धर्म- संस्कृति

भक्त और भगवान 

भक्त -भक्त अपने आराध्य का गुणगान करता है और उसकी शरण लेना चाहता है।
       भक्त अपने आराध्य की कृपा से मनुष्यों के कष्ट दूर करने के प्रयास में लगा
       रहता है। भक्त भगवान को रिझाने में अपना जीवन समर्पण कर देता है। भक्त
       मानव कल्याण के लिए पुरुषार्थ करता है और अपने शक्ति स्त्रोत भगवान से
       प्रार्थना करता है। भक्त भगवान का पूजन -अर्चन करता है और अपने स्वामी
       की सेवा में प्रस्तुत रहता है। मगर मनुष्य अपने लौकिक स्वार्थ को पूरा करने
      के उद्देश्य को लेकर इन दोनों के समीप जाता है और धन या पदार्थ के बल से
      इनकी प्रसन्नता चाहता है और भक्ति मार्ग में यह कृत्य आडम्बर कहलाता है।
      भक्त अपने गुणगान,धन ,सम्मान या किसी पदार्थ को पाकर प्रसन्न नहीं होता
      वह तो उसके आराध्य को प्रसन्न करने के प्रयास करने वाले सच्चे मनुष्य से
      हमेशा खुश रहता है और भगवान से उसके कल्याण की दुआ करता है। भक्त
      भगवान की महिमा का गान सुन कर प्रसन्न हो जाता है ,स्व-प्रशंसा उसे खिन्न
     कर देती है। भक्त की चाह भगवान के चरण वंदन और दर्शन की रहती है वह तो
     अपने स्वामी के बराबर स्थान पर स्वप्न में भी बैठना नहीं चाहता है मगर मनुष्य
    अपनी अभीष्ट की प्राप्ति के लिये उसे भगवान मान लेता है,बहुत स्वार्थी है ना मनुष्य !
    भक्त भगवान की लीला का अनुकरण नहीं करता है यदि उसके कारण से मानव जाति
     का दू:ख दूर हो जाता है तो वह अपने स्वामी की कृपा मानता है मगर इंसान अपने
    लालच के कारण भक्त को महिमा मंडित करने में लग जाता है। क्या कोई भक्त खुद
    को भगवान कहलाने की इच्छा रखता है ?क्या कोई भक्त खुद को भगवान के स्थान
    पर विराजमान होते देखना चाहता है ? तो फिर भक्त की इच्छा क्या रहती है ?क्या
   भक्त खुद की मृत्यु के उपरांत उसकी याद में मंदिर,मूर्ति या प्रतिष्ठा चाहता है ?भक्त
    का जीवन या लौकिक शरीर भगवान को समर्पित होता है उसका रोम -रोम हर क्षण
    अपने आराध्य के नाम स्मरण में बीतता है यह तो मनुष्य का स्वार्थ है जिस कारण
    से भक्त को भगवान मान उसे महिमा मंडित करता है। हमारी आस्था और विश्वास
    का केंद्र  सर्व शक्तिमान भगवान है और भक्त का जीवन चरित्र  अनुकरण के योग्य
    होता है।

भगवान - भगवान को सबसे अधिक प्रिय उसका भक्त लगता है। भगवान अपने ह्रदय
      में भक्त को स्थान देता है। जो मनुष्य भगवान के भक्त की सेवा करता है भगवान
      उस पर प्रसन्न हो जाते हैं। भक्त का पूजन,सत्कार और आदर भगवान खुद चाहते
     हैं। भगवान खुद अपने भक्त की रक्षा में लगे रहते हैं ,उसके कष्टों को दूर करते हैं।
     भगवान तो खुद भक्त की गाथा में तल्लीन रहते हैं परन्तु भगवान यह नहीं कहते
    हैं कि भक्त सम्पूर्ण सत्य स्वरूप है। भगवान तो उसे अपना अंश मानते हैं। भक्त
    भगवान में समा जाये यही भक्ति की पराकाष्ठा है।

