने में सफल हो सकते हैं तब उस काम के बारे में सकारात्मक चिंतन
करे और काम को हाथ में लेते ही नकारात्मक चिंतन को पूर्णतया छोड़ दे ,अब आपको सिर्फ काम के
पूरा नहीं होने तक सकारात्मक चिंतन ही करना है क्योंकि दौ या तीन चिंतन साथ-साथ चलने की स्थिति
में आप असफल हो जायेंगे।
     नकारात्मक चिंतन के समय के समय यदि आपको लगे की जोखिम बहुत अधिक है तो काम को
छोड़ देवे और उसका बढ़िया विकल्प क्या हो सकता है उस पर सोचे और नए विकल्प पर चिंतन करके
आगे बढ़ जाए क्योंकि सफलता की यात्रा में आप विश्राम नहीं ले सकते हैं .आपको निरंतर फैसले लेने हैं
और फैसलों को आगे बढ़ाना है आपको यदि सही विकल्प नहीं मिले और उस काम में जोखिम भी ज्यादा
लगता है जिसे आप उठा भी नहीं सकते तो आपको उस काम को पूरा करने के लिए उपयुक्त सहयोगी
खोजने पड़ेंगे जो आपके उद्देश्य को पूरा कर सके .
      मेने बहुत जगह पढ़ा है की आदमी को सकारात्मक सोच रखनी चाहिए ,नकारात्मक नहीं बनना
चाहिए ,यह बात काफी हद तक सही है मगर पूर्ण रूप से सफलता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है।
आपको पूर्व दिशा में आगे बढना है और आपने अपना मुंह दक्षिण में कर रखा है अब आप सकारात्मक
सोच से आगे बढ़ते भी हैं तो क्या मंजिल तक पहुँच पायेंगे ? आप की विषय पर मजबूत पकड़ नहीं है
और आप उस विषय को सिर्फ सकारात्मक सोच से पूरा करना चाहते हैं तो क्या आप सफल हो पायेंगे?
       सकारात्मक सोच और नकारात्मक सोच में एक बड़ा अंतर है कि सकारात्मक सोच आगे बढने
में सहायक है परिणाम कुछ भी आ सकता है मगर नकारात्मक सोच तो सिर्फ असफलता ही देती है
क्योंकि वह आपको जोखिम उठाने ही नहीं देना चाहती है ,आपको काम करने ही नहीं देना चाहती है
इसलिए महावीर स्वामी ने सम्यकता पर जोर दिया .हमारा दृष्टिकोण सम्यक होना चाहिए 

स्व मूल्यांकन :- खुद की जाँच 

स्व मूल्यांकन कैसे करे ?

 सफल होने के लिए एक लेजर बुक खाताबही डाल  लीजिये और उसके दौ पक्ष बना ले .एक पक्ष
में दिन भर का उपयोगी कार्य जो आपने किया है उसे लिख ले और दुसरे पक्ष में निरर्थक कार्य में
समय गँवाया उसका लेखा कर ले .हर सात दिन में खुद का सर्वेक्षण करते जाए .बस ......
यही है दुनियाँ बदल डालने का मूल मन्त्र ....खुद को दुनियाँ में स्थापित करने का मूल मन्त्र ......
आज से ही कीजिये ......... सफलता आपकी राह देख रही है . 

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