समाज और हम


१३-६- २०१४ 
शिक्षा जगत दे सकता है -पर्यावरण और नैतिकता 

पर्यावरण और नैतिकता से देश की बहुत सी रुग्णताएँ मिट सकती है और इस
अहम काम को पूरा करने के लिये स्कुल और कॉलेज के छात्रों को जोड़ा जाना
जरूरी है। आज देश में चल रही शिक्षा पद्धति में जो विषय प्रैक्टिकल रूप से
सिखाये जाने चाहिए उन्हें केवल रटाया जा रहा है जैसे -नैतिक शिक्षा और
पर्यावरण। क्या इन विषयों पर रट्टा लगाने से छात्र देश को कुछ दे पा रहे हैं ?
यदि नहीं तो फिर सरकारें नींद से जगती क्यों नहीं हैं ? देश का पर्यावरण
विभाग इतनी बड़ी शक्ति का सदुपयोग कब करना सीखेगा ?बाल विकास
मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय यदि सीधे और व्यावहारिक रूप से शिक्षा
जगत से जुड़ते हैं तो देश की तस्वीर दस साल में बदल सकती है।

पर्यावरण को बचाने के लिए किताबों का रट्टा लगाने से छात्र क्या सीखता है
क्यों नहीं हर क्लास वर्ग को किताबों की जगह इस विषय पर प्रेक्टिकल बनाया
जाये ?हर क्लास में बच्चों की टीम बना कर उनसे पेड़ लगवाया और उनका सरंक्षण
करना सिखाया जाये। सरकारें हर वर्ष पेड़ लगाने के नाम पर करोड़ों रूपये खर्च
करती है मगर धरती हरी भरी नहीं होती है,क्यों ?क्योंकि इस काम में केवल खाना पूर्ति
होती है,दिखावा होता है। यदि कक्षा 6 में पढ़ने वाला छात्र एक पौधा लगाता है और कक्षा
बाहरवीं में आने तक उसका सरँक्षण करता है और उसके इस प्रेक्टिकल काम को जाँच
कर अध्यापक इस विषय में अँक देता है तो निश्चित रूप से यह धरती हरी भरी बन
सकती है। गाँव या शहर को स्वच्छ बनाये रखने में इस फोर्स का सदुपयोग किया जा
सकता है। गाँव के तालाब ,सड़के और सार्वजनिक स्थल को इस फोर्स की मदद से
स्वच्छ रखा जा सकता है। स्नातक की परीक्षा में पास होने के बाद हर छात्र को कम
से कम छः महीने के लिए कृषि के क्षेत्र से प्रेक्टिकल रूप से जोड़ा जाए और उसके बाद
डिग्री दी जाए ताकि हर नवयुवक श्रमदान करके कृषि के क्षेत्र से जुड़ सके और उसके
आधुनिकीकरण में अपना सहयोग दे सके। पर्यावरण की सुरक्षा को जन आंदोलन
बनाना है तो स्कुल जीवन से यह शुरुआत होनी चाहिये। कचरे को हटाने और उसका
उपयोग करने से स्वच्छ्ता आयेगी ,बीमारियाँ मिटेंगी और उसके रिसाइक्लिंग से
आर्थिक लाभ भी होगा।

नैतिकता का विषय रट्टा लगाने के पढ़ने का है क्या ?यह आचरण में लाने का विषय
है मगर हम इस विषय पर भी पुस्तकें पढ़ा देते हैं। क्या पुस्तकें पढ़ने मात्र से नैतिकता
आ जायेगी। क्या हमारे देश में नैतिक शिक्षा पढ़ाने वाले नैतिक आचरण का अमल करने
वाले अध्यापक वास्तव में हैं भी या नहीं हैं। नैतिकता का विषय जिसकी देश को ज्यादा
जरुरत है वह भी किताबी हो गया है। बच्चों में नैतिकता के गुण पैदा हो उसके लिए अच्छे
और गुणी शिक्षक की प्रेक्टिकल शिक्षा जरूरी है ,यदि बाल्यकाल से शिक्षक बच्चो में
सुसंस्कार का सिंचन करता है तो वही पुष्प जब युवा बन कर समाज में आयेगा तो समाज
दुर्गुण मुक्त बनेगा ,बलात्कार ,भ्रष्टाचार,आतंकवाद से मुक्त युवाओं का निर्माण होगा।         
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सौभाग्य के आँसू 
(१/१/२०१४ पर विशेष )

सुबह की सैर के बाद मैं एक पेड़ के निचे बैठा था ,पास पड़ी बेंच पर दौ नौजवान युवा
बैठे थे। उनका वार्तालाप मेरे कानों तक पहुँच रहा था। एक दोस्त दूसरे से पूछ रहा था
"क्या बात है आज सुबह-सुबह मूड उखड़ा हुआ लग रहा है "

दूसरा बोला -"कुछ खास नहीं दोस्त ,मेरे माँ -बाप पुराने ख्यालों के और कम पढ़े -लिखे
हैं। हर समय टोकते रहते हैं जैसे मैं कोई बच्चा हूँ "

पहला बोला -"हुआ क्या? "