मनुष्य भगवान की माया में उलझ कर रह जाता है। उसे अपने स्वार्थ के अनुकूल जो
अच्छा लगता है उसके कीर्तन में लग जाता है उसे भक्त या भगवान से खास लेना -देना
नहीं है। मनुष्य तो ठगना चाहता है चाहे वह भक्त हो या भगवान मगर सच्चाई यह है कि
मनुष्य से ना भक्त ठगा गया है और ना ही भगवान।     

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किसी भी घटना को पूर्ण रूप से समझने के लिए चार दृष्टियों का उपयोग करें।
1.द्रव्य (पदार्थ )की दृष्टि  2.जगह (क्षेत्र ) की दृष्टि 3.कल ( समय ) की दृष्टि 
4.भाव की दृष्टि 


क्षेत्र का प्रभाव 

श्रवण कुमार अपने बूढ़े माता-पिता को कावड में बैठाकर यात्रा के लिए निकल पड़े 
थे।चलते-चलते एक स्थान पर उनके मन में यह भाव जागा -मेरे माता-पिता की 
आँखे नहीं है ,वे देख नहीं सकते।पर उनके पैर तो है ,वे चल तो सकते हैं।चलना तो 
पैरो से है आँखों से नहीं और पैर तो मजबूत हैं।उनके मन में तर्क पर तर्क चलता 
रहा .मैं कावड को कंधों पर उठाकर इन्हें लिये -लिए क्यों घुमू .व्यर्थ ही भार क्यों 
उठाऊ।

तर्क ने काम किया और श्रवणकुमार ने कावड को कन्धों से उठाकर निचे 
रख दिया।उन्होंने कहा -पूज्य माता-पिता ,आपके पेर मजबूत हैं ,आप आराम 
से चल सकते हैं ,आपके आँखे नहीं है तो मैं आपको रास्ता दिखता आगे -आगे 
हाथ पकड़े चलूँगा और मेरे पीछे-पीछे पैदल चले।मुझ पर व्यर्थ ही बोझ क्यों ?

               माता-पिता ने सोचा -अरे इतना नम्र और शुशील हमारा पुत्र !इतना 
अनुशासित और आज्ञाकारी भक्त ! आज इसका व्यवहार कैसे बदल गया?

पिता ऋषि थे,ज्ञानी थे उन्होंने ध्यान किया ,जान लिया और तत्काल निचे 
उतर गए .अब श्रवण का हाथ पकड़े-पकड़े चलने लगे।चार-पांच सौ कदम 
चले होंगे कि श्रवण ने सोचा -ओह !मेने यह क्या कह डाला ,क्या कर डाला!
मेने अनर्थ कर डाला। माता-पिता को कावड में ले जाने की प्रतिज्ञा की थी ,और 
अब बीच में ही इन्हें पैदल चलने पर मजबूर कर दिया ,मेरे से बड़ा अपराध हो गया 
वह रुका और माता-पिता के चरणों में गिरकर बोला-पूज्यवर ,आप कावड में बैठे ,
मैं आपको कावड में बैठा कर ही यात्रा करवाउंगा।कावड से उतार कर मेने जघन्य 
अपराध किया है ,मुझे क्षमा करे।

श्रवण के पिता  ने कहा- वत्स,तेरा कुछ भी अपराध नहीं है।अपराध सारा क्षेत्र का 
जगह का है। उस क्षेत्र में आते ही तेरा मनोभाव बदला और क्षेत्र को पार करते ही 
मनोभाव मिट गया।यह अपराध क्षेत्र का था तुम्हारा नहीं .इस भूमि पर आते ही 
मनोभाव बदल जाते हैं ,स्वभाव में उदंडता आ जाती है।क्योंकि यह भूमि उस 
असुर की है ,जिसने अपने माता-पिता का वध किया था।इस भूमि की चुम्बकीय 
तरंग ही ऐसी है कि वे यहाँ आने वाले प्रत्येक व्यक्ति में उदंडता के भाव उत्पन 
कर देती है . 

यह है स्थान का प्रभाव। यही कारण  है की जब हम मन्दिर में जाते 
हैं तो हमारे भाव में पवित्रता आ जाती है और वेश्या की गली से गुजरने पर 
मन में विकार उत्पन हो जाता है।स्थान ,जहाँ हम निवास करते हैं वहाँ पर 
सकारात्मक ऊर्जा बनी रहे इसके लिए घर में सत साहित्य का पठन और 
भक्त चरित्र का गान और भगवान् का नाम लिया जाना चाहिए।             


सात्विक प्रार्थना 

हे परमपिता ,आप इस समस्त ब्रह्मांड का पालन पोषण कर रहे हैं और करोडो सालो से 
करते आये हैं लेकिन फिर भी आपके मन में किसी के प्रति भी राग-द्वेष नहीं है .सभी 
प्राणियों को उनके कर्मानुसार स्वत: ही फल-कुफल मिलता रहता है मगर आपकी 
अनुकम्पा सदैव सब पर समान रूप से बनी रहती है,प्रभु !हम आपके अंश कहे जाते हैं 
इसलिए हमें भी इतनी शक्ति दो कि हम भी आपका अनुकरण करते हुए इस ब्रह्मांड के 
लिए जितना बन सके शुभ काम करते हुए जीये .

हे परमेश्वर , आप बिना भेदभाव के इस सृष्टि के सभी जीवो के लिए समान रूप से समय,
प्रकाश, हवा, अन्न और पानी का अनवरत वितरण करते रहते हैं .आपका ये कृपा प्रसाद 
समान रूप से सभी जीवो को मिल रहा है .आप समदर्शी होकर पापी और पुण्यात्मा को 
अपना कृपा प्रसाद दे रहे हैं .हे प्रभु ,हमें भी इतनी शक्ति दो कि हम भी सबमे आपको देख 
सके और सबकी सेवा निस्वार्थ भाव से कर सके .

हे परमात्मा ,आप इस समूचे ब्रह्मांड को निर्मल जल ,शुद्ध हवा,सुरम्य वातावरण प्रदान 
करते रहे हैं .हे प्रभु हमारे में भी यह भावना भर दो कि हम आपके द्वारा प्राप्त जल,हवा 
और धरती को प्रदूषित ना करे ,जेसी आपने हमें दी है वेसी ही हम बनाए रखे .

हे जगतपति ,आपने इस सृष्टि पर सभी लोम-विलोम पदार्थो की रचना की है और सभी 
प्राणियों को सभी पदार्थो के उपयोग करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी है ,बुद्धि दी है ,विवेक 
दिया दिया है .हे प्रभु ,हम निरे अज्ञानी हैं ,हम यह समझ तो रखते हैं कि बुरा क्या है और 
अच्छा क्या है मगर हममें बुरे को त्यागने और भले को अपनाने की शक्ति कम है .हे 
दया के सागर ,हमें शक्ति दे कि हम दैवीय गुणों को अपनाये और आसुरी अवगुणों का 
सहजता से त्याग कर सके .

हे परमपिता ,आपने हम सबको निश्चित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए ही इस ब्रह्मांड में 
भेजा है और उद्देश्य पूर्ति के बाद में पुन: आपमें समाहित हो जाने का पक्का वादा भी है 
मगर हम इस ब्रह्मांड के राग -द्वेष ,माया-मौह में बंध कर अपना ब्रह्मांड पर आने का उद्देश्य 
भी भूल चुके हैं ,हम आपके बच्चे हैं और आप हमारे सृजक हैं .आप सृजक होने के नाते हम 
पर इतनी कृपा जरुर करे कि हम जब-जब भी इस सृष्टि पर अपने जन्म लेने के उद्देश्य को 
भूल जाए तब-तब आप हमें  हमारा लक्ष्य बताते रहे ताकि हम भटके नहीं ,भूल ना करे .

हे प्रभु, तुम तो पालन कर्ता हो,सबका पालन करते हो . हम भले-बुरे कैसे भी काम करते हैं 
फिर भी आपकी कृपा के सहज पात्र बने रहते हैं.हे करुनानिधान ,हम पर इतनी कृपा कर 
कि जब भी हम अन्धकार की और चल पड़े तब हमें सही मार्ग दिखा ,जब भी हम अज्ञान की 
और चल पड़े तब हमें ज्ञान का मार्ग दिखा .हमें अमरत्व की ओर ले चल ..............   
   

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