दूसने ने बताया -"मेरी माँ मुझे क्या खाना और नहीं खाने पर हर दिन टोकती है ,थोड़ी
ठंडी बढ़ी कि हिदायत देती है ,घर से निकलने से पहले गाडी धीरे चलाने को कहती है।
घर के छोटे छोटे काम की लिस्ट थमा देती है ,किससे कैसे आदर पूर्वक बोलना है जैसी
नसीहत देती है और पिताजी समाज में कैसे रहना है उस पर भाषण झाड़ते हैं ,दाढ़ी
कभी बढ़ा ली तो टोकते हैं ,सुबह देर से उठने पर बार-बार जगाते हैं। पढ़ाई कैसी चल
रही का ध्यान करते हैं ,देर रात बाहर घूमने नहीं देते। पिज्जा बर्गर खाने पर कंट्रोल
रखते हैं। रात को अपने संघर्ष के दिनों कि कहानियाँ या लोगों ने कैसे संघर्ष किया
उन पर बताते हैं। रात को इंटरनेट पर बैठने नहीं देते ,दिन भर समय का महत्व और
नैतिकता की बातें  …

वह बोलता जा रहा था पर पहला मित्र कुछ नहीं बोल रहा था तो उसने अपने मित्र की
ओर देखा और बोला -अरे ,तेरी आँखों में आँसू ,मेरे अच्छे दोस्त !मेरी बदनसीबी पर
आंसू मत बहा ,ये तो मेरा रोज की दिनचर्या है.......

उसकी बात काटता हुआ पहला मित्र बोला -ये आँसू तेरे सौभाग्य से ईर्ष्या होने के
कारण आ गए हैं दोस्त ,मुझे देख ,मेरे बाप के पास अच्छा व्यापार है ,माँ अच्छी पोस्ट
पर काम कर रही है। पापा सुबह सवेरे काम पर चले जाते हैं और देर रात लौटते हैं ,
उन्होंने अच्छे या बुरे के लिए कभी डाँटा तक नहीं ,कभी ये नहीं समझाया की संघर्ष
कैसे किया जाता है। वे तो पॉकेट मनी और नयी चीजे देकर अपना कर्तव्य को पूरा
हुआ समझते हैं और माँ खाना बनाकर रसोई में रख काम पर चली जाती है ,मैं
खाना खा रहा हूँ या नहीं उनको उससे कोई लेना देना नहीं। छः बजे घर आकर फोन
पर दोस्तों से गप्प करती है और शाम को किसी पार्टी में जाने की तैयारी। शनी -रवि
कि छुट्टी के दिन किट्टी पार्टी और रात में क्लब या किसी दोस्त के घर। मैं अपने मम्मी
पापा से डाँट खाने को तरस जाता हूँ,कभी भी उनके पास मेरे लिए समय नहीं होता
मैं सर्दी से परेशां हूँ या किसी अन्य बात से।  वो इतना ही कहते हैं कि अब तुम बड़े हो
गए हो अपने फ़ैसले खुद लो और अपना ग्रुफ खुद बनाओ। तुम बड़े सौभागयशाली हो
दोस्त !तेरी बात सुनकर ऐसा लगता है मैने तेरे घर जन्म लिया होता।

उनकी बात सुन मैं विचारों में खो गया ,मुझे अपने अनपढ़ माँ -बाप याद आ रहे थे
जो हमेशा हमे उच्छ्खलता पर डाँटते और समझाते रहते थे। मेरा दिल उन्हें मन ही
मन प्रणाम करने लगा भले ही वह पढ़े लिखे कम थे पर हमें सुयोग्य बनाने की हर
पल कोशिश किया करते थे।         



------------------------------------------------------------------------------------------------------------- 29/12/2013

नैतिक भारत के लिए शिक्षा प्रणाली में बदलाव 
अंग्रेजों ने जब भारत छोड़ा तो कहा था कि इस देश को भारतवासी नहीं चला पायेंगे
और यह फिर से गुलाम हो जायेगा ,क्यों कहा था उन्होंने ऐसा ?क्योंकि वह जानते
थे हम भारत को ऐसी शिक्षा प्रणाली देकर जायेंगे जिसको पढ़ कर युवा दिशा हिन हो
जायेगा और भटक जायेगा।

आज इस देश के सामने मुख्य दौ समस्याएँ हैं पहली भ्रष्टाचार और दूसरी बेरोजगारी
इन दोनों समस्याओं ने कई नयी समस्याओं को जन्म दिया है जैसे- ध्वस्त होती
संस्कृति,महिला असुरक्षा ,जातिवाद,कर्तव्य बोध का अभाव आदि।

मुख्य समस्या भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से भारत ने निपटने के प्रयास किये और
वे प्रयास असफल होते गये और देशवासी इन समस्याओं से तालमेल बैठाकर जीना
सीख गए हैं और नतीजा यह कि ये बीमारियाँ बढ़ती ही जा रही है।

इन मुख्य समस्याओं से झुंझने का प्रयास सिर्फ फोरी तोर पर समय -समय पर
होता रहा है जैसे -आरक्षण,धरना ,आंदोलन प्रदर्शन या कानून लिख कर। ये उपाय
स्थायी नहीं हैं क्योंकि इससे समस्याओं की जड़ को कोई नुकसान नहीं हुआ है।
क्या कठोर सजा ही सब समस्याओं का हल है ?समाज विज्ञान इसे नहीं मानता।
हमारे देश में अब बच्चे भी अवैधानिक काम कर के पकडे जा रहे हैं,प्रश्न यह उठता
है कि बच्चों के मन में अपराध को अंजाम देने के भाव आये कहाँ से ?ये अपराध
बच्चा सीखा कैसे ?इसके लिए कौन जिम्मेदार है ?

विडंबना है कि इन बातों पर हमारे जनसेवक कभी संसद में चर्चा नहीं करते ,ना
सामाजिक सगंठन इस विषय पर चर्चा करते हैं। बड़ा दुःख है कि हम लीव इन
रिलेशन लाते हैं ,हम समलैंगिगो के लिए संवेदना लाते हैं.हम गर्भपात को बढ़ावा
देते हैं,हम महिलाओं कि असामान्य वेशभूषा को प्रोत्साहित करते हैं मगर शिक्षा
पर कभी बृहद चर्चा नहीं करते जो की मुख्य है।

गणतंत्र भारत को कैसी शिक्षा प्रणाली की जरुरत है इस पर कभी कोई NGO
आंदोलन या धरना नही करता।शिक्षा का स्वरुप कैसा हो इस पर कभी जनमत
नहीं लिया जाता ,जबकि अनैतिक जोड़ गणित के लिए जनमत होते रहते हैं
कारण यही की इससे सत्ता नहीं मिलती।

देश के नेता इस पर चर्चा नहीं करते जबकि चुनाव के समय अपने लिए वोट की
गुहार लगाने घर-घर योजना बद्ध तरीके से पहुँच जाते हैं।

KG से कक्षा पाँच तक का सेलेबस क्या हो ?क्योंकि बच्चा इस समय कोमल मन
का होता है उसे जो सिखाया जाता है वह उसे ग्रहण करता है और यही बाल संस्कार
उसके जीवन को गढ़ते हैं। कक्षा 6 से 8 तक का सेलेबस क्या हो ?इस उम्र में बच्चा
सीखता है और सोचता है। हमारी शिक्षा यहाँ आकर किताबी बन जाती है। बच्चा
किताबों में उलझ जाता है और कीड़ा बनने का प्रयास करता है जबकि सर्वांगीण
विकास हमारा लक्ष्य होना चाहिए।हम यहाँ से बच्चे को संविधान का धर्म नहीं
पढाते हैं ,सँस्कार और संस्कृति को लिखना सिखाते हैं मगर उसे जीवन में उतारना
नहीं सिखाते। कक्षा 9 से 12  जिसमे बच्चा बालिग़ होने लगता है तब तक वह
केवल यही जानता है कि तोता रटन्त परीक्षा पास करने के लिये जरुरी है।
अभिभावक भी कुछ नहीं कर पाते और शिक्षा प्रणाली के अनुरूप बच्चों को तोता
रटन्त करवाते हैं नतीजा बच्चा संस्कार, संस्कृति, सदाचार,नैतिकता को जीवन
में उतारने का अवसर खो देता है।

मेरे देश में कक्षा 12 के बाद बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ना छोड़ देते हैं और ये अनगढ़
बच्चे भारत निर्माण में लग जाते हैं ,ये बच्चे कैसा और कितना योगदान श्रेष्ठ
भारत निर्माण के लिए दे पायेंगे ,जरा आप खुद सोचे।

कॉलेज और मास्टर डिग्री के छात्र सिर्फ जीवन यापन के लिए पढ़ते हैं ,वे इस
कर्तव्य से अनजान हैं की उनकी समाज के लिए कोई जबाबदेही है। हमारी
कागजी डिग्रियाँ जब रोजगार का निर्माण नहीं कर पाती तो युवा हताश हो जाता
है और छोटी मोटी सरकारी नौकरी के लिए चक्कर लगाता है और उसे पाने के
लिए भ्रष्टाचार से समझौता कर लेता है और यही से वह खुद भ्रष्ट जीवन जीने
को धकेल दिया जाता है।

शिक्षा स्वावलम्बी हो ,सभ्य समाज का निर्माण करने वाली हो ,संस्कृति और देश
भक्ति प्रधान हो। इस व्यवस्था के बिना सुराज्य संभव नहीं है        
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27-10-2013
पुराने कपड़े और संतुष्टी 

कुछ साल पहले का वाकया है और हर कस्बे ,शहर और महानगर में घटित होता
रहता है। वाकया यह था कि सडक के किनारे स्टील और प्लास्टिक के बर्तन लिए
दो -तीन औरते बैठी थी और कभी कभी आवाज भी लगा देती थी -पुराने कपड़े दे
दो ,बर्तन ले लो।

  गली की कुछ औरते पुराने कपडे लेकर गयी और मोल भाव करके पुराने कपड़े
देकर बर्तन ले आयी ,नए बर्तन लाने वाली औरतों में मेरी पत्नी भी शामिल थी
जब रात को मैं दुकान से लौट कर घर आया तो उन्होंने वे बर्तन मुझे दिखाए जो
पुराने कपड़ों के बदले लिए थे और बर्तनों को चाव से देख भी रही थी और सामने
वाले भाभी की प्रशंसा भी कर रही थी जो भाव ताव करके कम कपड़ो में ज्यादा
बर्तन दिलवा दी थी।

मेने पत्नी से पूछा -ये बर्तन कितने कपडे देकर लिए हैं और बाजार से खरीदती
तो कितने में आ जाते ?

उन्होंने बताया -मेरी पुरानी सात साड़ियाँ और आपके और बच्चो के मिलाकर
दस जोड़ी कपडे थे और बाजार से खरीदने पर चार सौ रूपये तो लग ही जाते।

मेने उनको समझाते हुए कहा -वैसे आपने जो किया वह अनुचित नहीं है लेकिन
क्या कपड़ों के बदले सामान लेने से आपको संतुष्टि मिली ?

वो बोली - ना ,मगर पुराने कपड़ो में जो मिला वह ठीक ही है।

मेने कहा -आप इससे ज्यादा पा सकती हैं और मन में संतुष्टि भी मिल जायेगी।

वो बोली -कैसे ?

मेने कहा -आज से निश्चय करलो कि आप कोई भी पुराना कपडा देकर सामान
नहीं खरीदेंगी और जो कपडे अच्छे हालत में हैं उन्हें आप गरीबों में वितरित कर
दोगी। आपकी पहनी हुई साडी से किसी गरीब की लाज ढकी जा सके ,आपके
बच्चों के कपडे किसी गरीब बच्चे का तन ढक सके यह काम संतुष्टि देगा।

उसके बाद उन्होंने अपनी साड़ियाँ जो पुरानी हो जाती है उन्हें समय से कुछ पहले
उपयोग में लाना बंद कर देती है और अपने ही घर में काम करने वाली कामवाली
बाइयों को पहनने के लिए दे देती है।

हममे से बहुत से ऐसे भारतीय हैं जो नये वस्त्रों का दान करने की सामर्थ्य नहीं
रखते हैं मगर पुराने कपड़ो को बेच कर उसके बदले में वस्तु लेने के लालच से
बच सकते हैं, हम गरीब देश के वाशिंदे हैं और आज भी हर राज्य के पिछड़े और
वनवासी इलाको में वस्तुओ का घोर अभाव है ,हम सामर्थ्य के अंदर कुछ अच्छा
कर सकते हैं जिसे पाकर किसी अभावग्रस्त के चेहरे पर मुस्कान आ सकती है।

कृपया पुराने कपड़े जो पहनने योग्य हो तो उन्हें किसी अभावग्रस्त जरूरतमंद को 
दे दे ,आपका यह काम निश्चित रूप से आपको मानसिक संतुष्टि देगा।    


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२६-१०-२०१३ 
सोच का फर्क 


सब्जी मंडी नहीं कह सकते उस जगह को क्योंकि वह एक चौड़ा रास्ता है उसके आस
पास रहीश और अमीर लोगों की कॉलोनियां हैं। उस चौड़े रास्ते पर कुछ ठेले वाले
सब्जियां बेच कर अपना परिवार चलाते हैं।
एक युवती सब्जी वाले से पूछती है - भईया ,भिन्डी क्या भाव है ?
सब्जी वाले ने कहा -बहनजी ,पचास रूपये किलो।
युवती -क्या कहा !पचास रूपये !! अरे बड़ी मंडी में चालीस में मिलती है  …
सब्जीवाला -बहनजी वहां से लाकर थोड़ी थोड़ी मात्रा में यहाँ बेचना है  में मुश्किल से
दस किलो बेच पाता हूँ ,मुझे तो उसी दस किलो की बिक्री से घर चलाना है
युवती -तो क्या करे हम ,हम भी मेहनत से कमाते हैं ,देख पेंतालिस में देता है तो
एक किलो दे दे ?
सब्जीवाला उसे एक किलो भिन्डी पेंतालिस के भाव से दे देता है और अनमने भाव से
बाकी के पैसे लौटा देता है
वह युवती घर लौटती है और अपने पति से बताती है कि किस तरह वह भाव ताल
करके सस्ती सब्जी लाती है। पति उसको गर्व से निहारता है और मॉल में खरीद दारी
के लिए ले जाता है। वह युवती पर्स पसंद करती है और उसे पेक करने का ऑर्डर दे
देती है यह देख उसका पति बोलता है -रुक ,जरा भाव ताल तय कर लेते है ,तुमने तो
उससे भाव भी नहीं पूछा और सामान पैक करने का भी कह चुकी हो  ….
युवती बोली -आपकी सोच कितनी छोटी है ,ये लोग अपने को फटीचर नहीं समझेंगे ?
युवक बोला -अरे चीज खरीद रहे हैं ,भाव पूछने में क्या जाता है ,वाजिब होगा तो
लेंगे नहीं तो दुसरे से खरीद लेंगे
युवती ने कहा - देख नहीं रहे हो ,यहाँ सभी अपने से ज्यादा पैसे वाले लोग खरीदी
कर रहे हैं और चुपचाप बिल चूका रहे हैं ,आप मेरी इज्जत का कचरा करायेंगे मोल
भाव करके ,ज्यादा से ज्यादा सौ -दो सौ का फ़र्क होगा
 मॉल से पर्स खरीद कर वो दरबान को दस रुपया टीप देकर बाहर निकल आते हैं
ये घटनाएँ छोटी हो सकती हैं मगर बहुत गहरा प्रभाव देश पर छोडती है। एक गरीब
मेहनत करके परिवार का पेट इमानदारी से पालना चाहता है तो हम उससे मोल
भाव करते हैं और वो बेचारा पेट की भूख की मज़बूरी को देख सस्ता देता है और एक
तरफ धन्ना सेठों की दुकानों पर मुहँ मांगे दाम भी देते हैं। कभी हमे पाँच रूपये बचाना
होशियारी लगता है तो कहीं सौ -दो सौ लुटाना वाजिब लगता है।

फैसला कीजिये खुद कि क्या आप सही कर रहे हैं ,आने वाले पर्व त्योहारों पर गरीब
लोगों से सडक पर छोटी छोटी वस्तुओं पर भाव ताव करके पैसे मत बचाईये ,जैसे
आप त्यौहार हर्ष से मनाना चाहते हैं वैसे इन मेहनत कश लोगों को भी त्यौहार के
दिन उनका माँगा मुल्य देकर उनके घर भी कुछ पल रौशनी के आ जाए ,ऐसा काम
कर दीजिये ,  आपके घर जलने वाले दीपक से कोई झोपडी में ख़ुशी आ जाए तो
आप इसमें सह भागी बनिये।







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27.08.2012

सेवा के नाम पर स्वार्थ की पूर्ति 

मनुष्य का स्वभाव है जब उसे धन की प्राप्ति हो जाती है तब उस पर काम और पद
की इच्छा सताने लगती है ,बिरले  ही  इन दोषों से बच के आगे की यात्रा को निकलते
हैं .जब व्यक्ति धन का अर्जन करता है तो वह उसका दिखावा करना चाहता है ,वह
चाहता है की कोई मेरी चापलूसी करे या बढाई  करे .कीर्ति सुख  के लिये  वह धन की  ढेरी
माथे पर उठाये समूह या समाज की और बढता है .समाज सोचता है वह व्यक्ति सेवा
भावना से धन का सदुपयोग करना चाहता है इसलिए उसे आदर देता है और सेवा का
मौका भी देता है .जब समाज कर्तव्य देता है तो वह व्यक्ति वहां अधिकार की खोज में
जुट जाता है और अधिकार पाकर मद में आ जाता है

समाज में इसी तरह की बहुत सी घटनाए बनी है.कहीं  पर कोई छोटा समूह एक ट्रस्ट
की स्थापना करता है और उस व्यक्तिगत ट्रस्ट को जाती विशेष का भ्रमित नाम देकर
पुरे समाज से चंदा इकट्टा कर लेता है और अपनी सम्पत्ति का विस्तार करता है।

समाज की सेवा करने के नाम पर हम सेवा के क्षेत्र में उतरते हैं मगर हम परोपकार
की जगह अपने नाम ,अपनी प्रतिष्ठा और अपनी कीर्ति की सेवा में लग जाते हैं .व्यक्ति
समाज के निमित चंदा इकट्टा करता है और उस चंदे का यथायोग्य उपयोग करता है
समाज द्वारा प्रदत्त चंदे से प्राप्त सफलता को वह अपनी सफलता मानने की भूल करता
है और इस भ्रम में रहता है कि ये सब मेरे कारण से सम्भव हुआ .अहम् सेवा का
मार्ग नहीं होता है मगर तुच्छ बुद्धि इसे कुतर्को के जाल से सही  ठहराने की कोशिश
करता है यदि मैं नही होता तो यह होना संभव नही था

लोग सेवा के क्षेत्र में अधिकार और  प्रतिष्ठा की चाह रखते हैं .पैसे के बल पर समाज
पर अपना रुआब चाहते हैं .मेने बहुत जगह देखा है कि लोग समाज का अधुरा
प्रतिनिधित्व ही पसंद करते हैं ,जो धन दे सकता है वही समाज को  निर्देश देने देने
की काबिलियत रखता है जो समय या श्रम देता है उसका कोई मूल्य नही है .समाज
में कई  जगह पर तो समाज के सदस्य बन्ने के लिये भारी प्रवेश शुल्क रख दिया
जाता है  हम भारी धन सदस्यता के रूप में नही दे सकते तो वहां उसका वोटिंग
अधिकार खत्म कर दिया जाता है .क्या समाज सिर्फ धन के बल पर  चलता है?
समाज उम्दा सोच से आगे बढ़ता है।
जिस जाती में जन्म लिया है वह मनुष्य स्वत:ही उस समाज का अभिन्न अंग बन
जाता है मगर धन के मद में आये लोग सिर्फ अपनी हुकूमत समाज पर चाहते हैं ,
मगर उनकी कोई  नही सुनता ,कारण स्पष्ट है लोग जानते हैं कि सत्य क्या है।

हर समाज में नेताओं की भारी भीड़ है .सब मंच पर बैठ कर उपदेश देना पसंद करते हैं
और सम्बोधन के नाम पर मैं-मैं करते रहते हैं।हम अपने द्वारा  उच्चारित शब्दों को
लोगो पर थोपना चाहते हैं मगर अपने शब्दों पर खुद ही पालन नहीं करना चाहते हैं।
हम सोचते हैं कि नियम और सिद्धांतो का पालन तो दुसरो को करना है ,हम तो पद
पर आसीन हैं इसलिए नियमो से परे हैं .

बात सेवा की थी और विषय का अतिरेक ना हो इसलिए हम पुन:मूल बात पर आते हैं
सेवा का आशय उस वर्ग कि सेवा करना जो दबा कुचला है ,सेवा की उदात्त भावना में
परोपकार मुख्य है और "मैं"पना गौण है। स्वय:की कीर्ति हो ,लोक में प्रतिष्ठा हो, इस
भावना से किया जाने वाला काम सेवा नही व्यापार है,क्योंकि जहाँ  प्रतिफल की चाह
है वहां सेवा नही होती .हम एक बार किये गये शुभ काम का भी बार-बार मूल्य चाहते
हैं ,शुभ काम को खुद भी नही भूल पाते और दुसरे भूल ना जाए इसलिए बड़ी नाम
पट्टिका लगवा देते हैं .यह क्या साबित करने पर तुले हैं हम ? प्रतिष्ठा का लोभ ,नाम
की लालसा ,पद की प्राप्ति  और इसके लिए मार्ग चुनते हैं सेवा का .....!!

मेने समाज के लिए यह किया, वह किया, इतना समय दिया, ये सब क्यों जरूरी है
किसी को बताना ?सूत्र  कहता है नेकी कर कुएँ में डाल .मगर हम नेकी का भी मूल्य
चाहनेलग गए हैं

बुद्धि के प्रकार  हैं -व्यावसायिक बुद्धि,सात्विक ,राजस और तामसिक .सेवा का क्षेत्र  सात्विक
बुद्धि से चलता है इसमें धन के सदुपयोग का  है .हम धन उपार्जित करते हैं और उसका
खर्च भी परोपकारी काम में करना चाहते हैं इसमें व्यावसायिक योग्यता की जरूरत नही
है ,यहाँ उम्दा भावनाओं की आवश्यकता है .

किसी भी परोपकारी काम को निरंतर चलाने के लिए उचित व्यवस्था बनाना जरूरी है .
इसके लिए समान विचार धारा के लोगो का सर्वसम्मति से चयन और सामूहिक निर्णय
जरूरी है ,यदि किसी कारण से विरोध आता भी है तो उसका सही और उचित समाधान
सब की सहमती से हो सकता है ,यहाँ इस बात को प्रमुखता देने की आवश्यकता नहीं है
कि मेरी बात क्यों नहीं मानी गयी जबकि मेने ज्यादा समय,श्रम और सेवा दी है .यह
जरूरी नही है कि हम हर समय सम्यक विचार ही करते हैं या हम वेद वाक्य ही बोलते है
मानव सिमित बुद्धि रखता है इसलिए हमे हर किसी से भी सीखना आना चाहिए .

सेवा के क्षेत्र में तामसिक या राजसिक बुद्धि पतन का मार्ग है .हम सिर्फ उद्धेश्य पर ध्यान
दे ,उस कार्य को कौन सम्पादित कर  है उसे गौण कर दे , यह सरल नहीं है मगर असम्भव
भी नही है .समाज का  तभी सम्भव है जब हम निर्मल बन जाए ,सर्वसम्मति साधने का
प्रयास करे .हर व्यक्ति को समान अधिकार दे .अधिकार और कर्तव्यो का असमान प्रवाह
समाज को डुबो देता है .

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Date 08.07.2012


हिन्दू धर्म और वर्ण व्यवस्था 

हिन्दू धर्म सनातन धर्म है और हिन्दू दर्शन और हिन्दू ग्रन्थ परिपूर्ण हैं .हम ग्रंथो का पठन करते हैं
और शाब्दिक अर्थ को पकडे रखते हैं .अधिकाँश ग्रन्थ संस्कृत भाषा में है और संस्कृत भाषा एक
ऐसी भाषा है जो गूढार्थ रखती है ,संस्कृत भाषा में एक-एक पंक्ति की सूक्तियो में गूढार्थ समाया रहता
है इसलिए ग्रंथो पर टीका करना आम आदमी के बस की बात नहीं है .
       हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था का अनुपालन होता था और वर्ण व्यवस्था आवश्यक भी है .क्या
पौराणिक काल की वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित थी ? नहीं ,हिन्दू ग्रंथो में जन्म आधारित वर्ण
व्यवस्था का स्थान नहीं था .
       हिन्दू ग्रंथो में लिखा है कि शुद्र को ईश्वर तत्व को जानने  का अधिकार नहीं है,इसमें गलत क्या
है? हिन्दू धर्म ग्रंथो में जन्म आधारित जाती व्यवस्था का उल्लेख नहीं है वहां कर्म आधारित वर्ण
व्यवस्था का उल्लेख है .हिन्दू ग्रंथो में वर्ण व्यस्था को चार विभाग में बांटा -ब्राह्मण ,क्षत्रिय,वेश्य
और शुद्र .प्रश्न उठता है ब्राह्मण कौन?या शुद्र कौन? इस शंका को एक श्लोक के माध्यम से समझाया
गया है कि ब्राह्मण की उत्पति भगवान् के मुँख से,क्षत्रिय की ह्रदय से,वेश्य की नाभि से और शुद्र की 
पैरो से हुयी है .इसका शाब्दिक अर्थ से  भ्रम पैदा होता है लेकिन इस श्लोक का भाव जानकार यह सही
लगता है. 

भावार्थ  -

 शरीर में मुँह का स्थान सर्वोच्च है क्योंकि मुँह में मस्तिष्क ,आँख ,कान ,जीभ और नाक
जैसी इन्द्रियाँ हैं .मुँह में विवेक और विचार शक्ति ,सुनने की शक्ति,अभिव्यक्ति की शक्ति ,सुगंध की
शक्ति विद्यमान है ,जो भी प्राणी इन शक्तियों का सदुपयोग करता है वह ब्राह्मण है .

          ह्रदय का कार्य जीवन को बनाए रखना है ,जीवन का संरक्षण करना है जो प्राणी इस पृथ्वी
के चराचर जीवों की रक्षा का उत्तरदायित्व लेता है वह क्षत्रिय है .

        नाभि स्थल का भाग पोषण और उत्पति से सम्बंधित है जो प्राणी जगत के पालन पोषण
में पुरुषार्थ करता है वह वेश्य है.

       पेरो का कार्य है मुँह ,ह्रदय और उदर के स्थल को मजबूती से संभाले रखना .पैरो पर किसी
इन्द्रिय का भार नहीं है जो प्राणी विवेक,वीरता,व्यापार से हटकर कुछ करना चाहता है वह सेवा
का क्षेत्र है.

  अब इस व्यवस्था को जन्म आधारित कैसे माना  जा सकता है ,यह व्यवस्था कर्म आधारित ही थी
और वर्तमान में भी होनी चाहिए.

      वाल्मीकि का जन्म भले ही छोटे वंश में हुआ था लेकिन उनके कर्म ऋषियों की श्रेणी के थे
इसलिए ही वे पूज्य बन गए और वाल्मीकि रामायण की रचना कर सके .उनकी पहचान ऋषि
रूप में विख्यात है .निषाद परिवार में जन्म लेने के कारण राजा गुह को नीच समझा जाना चाहिए
था मगर भगवान् राम ने अपना आलिंगन दिया और छोटे भाई के समान प्यार तथा स्नेह दिया ,
कही भी यह उल्लेख नहीं है कि निषाद की नीच कुल में उत्पति को राम ने अस्पर्शीय माना .भीलनी
का जन्म शुद्र कुल में हुआ था मगर उसके कर्म ब्राह्मण के थे तभी तो श्री राम ने उनके जूठे बेर भी
प्रेम से ग्रहण किये .जटायु का जन्म गीद्ध जाती में हुआ मगर उसके कर्म क्षत्रियोचित थे इसलिए
भगवान् राम ने अपने पूर्वज की भाँती उनका अंतिम संस्कार खुद के हाथो से किया .

     शुद्र का अर्थ है ओच्छे विचार वाला ,संकुचित विचार वाला ,स्वार्थी विचार वाला ,निष्ठुर ,संवेदना
रहित ,पाप कर्म में रचा पचा रहने वाला .क्या ऐसा व्यक्ति ईश्वर तत्व को जानने का अधिकारी हो
सकता है .जिस व्यक्ति के आचरण और स्वभाव लोक हित के प्रतिकूल हो उससे लोक मंगल की
आशा कैसे की जा सकती है ?शुद्र का आशय यह कदापि नहीं किया जाना चाहिए कि हलके कुल में
उत्पन्न प्राणी .(आज हमारे देश में ऐसे शासन कर्ता हो गये हैं जिनका कर्म कुछ है और जाती कुछ 
ओर है , पद क्षत्रिय का पा गए हैं और काम शुद्र का करते हैं )

       भगवान् राम के श्री मुख से वाल्मीकि ने कहलाया है अयोध्याकाण्ड में जब उनका मिलन निषाद
राजा गुह से होता है कि"गुह शांत,संयमी,नम्र,सहनशील और दानी हैं ,इनके कर्म ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ है .ऐसा 
सोचना महान त्रुटी है कि मनुष्य की जाती उसके जन्म पर आधारित होती है .वेदों का निष्कर्ष भी ऐसा 
नहीं है।.अपितु जाती का निर्धारण गुणों के आधार पर किया जाता है ."

हर व्यक्ति हर दिन वर्ण  क्रम का पालन करता है .जब सुबह उठकर शोच कर्म करता है या घर में साफ
सफाई करता है तब शुद्र वर्ण का पालन करता है ,स्नान करके पूजा आराधना या दबे कुचले वर्ग की सेवा
करता है तो ब्राह्मण वर्ण का पालन करता है ,घर से काम के लिए बाहर निकलता है तब वेश्य वर्ण का
पालन करता है और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ ,व्यवस्था में बाधा उत्त्पन्न करने वाले के खिलाफ
संघर्ष करता है तो क्षत्रिय वर्ण का पालन करता है.इसका मतलब अकेला व्यक्ति ही सब वर्णों को जीता है

 जाती  व्यवस्था की समस्या  क्यों 

जबसे हमने कर्म के महत्व को गौण कर दिया है और जन्म के वंश को महत्व दे दिया है तब से वर्ण 
व्यवस्था बिखर गयी है .ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण चाहे उसके कर्म कैसे भी निचे दर्जे के हो और शुद्र का 
बेटा शुद्र चाहे उसके कर्म कितने ही ऊँचे क्यों ना हो .

वर्तमान वर्ण व्यवस्था के सहभागी कौन  
  
वर्तमान में हर धर्म में जन्म के आधार पर ऊँची नीची जातियाँ विद्यमान है .ऊँची जाती के लोग यह
चाहते हैं कि उनका जन्म उच्च कुल में होने के कारण वे आदरणीय हैं और निचे या शुद्र कुल के लोग
उनकी सेवा करे .

शुद्र वंश के लोग भी इस व्यवस्था में जीना छोड़ नहीं पा रहे हैं उनकी मानसिकता या नजरिया भी
जन्म आधारित ही है वे अपने को दीन -हीन और कुचला समाज के अंग के रूप में स्वीकार कर चुके
हैं .उनकी बस्तियां भी वे साफ सुथरी नहीं रखते,अभावो और अँधेरे में जीना उन्होंने स्वीकार कर
लिया है .

हमारा संविधान भी अप्रत्यक्ष रूप से जन्म आधारित जातिगत व्यवस्था का पोषण करता प्रतीत
होता है .हमारा संविधान सवर्ण वर्ग-दलित वर्ग या अनुसूचित जाती ,अनुसूचित जन जाती में जन्म
के आधार पर ही व्यवस्था प्रदान करता है .सरकारी सुविधाओं का फायदा भी जन्म के वंश  के अनुसार
मिल रहा है .आरक्षण की व्यवस्था भारतीयों में अगड़ी जाती और पिछड़ी जाती का भेद पैदा करती है 
जो जन्म आधारित है इसलिए दबा कुचला वर्ग आरक्षण के जाल में अपने को दलित या पिछड़ा बना 
रहने में ठीक समझता है क्योंकि वहाँ कम योग्यता की जरूरत है .

   आवश्यकता क्या है   

हम जन्म आधारित जाती व्यवस्था को नकारे और गुण आधारित व्यवस्था की तरफ आगे बढे .

उच्च पदों पर गुणवान और चरित्रवान लोगो का चयन हो चाहे वह किसी भी जाती का हो .

वह भारतीय, जो दबा कुचला वर्ग है उसे विशेष सुविधा मिले ताकि उसकी योग्यता का विकास हो
चाहे उसका जन्म ऊँची जाती में हुआ हो या नीची जाती में .


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पद लोलुपता



हमारे समाज में एक दुर्व्यसन की माफिक पद लोलुपता समाज के रग -रग में प्रवेश कर चुकी है .
हम सामाजिक सुधारों पर ध्यान नहीं देकर पद पर ज्यादा ध्यान देते हैं .हर समाज में छोटे-बड़े 
अनेक संसथान कुकुरमुत्ते  के समान उगते जा रहे हैं.अलग-अलग नामो से सगंठन खड़े किये जा 
रहे हैं और उन संगठनो में नित नये पद गठित किये जा रहे हैं जिनका वास्तव में कोई महत्व ही 
नहीं है .कोई समाज के सरंक्षक के पद पर आसीन है कोई अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान है ,
कोई प्रवक्ता के पद पर है तो कोई सलाहकार समिति के पद पर।कोई नवयुवक मंडल का अध्यक्ष 
बन बैठा है तो कोई युवा मंच का अध्यक्ष .कोई किशोर मंच चला रहा है तो सत्संग मंडल .हर व्यक्ति 
की चाहना हो गयी है की उसके नाम के बाद पद भी हो .यदि कोई अध्यक्ष नहीं बन पाया है तो सदस्य 
बनकर भी इतरा रहा है और अपने नाम के पीछे फलां -फलां मंडल के सदस्य लिख कर अपने अहं 
को पोष रहा है .
          क्या समाज की सेवा के लिए विभिन्न संगठनों की आवश्यकता है? जब समाज की सेवा का 
प्रश्न आता है तब पद की जगह अनुचर बनने की आवश्यकता होती है मगर दास्य भाव से कोई बिरला 
ही होगा जो समाज के ऋण को चूका रहा है .हर जगह अध्यक्ष ,उपाध्यक्ष,सचिव की उपस्थिति है ,इन्हें 
मंच और माईक से मतलब है .कुछ बोलना है चाहे अनुकरण वह स्वयं भी नहीं करता हो .उपदेश देने 
में ऐसे जीव बहुत प्रवीण  होते हैं.संयोग से इनकी बात पर सभा में ताली बज गयी हो तब तो ये फुले 
ही नहीं समाते .
          हमारे परिचित हैं जिन्हें समाज में कोई पद नहीं मिल पाया तो बेचेन हो गए फिर बड़ी मुश्किल से 
अपने लिए एक पद खोज पाये .उन्होंने पाँच -सात दोस्तों के साथ रामचरित्र मानस के सुन्दरकाण्ड का 
गायन हर शनिवार की रात शुरू करना तय किया और फिर बन बैठे मानस मंडल के अध्यक्ष !ये क्या 
बिमारी लग गयी है हमको .मानस  का पठन करना है अपने जीवन का मूल्यांकन करना है और 
अवगुणों को चरित्र से दूर कर निर्मल बनना है यहाँ पद की कहाँ आवश्यकता है भला ,मगर गुण आये 
या जाये इसकी किसे परवाह है .परवाह है तो नाम के पीछे पद लगवाने की .
    एक भाई को जब समाज का पद नहीं मिला तो श्मशान की देखरेख करने लग गए .उनके साथ जब 
कुछ सेवा भावी लोग जुड़ गए तो भाईजी श्मशान सेवा संघ बनाकर उसके अध्यक्ष बन गये .मुर्दे को 
कैसे जलाना है ,कितनी लकड़ी और घी लगेगा ,अंतिम यात्रा कैसे जायेगी आदि बातों का प्रबन्धन 
करने लग गये .
    क्या होगा पद लोलुप समाज का जहाँ हर कोई नेता बनना चाहता है .हम जब भी किसी सामाजिक 
उत्सव पर एकत्रित होते हैं तो लाल पीले तगमे लगाये अकड़ते हुए चलने वाले नेताओं से पाला जरुर 
पड़ जाता है .ये लोग एक बात पर कुढ़ते रहते हैं कि इन्हें समर्पित कार्यकर्ता नहीं मिल पा रहे हैं जो 
इनके झूठे रुआब को सहन कर सके .ये खुद तो अध्यक्ष या सचिव या फिर संगठन के माननीय 
सदस्य हैं इसलिए ये खुद तो काम करते नहीं अब इन्हें इसे समर्पित कार्यकर्ता चाहिए जो इनको 
पानी पिलाए या इनकी जी हजुरी करे या फिर इनकी खुशामद करे .
        श्री कृष्ण के चरित्र से जुडा  एक प्रसंग -जब वे भोजन कर चुके ब्राह्मणों की जुट्ठी पतले उठा रहे 
होते हैं .श्री राम के चरित्र से जुडा एक प्रसंग -जब वे नन्ही गिलहरी की सेवा से अभिभूत होकर प्यार से 
अपने हाथो में उठा उसे सहला  रहे होते हैं .हनुमान बिना किसी पद की लालसा के सिर्फ दास बने रहना 
चाहते हैं .महाराज सुग्रीव और विभिषण श्री राम के राज्याभिषेक के समय उनको चंवर ढुलाते हैं.जब 
ऐसे चरित्र समाज में आते हैं तब ही तो सुधार स्वत: आता है ,कहीं कोई पद लोलुपता का नामो निशान 
नहीं ,सिर्फ सेवा ही मन्त्र बन जाता है .
       यदि हम भी अपने समाज में आमूलचूल परिवर्तन लाना चाहते हैं तो हमे भी एक ही मन्त्र को 
अपनाना होगा -सेवा। सच्चे ह्रदय से गिरे हुए को उठाने की उदात्त भावना .चाह खुद के नाम की या 
किसी पद की नहीं हो,चाह हो कि कैसे हम सब सबको साथ लेकर आगे बढे . गिरे हुए को उठाने के 
लिए पद की कहाँ आवश्यकता ,वहां तो जरुरत है प्रेम से अपना हाथ लम्बाने की ताकि अशक्त को 
शक्ति मिल जाए और वह भी खड़ा होकर दुसरे गिरे हुए को उठाने में समर्थ बन जाए .     

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